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Thread: दिलचस्प बॉलीवुड

  1. #21
    कांस्य सदस्य Teach Guru's Avatar
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    कुछ बातें धर्मेंद्र के बारे में

    रोल चाहे फिल्म सत्यकाम के सीधे सादे ईमानदार हीरो का हो, फिल्म शोले के एक्शन हीरो का हो या फिल्म चुपके चुपके के कॉमेडियन हीरो का, सभी को सफलता पूर्वक निभा कर दिखा देने वाले धर्मेंद्र सिंह देओल अभिनय प्रतिभा के धनी कलाकार हैं| सन् 1960 में फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे से अभिनय की शुरुवात करने के बाद पूरे तीन दशकों तक धर्मेंद्र चलचित्र जगत में छाये रहे| केवल मेट्रिक तक ही शिक्षा प्राप्त की थी उन्होंने| स्कूल के समय से ही फिल्मों का इतना चाव था कि दिल्लगी (1949) फिल्म को 40 से भी अधिक बार देखा था उन्होंने| अक्सर क्लास में पहुँचने के बजाय सिनेमा हॉल में पहुँच जाया करते थे| फिल्मों में प्रवेश के पहले रेलवे में क्लर्क थे, लगभग सवा सौ रुपये तनख्वाह थी| 19 साल की उम्र में ही शादी भी हो चुकी थी उनकी प्रकाश कौर के साथ और अभिलाषा थी बड़ा अफसर बनने की|

    फिल्मफेयर के एक प्रतियोगिता के दौरान अर्जुन हिंगोरानी को पसंद आ गये धर्मेंद्र और हिंगोरानी जी ने अपनी फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे के लिये उन्हें हीरो की भूमिका के लिये अनुबंधित कर लिया 51 रुपये साइनिंग एमाउंट देकर| पहली फिल्म में नायिका कुमकुम थीं| कुछ विशेष पहचान नहीं बन पाई थी पहली फिल्म से इसलिये अगले कुछ साल संघर्ष के बीते| संघर्ष के दिनों में जुहू में एक छोटे से कमरे में रहते थे| लोगों ने जाना उन्हें फिल्म अनपढ़ (1962), बंदिनी (1963) तथा सूरत और सीरत (1963) से पर स्टार बने ओ.पी. रल्हन की फिल्म फूल और पत्थर (1966) से| 200 से भी अधिक फिल्मों में काम किया है धर्मेंद्र ने, कुछ अविस्मरणीय फिल्में हैं अनुपमा, मँझली दीदी, सत्यकाम, शोले, चुपके चुपके आदि|

    अपने स्टंट दृश्य बिना डुप्लीकेट की सहायता के स्वयं ही करते थे| चिनप्पा देवर की फिल्म मां में एक चीते के साथ सही में फाइट किया था धर्मेंद्र ने|

  2. #22
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    Dec 2009
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    धर्मेंद्र जी का क्या kahna

  3. #23
    कांस्य सदस्य Sumer S. Siswal's Avatar
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    Apr 2011
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    वाह जी वाह.......मज़ा आ गया
    न.1 हरियाणे का न. 1 हरयाणवी

  4. #24
    कर्मठ सदस्य jai 123's Avatar
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    बहुत हि अच्छा ज्ञानवर्धक सुत्र

  5. #25
    कांस्य सदस्य Teach Guru's Avatar
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    शीर्ष रोमांटिक फिल्मों की सूची में प्यासा


