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View Full Version : बाल मन को लुभाने वाले प्यारे प्यारे गीत और कवितायेँ



SUNIL1107
04-04-2011, 09:23 PM
दोस्तों कभी कभी मन बच्चा बनना चाहता है , बाल मन कितना निर्मल कोमल होता है जिसकी कल्पना करना ही स्वयं मन को आल्हादित कर देता है , तो दोस्तों प्रस्तुत हैं कुछ बाल सुलभ गीत और कवितायेँ !

SUNIL1107
04-04-2011, 09:37 PM
सूत्र भ्रमण करने वाले सभी माननीय सहयोगियों से सहयोग अपेक्षित है !
अकड़
अकड़-अकड़ कर
क्यों चलते हो
चूहे चिंटूराम,
ग़र बिल्ली ने
देख लिया तो
करेगी काम तमाम,

चूहा मुक्का तान कर बोला
नहीं डरूंगा दादी
मेरी भी अब हो गई है
इक बिल्ली से शादी !
-----( दीनदयाल शर्मा )

SUNIL1107
04-04-2011, 09:49 PM
अक्कड़-बक्कड़
अक्कड़-बक्कड़ बोकरी
बाबाजी की टोकरी ।

टोकरी से निकला बंदर
बंदर ने मारी किलकारी
किलकारी से हो गया शोर
शोर मचाते आ गए बच्चे
बच्चे सारे मन के कच्चे

कच्चे-कच्चे खा गए आम
आम के आम गुठली के दाम
दाम बढ़े हो गई महंगाई
महंगाई में पड़े न पार
पार करें हम कैसे नदिया
नदिया में नैया बेकार

बेकार भी हो गई पेटी
पेटी में ना पड़ते वोट
वोट मशीनों में है बटन
बटन दबाओ पड़ गए वोट
वोट से बन गए सारे नेता
नेता भी लगते अभिनेता

अभिनेता है मंच पे सारे
सारे मिलकर दिखाते खेल
खेल देखते हैं हम लोग
लोग करें सब अपनी-अपनी
अपनी डफली अपना राग

राग अलापें अजब-गजब हम
हम रहते नहीं रलमिल सारे
सारे मिलकर हो जाएँ एक
एक-एक मिल बनेंगे ताकत
ताकत सफलता लाएगी
लाएगी खुशियाँ हर घर-घर
घर-घर दीप जलाएगी ।

( दीनदयाल शर्मा )

SUNIL1107
04-04-2011, 09:52 PM
अपनी दुनिया सबसे न्यारी
पलभर में लड़तें हैं हम सब
पलभर में मिलतें हैं हम सब
अपनी दुनिया सबसे न्यारी
लगती हमको सबसे प्यारी !
( दीनदयाल शर्मा )

SUNIL1107
04-04-2011, 09:56 PM
अक्कड़-मक्कड़
अक्कड़ मक्कड़ ,
धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे,
ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे.

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं.
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची.
अब वह जीता, अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे
सबके खिले हुए थे चेहरे !

मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजा कर्रा - कक्कड़;
बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर.

अक्कड़ मक्कड़ ,
धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख,
दोनों अक्खड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा !

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोऒ
चलो भाई चारे को बोऒ!

खाली सब मैदान पड़ा है,
आफ़त का शैतान खड़ा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ.
( भवानी प्रसाद मिश्र )

punjaban rajji kaur
05-04-2011, 10:56 AM
bacche bhi aate hain kya is forum pe :)

Black Pearl
05-04-2011, 12:04 PM
bacche bhi aate hain kya is forum pe :)

बच्चों के पापा तो आते हैं

SUNIL1107
05-04-2011, 03:27 PM
दोस्तों इन्सान के अन्दर एक नन्हा सा बच्चा किसी न किसी कोने में अवश्य होता है ! यह प्रयास उसी के लिए है !

SUNIL1107
09-04-2011, 12:14 AM
अबोध का बोध पाठ

हैं छोटे छोटे हाथ मेरे ,
छोटे छोटे पाँव !
नन्हीं नन्हीं आँखे मेरी
नन्हें नन्हें कान !

फिर भी हरदम चलता हूँ
हाथों से करता काम !
रोज देखता सुंदर सपना
सुनता सुंदर गान !

अब हमारी सुनो प्रार्थना
तुम भी बच्चे बन जाओ !
छोड़ो झगड़े और लड़ाई
अच्छे बच्चे बन जाओ !
( लावण्या शाह )

SUNIL1107
09-04-2011, 12:18 AM
आँधी आई
आँधी आई बडे़ ज़ोर-से
धूल उड़ी ।।

उड़ा बिछौना, उड़ी दुलाई
और उड़ा टिन्नू का टोप,
टीन गिरा छत ऊपर रक्खा
मानो अभी दगी हो तोप ।

गिरा घोंसला, उड़कर भागे
चिड़ा-चिड़ी ।।

दौड़ी मम्मी, दौड़ी दीदी
खिड़की बंद की तत्काल,
लेकिन धूल पड़ी आँखों में
टिन्नू जी रोए बेहाल ।

बिजली गुल हो गई,न जाने
कौन घड़ी ।।
( मोहम्मद साजिद खान )

SUNIL1107
10-04-2011, 05:52 PM
आंक भणां
आंक भणां भई आंक भणां
पढ़ लिख चोखा मिनख बणां

खाओ पीओ कूदो खेलो
टाबरियां रो काम ओ पै‘लौ
पण पढ़णों भी नही झमेलो
पकड़ां आपां स्कूल रो गेलो
बेली साथी साथै ले गे
बस्तो ले पोसाळ चलां
आंक भणा भई आंक भणां

रामू रामी दोन्यूं आओ
पाटी बरतो साथै ल्याओ
सगळा म्हानै पाठ सुणाओ
बारखड़ी गिणती पढ़ ज्याओ
ए बी सी डी मारी मांडगे
पाछै आपां गांवां रमां
आंक भणा भई आंक भणां।
( शिवराज भारतीय )

SUNIL1107
10-04-2011, 05:55 PM
आई रेल-आई रेल
धक्का-मुक्की रेलम-पेल ।
आई रेल-आई रेल ।।

इंजन चलता सबसे आगे ।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे ।।

हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता ।
पटरी पर यह तेज़ दौड़ता ।।

जब स्टेशन आ जाता है ।
सिग्नल पर यह रुक जाता है ।।

जब तक बत्ती लाल रहेगी ।
इसकी जीरो चाल रहेगी ।।

हरा रंग जब हो जाता है ।
तब आगे को बढ़ जाता है ।।

बच्चों को यह बहुत सुहाती ।
नानी के घर तक ले जाती ।।

छुक-छुक करती आती रेल ।
आओ मिल कर खेलें खेल ।।

धक्का-मुक्की रेलम-पेल ।
आई रेल-आई रेल ।।
( रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ )

SUNIL1107
10-04-2011, 05:58 PM
आई होली, आई होली

आई होली, आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।

मुन्नी आओ, चुन्नी आओ,
रंग भरी पिचकारी लाओ,
मिल-जुल कर खेलेंगे होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

मठरी खाओ, गुँझिया खाओ,
पीला-लाल गुलाल उड़ाओ,
मस्ती लेकर आई होली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

रंगों की बौछार कहीं है,
ठण्डे जल की धार कहीं है,
भीग रही टोली की टोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।

परसों विद्यालय जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मेहनत से पढ़ना हमजोली।
रंग-बिरंगी आई होली।।
( रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ )

SUNIL1107
10-04-2011, 06:02 PM
आओ बच्चो
आओ बच्चो रेल बनाएँ ।
आगे-पीछे हम जुड़ जाएँ ।।

ईशु तम इंजन बन जाओ ।
लाली तुम पीछे चली जाओ ।।

गार्ड बन तुम काम करोगी ।
संकट में गाड़ी रोकोगी ।।

हम डिब्बे बन जाएँगे ।
छुक-छुक रेल चलाएँगे ।।
( दीनदयाल शर्मा )

SUNIL1107
10-04-2011, 06:05 PM
आओ शोर मचाएँ
बड़ा मजा आता है हमको,
हम तो शोर मचाएँगे,
हमको पता है टीचर जी,
आकर डाँट लगाएँगे।

करे न ज़रा शरारत कोई,
ज़रा नहीं शोर मचाएँ।
चुप रहना है खेल बड़ों का,
हम कैसे समय बिताएँ?
( श्याम सुन्दर अग्रवाल )

SUNIL1107
14-04-2011, 09:46 PM
उल्टा-पुल्टा
हो गया उल्टा-पुल्टा इक दिन
उड़ गया हाथी पंखों के बिन !
धरती से पाताल की ओर
बीच चौराहे घनी भीड़ में
भरी दुपहरी नाचा मोर !
बकरी ने दो दिए थे अंडे
बैठे थे शमशान में पंडे !
गूँगी औरत करती शोर
चूहों की दहाड़ सुनी तो
सिर के बल पर भागे चोर !
मुर्गा बोला म्याऊँ-म्याऊँ
बिल्ली बोली कुकड़ू कूँ !
बिना पतंग के उड़ गई डोर
निकले तारे धरती पर तो
छिप गया सूरज हो गई भोर !!
( दीन दयाल शर्मा )

SUNIL1107
14-04-2011, 09:49 PM
उल्लू
उल्लू होता सबसे न्यारा,
दिखे इसे चाहे अँधियारा !
लक्ष्मी का वाहन कहलाए,
तीन लोक की सैर कराए !