    टाइम मैगजीन द्वारा जारी किए जाने वाले लिस्ट में भारतीयों नामों का शामिल होना लगातार जारी है. टाइम द्वारा जारी वैलेंटाइन डे के मौके
    पर शीर्ष रोमांटिक फिल्मों की लिस्ट में भारतीय निर्देशक गुरुदत्त की 1950 के दशक में आई सफल फिल्म “प्यासा” को पांचवे स्थान पर रखा गया है.
    वैलेंटाइन डे के मौके पर टाइम ने अपनी वेबसाइट के जरिए यह परिणाम घोषित किए. टाइम द्वारा प्यासा को शामिल किए जाने पर वक्तव्य जारी किया गया कि भारतीय फिल्मों में अब भी परिवार के प्रति निष्ठा, व्यक्तिगत निष्ठा और सभी को प्यार से जीतने की भावना मौजूद होने की बात
    कही गई है.
    प्यासा में गुरुदत्त और अभिनेत्री वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं. सूची में पहले स्थान पर सन ऑफ द शेख (1926), दूसरे पर डॉड्सवर्थ (1939), तीसरे पर कैमिली (1939), चौथे पर एन एफेयर टू रिमेम्बर (1957) और पांचवें स्थान पर प्यासा (1957) को रखा गया.

  6. #26
    कांस्य सदस्य Teach Guru's Avatar
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    हिन्दी सिनेमा का एक तारा – प्राण




    हिन्दी सिनेमा में कई बार खलनायकों ने नायकों से ज्यादा नाम कराया. प्राण भी उनमें से ही एक थे. अपने जानदार और ‘कातिलाना’ अभिनय से निगेटिव रोल में भी प्राण फूंकने वाले अभिनेता प्राण आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों के दिलों में हैं.

    अभिनेता प्राण को दशकों तक बुरे आदमी (खलनायक) के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना, पर्दे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी कि लोग उसे ही उसकी वास्तविक छवि मानते रहे. लेकिन फिल्मी पर्दे से इतर प्राण असल जिंदगी में वे बेहद सरल, ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे.

    12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में बसे एक रईस परिवार में प्राण का जन्म हुआ. बचपन में उनका नाम प्राण कृष्ण सिकंद था. उनका परिवार बेहद समृद्ध था. प्राण बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थे. बड़े होकर उनका फोटोग्राफर बनने का इरादा था. 1940 में जब मोहम्मद वली ने पहली बार पान की दुकान पर प्राण को देखा तो उन्हें फिल्मों में उतारने का सोचा और एक पंजाबी फिल्म “यमला जट” बनाई जो बेहद सफल रही. फिर क्या था इसके बाद प्राण ने कभी मुड़कर देखा ही नहीं. 1947 तक वह 20 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके थे और एक हीरो की इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे हालंकि लोग उन्हें विलेन के रुप में देखना ज्यादा पसंद करते थे.

    1947 के विभाजन के बाद उन्होंने शाहदत अली मंटो की एक फिल्म में काम किया जिसमें देवानंद भी थे. फिल्म की सफलता का श्रेय तो देव जी के खाते में गया पर प्राण पर दुबारा लोग दांव लगाने लगे. 1960 में आई मनोज कुमार की पुकार ने उनके निगेटिव किरदार को नया रुप दिया. प्राण सिगरेट के धुएं से गोल-गोल छल्ले बनाने में माहिर थे. फ़िल्म निर्देशकों ने इसका ख़ूब इस्तेमाल किया. उनकी फिल्मों में यह दृश्य आम था.

    प्राण ने अमिताभ और देवानंद के साथ कई फिल्में कीं जिससे उनके कॅरियर को और अधिक ऊंचाई मिली. वैसे पर्दे पर जो प्राण थे असल जिंदगी में वह बिलकुल उलट थे. समाज सेवा और सबसे अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था.

    प्राण को तीन बार फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड मिला. और 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट खिताब से नवाजा गया. आज भी लोग प्राण की अदाकारी को याद करते हैं.

  7. #27
    कांस्य सदस्य Teach Guru's Avatar
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    जनसंचार माध्यमों के मंच पर लोक कलाएं