हलधर का यह साथ निभाता,
चूहों को यह चट कर जाता !
पुतली को ज्यादा फैलाए,
दूर-दूर इसको दिख जाए !

पीछे भी यह देखे पूरा,
इसको पकड़ न पाए जमूरा !
जग में सभी जगह मिल जाता,
गिनती में यह घटता जाता !

ज्ञानीजन सारे परेशान,
कहाँ गए उल्लू नादान !!
( दीन दयाल शर्मा )

SUNIL1107
14-04-2011, 09:54 PM
उल्लू
उल्लू का रंग-रूप निराला !
लगता कितना भोला-भाला !!

अन्धकार इसके मन भाता !
सूरज इसको नही सुहाता !!

यह लक्ष्मी जी का वाहक है !
धन-दौलत का संग्राहक है !!

इसकी पूजा जो है करता !
ये उसकी मति को है हरता !!

धन का रोग लगा देता यह !
सुख की नींद भगा देता यह !!

सबको इसके बोल अखरते !
बड़े-बड़े इससे हैं डरते !!

विद्या का वैरी कहलाता !
ये बुद्धू का है जामाता !!

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना !
कभी न उल्लू तुम कहलाना !!
( रूप चंद शास्त्री ''मयंक'' )

SUNIL1107
14-04-2011, 09:58 PM
एक किरण आई छाई
एक किरण आई छाई,
दुनिया में ज्योति निराली
रंगी सुनहरे रंग में
पत्ती-पत्ती डाली डाली

एक किरण आई लाई,
पूरब में सुखद सवेरा
हुई दिशाएं लाल
लाल हो गया धरा का घेरा

एक किरण आई हंस-हंसकर
फूल लगे मुस्काने
बही सुंगंधित पवन
गा रहे भौरें मीठे गाने

एक किरण बन तुम भी
फैला दो दुनिया में जीवन
चमक उठे सुन्दर प्रकाश से
इस धरती का कण कण
( सोहन लाल द्विवेदी )

SUNIL1107
14-04-2011, 10:24 PM
एक बार की बात
एक बार की बात सुनो तुम
चमकीली वह रात सुनो तुम ।
अपने आँगन में उतरी थी
तारों की बारात सुनो तुम ।।

गोलू आओ, बेबू आओ
निक्कू, चीनू तुम भी आओ ।
जब हम तुम जैसे बच्चे थे
मन के खरे और सच्चे थे ।

क़लम डुबो कर लिखते जिसमें
शीशे की दावात सुनो तुम ।।

नीले स्याही का जादू जब
सिर चढ़ कर बोला करता था ।
कोरे पन्नों पर सपनों का
पंछी पर तोला करता था ।

हर उड़ान में शामिल होती
अपने मन की बात सुनो तुम ।।

आम,बेर, इमली, जामुन के
पेड़ हमारे बड़े निकट थे ।
गूलर, नीम और बरगद के
पेड़ साथ ही खड़े विकट थे ।

महुआ झरते फूल सुनहरे
पीपल झरते पात सुनो तुम ।।

खेतों में पकते अनाज की
खुशबू से मन भर जाता था ।
ढिबरी सांझ ढले जब जलती
घन से घन तम डर जाता था ।

धुले-धुले से मन सबके थे
नहीं कहीं थी घात सुनो तुम ।।

लिपे-पुते घर की देहरी पर
ख़ुशियों का बारहमासा था ।
राग रसोई का मौसम तो
अपने घर अच्छा खासा था ।

कितने मन से हम खाते थे
तरकारी और भात सुनो तुम ।।

विद्यालय था तीन कोस पर
कोस अढ़ाई था बाज़ार ।
दूरी बीच नहीं आती थी
चलते थे सब कारोबार ।

अपने आँगन से गंगातट
किलोमीटर सात सुनो तुम ।।

जब तुम कुछ लिख-पढ़ जाओगे
सचमुच आगे बढ़ जाओगे ।
बचपन अपना याद करोगे
घर आँगन आबाद करोगे ।

मीठी यादों ने खिड़की में
रक्खे होंगे कान सुनो तुम ।।
( नील कमल )

SUNIL1107
15-04-2011, 08:40 PM
दोस्तों यह एक फ़िल्मी गीत है, यह है तो फिल्म में बड़े द्वारा गाया हुआ किन्तु जिक्र उसमें भी बच्चे का ही है ! आशा है आप लोगों को पसंद आएगा !

मेरे घर आई एक नन्ही परी
चाँदनी के हसीन रथ पे सवार
मेरे घर आई..

उसकी बातों में शहद जैसी मिठास
उसकी सासों में इतर की महकास
होंठ जैसे के भीगे-भीगे गुलाब
गाल जैसे के बहके-बहके अनार
मेरे घर आई ...

उसके आने से मेरे आंगन में
खिल उठे फूल गुनगुनायी बहार
देख कर उसको जी नहीं भरता
चाहे देखूँ उसे हज़ारों बार
मेरे घर आई ...

मैने पूछा उसे कि कौन है तू
हँसके बोली कि मैं हूँ तेरा प्यार
मैं तेरे दिल में थी हमेशा से
घर में आई हूँ आज पहली बार
मेरे घर आई ...
रचनाकार: साहिर लुधियानवी

SUNIL1107
15-04-2011, 08:42 PM
Happy birthday to you
Happy birthday to you

हम भी अगर बच्चे होते
नाम हमारा होता गबलू बबलू
खाने को मिलते लड्डू
और दुनिया कहती happy birthday to you
happy birthday to you

कोई लाता गुड़िया, मोटर, रेल
तो कोई लाता फिरकी, लट्टू
कोई चाबी का टट्टू
और दुनिया कहती happy birthday to you
happy birthday to you

कितनी प्यारी होती है ये भोली सी उमर
न नौकरी की चिन्ता न रोटी की फ़िक्र
नन्हे-मुन्ने होते हम तो देते सौ हुक्म
पीछे-पीछे पापा-ममी बनके नौकर
चाकलेट , बिस्कुट , टोफ्फी खाते और पीते दुद्दू
और दुनिया कहती happy birthday to you
happy birthday to you

कैसे-कैसे नख़रे करते घरवालों से हम
पल में हँसते पल में रोते करते नाक में दम
अक्कड़-बक्कड़ लुक्का-छुपी कभी छुआ-छू
करते दिन भर हल्ला-गुल्ला दंगा और उधम
और कभी ज़िद पर अड़ जाते जैसे अड़ियल टट्टू
और दुनिया कहती happy birthday to you
happy birthday to you

अब तो है ये हाल के जब से बीता बचपन
माँ से झगड़ा बाप से टक्कर बीवी से अनबन
कोल्हू के हम बैल बने हैं धोबी के गधे
दुनिया भर के डण्डे सर पे खायें दना-दन
बचपन अपना होता तो न करते ढेँचू-ढेँचू
और दुनिया कहती happy birthday to you
happy birthday to you
रचनाकार: शकील बदायूनी

SUNIL1107
15-04-2011, 08:48 PM
नानी तेरी मोरनी को, मोर ले गए
बाकी जो बचा था, काले चोर ले गए

खाके पीके मोटे होके, चोर बैठे रेल में
चोरों वाला डिब्बा कट कर, पहुँचा सीधे जेल में
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए ...

उन चोरों की खूब ख़बर ली, मोटे थानेदार ने
मोरों को भी खूब नचाया, जंगल की सरकार ने
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए ...

अच्छी नानी प्यारी नानी, रूसा-रूसी छोड़ दे
जल्दी से एक पैसा दे दे, तू कंजूसी छोड़ दे
नानी तेरी मोरनी को, मोर ले गए ....
रचनाकार: शैलेन्द्र

SUNIL1107
15-04-2011, 08:50 PM
दादी-अम्मा दादी-अम्मा मान जाओ
छोड़ो जी ये ग़ुस्सा ज़रा हँस के दिखाओ

छोटी-छोटी बातों पे न बिगड़ा करो
ग़ुस्सा हो तो ठण्डा पानी पी लिया करो
खाली-पीली अपना कलेजा न जलाओ
दादी-अम्मा दादी-अम्मा मान जाओ...

दादी तुम्हें हम तो मना के रहेंगे
खाना अपने हाथों से खिला के रहेंगे
चाहे हमें मारो चाहे हमें धमकाओ
दादी-अम्मा दादी-अम्मा मान जाओ...