    भारत लोक कला और संगीत के हिसाब से एक सम्रद्ध देश है पर नए मीडिया रेडियो टीवी और फ़िल्मों के आ जाने से लोगों का इनकी ओर रुझान कम हुआ अब समस्या ये है कि इन लोककलाओ और गीतों को संरंक्षित कैसे किया जाए हर काम के सरकारी मदद का इन्तिज़ार कोई सार्थक विकल्प नहीं हो सकता .हमारी फिल्मों में लोक गीतों का इस्तेमाल अक्सर होता आया है और इसकी एक लंबी सूची है 1931-33 से ही कई अनजान गीतकार लोकगीतों पर आधारित गाने फिल्मों के लिए लिख रहे थे जैसे ‘सांची कहो मोसे बतियां, कहां रहे सारी रतियां’ (फरेबीजाल-1931) इसी परंपरा के अन्य कुछ लोकप्रिय गीतों में पान खाय सैयां हमारो , (तीसरी कसम ) मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है(लावारिस ) , रंग बरसे भीगे चुनरवाली (सिलसिला ) ये वो दौर था जब एस डी बर्मन , नौशाद, जयदेव, सलिल चौधरी, ओ.पी. नय्यर, कल्याणजी आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे संगीतकार लोकधुनों से फिल्मी संगीत को विविधता देकर उसे नए आयाम दे रहे थे नब्बे के दशक में ऐसे प्रयोग कम हुए हाल ही पर एक बार फिर लोक गीतों और धुनों को फिल्मों में लेने का दौर लौटा और लोगों के सर चढ़कर बोला .
    मुन्नी बदनाम का जादू अभी लोगों के सर से उतरा ही नहीं था कि शीला की जवानी ने लोगों को झूमा डाला अभी इस पर बहस चल ही रही थी कि शीला और मुन्नी में कौन ज्यादा प्रसिद्द हुआ है कि टिंकू जिया (यमला पागल दीवाना ) ने लोगों के पैरों को थिरकाने पर मजबूर कर दिया पर इसी के साथ शुरू हो गयी नयी बहस समाज के एक धड़े ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया और इस पर अश्लील होने का ठप्पा लगा दिया .ऐसा क्यों ? फिल्मों में लोक संगीत तो इसके शुरुवाती दौर से ही प्रयोग होते आ रहे हैं . उत्तर भारत में शादियों में गाये जाने वाली मंगल गीतों में गालियाँ गाई जाती हैं .इस बात का कोई भी बुरा नहीं मानता ये भी हमारी लोक संस्कृति का एक हिस्सा है जिसमे गालियों को भी एक परंपरा के रूप में मान्यता दी गयी है कालांतर में ऐसे कई लोक गीत नौटंकियों ,नाटक से होते हुए फिल्मों में पहुंचे एक बानगी देखिये
    अरे जा रे हट नटखट न छेड़ मेरा घुंघट…पलट के दूंगी आज तोहे गारी रे…मुझे समझो न तुम भोली-भाली रे… तो आखिर अश्ल्लीता का हवाला देकर इतने हो हल्ला क्यों मचाया जा रहा है .अगर बोलीवुड के पन्नों को पलटा जाए तो पुरानी यादों में हमें कई फिल्मों और गानों का पता चलेगा जिसको लेकर समाज के सुचितावादियों ने सवाल खड़े किये राजकपूर एक बड़े नाम हैं जिनहोने नारी देह और लोक गीतों का खूबसूरती से प्रयोग किया .इन पुरानी फिल्मों में सोहर , कव्वाली और गज़ल जैसी न जाने कितनी विधाओं के दर्शन हो जायेंगे .हमें यह नहीं भूलना चाहिए इस बहुसांस्कृतिक देश में जहां भी जाएं फ़िल्मी गीतों ने नई संवेदना पैदा करने और विभिन्न लोक संस्कृतियों से अवगत कराने का बड़ा काम किया है।
    इस बारे में वरिष्ठ रंगकर्मी उर्मिल कुमार थपलियाल कहते हैं कि तब समाज बाजारू नहीं था फिल्मों में लोगों के साथ संवेदनाएं जुडी थी कहानी की मांग के अनुसार ऐसे गाने प्रयोग किये जाते थे अब तो लोकसंगीत के नामपर बजने वाले आइटम गीत तो दाल में छौंक की तरह परोसे जाते हैं कहानी की मांग होती ही नहीं बस दर्शकों में उत्तेजना भरने के लिए तो इन पर बवाल होगा ही पर वो ये जोड़ना नहीं भूलते साहित्य या कला कभी अश्लील नहीं हो सकती .अश्लीलता के नाम पर होने वाले बवाल का कारण इनका फिल्मांकन भी है इस बारे में वरिष्ठ रंगकर्मी जीतेन्द्र मित्तल बताते हैं कि बीडी जलइले और लौंडा बदनाम हुआ गीत को समाज तब भी अश्लील ही मानता था पर फिल्मों में आने के कारण इन गीतों की पहुँच का दायरा बढ़ गया है इस लिए समस्या ज्यादा है .