कहो तो तुम्हारी हम चम्पी कर दें
पियो तो तुम्हारे लिये हुक्का भर दें
हँसी न छुपाओ ज़रा आँखें तो मिलाओ
दादी-अम्मा दादी-अम्मा मान जाओ...

हमसे जो भूल हुई माफ़ करो माँ
गले लग जाओ दिल साफ़ करो माँ
अच्छी सी कहानी कोई हमको सुनाओ
दादी-अम्मा दादी-अम्मा मान जाओ...
रचनाकार: शकील बदायूनी

SUNIL1107
15-04-2011, 08:54 PM
लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा
घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा
दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा

घोड़ा पहुँचा चौक में, चौक में था नाई
घोड़ेजी की नाई ने हजामत जो बनाई
दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा
लकड़ी की काठी...

घोड़ा था घमण्डी पहुँचा सब्जी मण्डी
सब्जी मण्डी बरफ पड़ी थी बरफ में लग गई ठंडी
दौड़ा दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा
लकड़ी की काठी...

घोड़ा अपना तगड़ा है देखो कितनी चरबी है
चलता है महरौली में पर घोड़ा अपना अरबी है
बांह छुड़ा के दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा
लकड़ी की काठी...
रचनाकार: गुलज़ार

jalwa
16-04-2011, 12:34 AM
बचपन.. कितना प्यारा सा अहसास होता है जब हमें अपने बचपन की याद आती है.
काश... फिर से बचपन लौट आता. लेकिन मित्र, आपके सूत्र की चंद पंक्तियाँ पढ़ कर ही बचपन की यादें ताजा हो गईं.

SUNIL1107
18-04-2011, 04:15 PM
बचपन.. कितना प्यारा सा अहसास होता है जब हमें अपने बचपन की याद आती है.
काश... फिर से बचपन लौट आता. लेकिन मित्र, आपके सूत्र की चंद पंक्तियाँ पढ़ कर ही बचपन की यादें ताजा हो गईं.

आदरणीय नियामक जलवा जी सूत्र पर पधार कर प्रोत्साहन देने का बहुत बहुत आभार

SUNIL1107
19-04-2011, 01:09 PM
खिलोनेवाला
वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।

सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।

गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

मुन्*नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी

कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्*या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्*मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्*ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्*चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।

तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।

यही रहूँगा कौशल्*या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।

पर माँ, बिना तुम्*हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।

किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्*यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे़ देगा।
( सुभद्रा कुमारी चौहान )

SUNIL1107
19-04-2011, 01:12 PM
तितली और भौंरा
तितली रानी,
बड़ी सयानी,
बोली-भौंरे सुन!

ओ अज्ञानी,
पड़ी पुरानी,
तेरी ये गुनगुन!

कालू राजा,
खा के खाजा,
छेड़ नई-सी धुन!
( हरीश निगम )

sangita_sharma
19-04-2011, 01:16 PM
बच्चों के पापा तो आते हैं

और बच्चों की ममियां भी आती हे इस फोरम पर

SUNIL1107
19-04-2011, 02:43 PM
और बच्चों की ममियां भी आती हे इस फोरम पर

बच्चों की मम्मियों का इस सूत्र पर हार्दिक स्वागत, वंदन और अभिनन्दन स्लिमसीमा जी

SUNIL1107
23-04-2011, 03:24 PM
कंप्यूटर और दादी जी
कम्प्यूटर ले दादी बैठीं
उसको लगीं चलाने,
कम्प्यूटर चालाक बहुत था
उनको लगा चिढ़ाने ।

दादी ने ‘की-बोर्ड’ उठाया
कम्प्यूटर चिल्लाया,
'विंडो' खोला तो ज़बान से
उनको ख़ूब चिढ़ाया ।

'माउस' लेकर ज्यों दादी ने
थोड़ा-सा खिसकाया,
बिलकुल असली चूहे जैसा
उसने रूप दिखाया ।

दादी ने जब‘क़लम’लिखा तो
'मलक'लिखा दिखलाया,
लख्खी मल की मूँछें लेकर
हाथी पर चिपकाया ।

ग़ुस्से में दादी चिल्लाईं
जैसे शेर दहाड़ा,
अच्छा अपना अ,आ,इ,ई
रटना रोज़ पहाड़ा ।
( मोहम्मद साजिद खान )

SUNIL1107
26-04-2011, 08:56 PM
पकोड़ी की कहानी
दौड़ी-दौड़ी
आई पकौड़ी !