    तस्वीर का दूसरा रुख भी है वक्त के साथ गाने और समाज भी बदला है हाँ लोक गीत और संगीत के नाम पर आज जो गीत इस्तेमाल हो रहे हैं उनमे गति ज्यादा है और एक नए तरह के फ्युसन के लक्षण भी दिखते हैं मैं हूँ न फिल्म में कव्वाली एक नए रूप में लौटी वहीं कजरारे कजरारे ,और नमक इश्क का जैसे गीत एक सोंधी खुशबू लिए दिखते हैं जिसका लुत्फ़ शहर में पली वो पीढ़ी उठा सकती है जिसने गाँव सिर्फ फिल्मों में देखा है वहीं गाँव के लोग अपने गीतों को ग्लोबल बनते हुए देख रहे हैं . हिन्दी सिनेमा में ऐसे हजारों गीत हैं जिसे लोकभाषा में जड़कर धुनों में पिरोया गया। याद करें-’इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मोरा’ (पाकीजा), ‘चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया’ (तीसरी कसम) या फिर ‘चप्पा-चप्पा चरखा चले’ (माचिस) राजस्थान का मोरनी बागां में हो या पंजाब हिमाचल का गिद्दा बारी बरसी खडंन गया सी जैसे लोक संगीत से आम भारतीय को परिचय कराने का श्रेय फिल्मों को ही जाता है.
    अब ध्यान देने वाली बात ये है कि एक तरफ हम अपनी लोक कलाओं,संगीत के खत्म होने के गम में ग़मगीन हो जाते हैं या फिर सरकारी मदद की आस के इन्तिज़ार में रहते हैं समय बदल रहा है लोक कलाएं तभी जिन्दा रह सकती हैं जब उनमें प्रयोग होते रहें और उनकी पहुँच का दायरा बढ़ता रहे और इसका एक रास्ता नवीन जनमाध्यमों से होकर जाता है फिर हर माध्यम की अपनी सीमायें और विशिष्टता होती है ये बात फिल्म माध्यम पर भी लागू होती है यहाँ ओडियेंस का दोहरा चरित्र भी उजागर होता है जहाँ उसे लोक संगीत के नष्ट होने की चिंता तो है पर अगर उनमे प्रयोग हों तो उसे बर्दाश्त नहीं है पहले मनोरंजन का एक मात्र साधन लोक कलाएं ,संगीत थे पर अब उनमें हिस्सेदारी बटाने के लिए और भी माध्यम आ गए हैं जो ज्यादा प्रयोगधर्मी हैं ऐसे में लोकसंगीत और कला पर सिर्फ आंसू बहा कर उन्हें बचाया नहीं जा सकता है वैश्वीकरण के इस युग में जहाँ ओडियेंस और उपभोक्ता में अंतर मिट रहा है अगर परम्परागत लोक माध्यमों को नवीन जन माध्यमों का सहारा मिल जाए तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी .




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  8. #28
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    टाच गुरु आपने तो बोलीवुड की पोटली खोलदी यार रेपो स्विका र्कारे .
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  9. #29
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    बिलकुल नवीन बातों के साथ अच्छा सूत्र प्रस्तुत किया है दोस्त ...
    अच्छा प्रयास ....

  10. #30
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    मुसाफिर हूँ यारों..
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    Re: * दिलचस्प बॉलीवुड *

    काबिले तारीफ़ है ये सूत्र...
    वफ़ा करेंगे, निबाहेंगे, बात मानेगे.
    याद होगा तुम्हे भी शायद, ये कलाम किसका था.....

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