छुन-छुन छुन-छुन
तेल में नाची,
प्लेट में आ
शरमाई पकौड़ी !


दौड़ी-दौड़ी
आई पकौड़ी !


हाथ से उछली
मुह में पहुँची,
पेट में जा
घबराई पकौड़ी !


दौड़ी-दौड़ी
आई पकौड़ी !


मेरे मन को
भाई पकौड़ी !
(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

INDIAN_ROSE22
26-04-2011, 09:13 PM
सुनील जी रेपो तो बंता है ले लो

SUNIL1107
27-04-2011, 08:50 PM
बचपन
छीनकर खिलौनो को बाँट दिये गम ।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
अच्छी तरह से अभी पढ़ना न आया
कपड़ों को अपने बदलना न आया
लाद दिए बस्ते हैं भारी-भरकम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।

अँग्रेजी शब्दों का पढ़ना-पढ़ाना
घर आके दिया हुआ काम निबटाना
होमवर्क करने में फूल जाये दम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।

देकर के थपकी न माँ मुझे सुलाती
दादी है अब नहीं कहानियाँ सुनाती
बिलख रही कैद बनी, जीवन सरगम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।

इतने कठिन विषय कि छूटे पसीना
रात-दिन किताबों को घोट-घोट पीना
उस पर भी नम्बर आते हैं बहुत कम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
( जगदीश व्योम )

SUNIL1107
27-04-2011, 08:53 PM
सुनील जी रेपो तो बंता है ले लो



आपका बहुत बहुत धन्यबाद भारतीय गुलाब भाई

SUNIL1107
29-04-2011, 03:01 PM
मेरा घोड़ा
मेरा घोड़ा


लम्बा –चौड़ा


बहुत अनाड़ी ।



खाकर पत्ती


मार दुलत्ती


खींचे गाड़ी ।



सरपट दौड़े


पीछे छोड़े


नदी पहाड़ी ।



देखे –भाले


पोखर नाले


टीले झाड़ी ।


रामेश्वर कम्बोज 'हिमांशु'

SUNIL1107
29-04-2011, 03:02 PM
काली बिल्ली
काली बिल्ली


छोड़ गाँव को


भागी-भागी


आई दिल्ली ।



दौड़ लगाई,


लाल किले तक


मिला नहीं पर


दूध मलाई ।



दिन-भर भटकी ,


गली-गली में


चौराहों पर


आकर अटकी ।



अब यह आई,


बात समझ में-


जीभ चटोरी


है दुखदायी ।


(रामेश्वर कम्बोज 'हिमांशु')

SUNIL1107
29-04-2011, 03:04 PM
देश हमारा
सुन्दर प्यारा


देश हमारा


बहे यहाँ


गंगा की धारा ।


शीश हिमालय


छूता अम्बर ,


धोता है पग


इसके सागर ।


है सबकी –


आँखों का तारा ।


इस पर अपने


प्राण लुटाएँ ,


हम सब इसका


मान बढ़ाएँ ।


'भारत की जय !'


अपना नारा ।
(रामेश्वर कम्बोज 'हिमांशु')

SUNIL1107
30-04-2011, 06:23 PM
खुली पाठशाला फूलों की

पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में

फूल धूप की बस में आए




कुर्ते में जँचते गुलाब तो

टाई लटकाए पलाश हैं,

चंपा चुस्त पज़ामें में है -

हैट लगाए अमलताश है ।




सूरजमुखी मुखर है ज़्यादा

किंतु मोंगरा अभी मौन है,

चपल चमेली है स्लेक्स में

पहचानों तो कौन-कौन है ।




गेंदा नज़र नहीं आता है

जुही कहीं छिपाकर बैठी है,

जाने किसने छेड़ दिया है -

ग़ुलमोहर ऐंठी-ऐंठी है ।




सबके अपने अलग रंग हैं

सब हैं अपनी गंध लुटाए,

फूल धूप की बस में आए -

मुस्कानों के बैग सजाए ।

(तारादत्त निर्विरोध )

sangita_sharma
03-05-2011, 12:10 PM
मेरे दादा कुरता पहने
सीदा सादे
छड़ी घुमाते
घुमने जाते
फूल तोड़कर रोज़ वे लाते
मेरी दादी सिदी सादी
बिना दांतों के वो मुस्काती
हमे प्यार से गीत सुनती
मम्मी पापा को डांट पिलाती
दादा दादी दोनों प्यारे
सदा रहे वो साथ हमारे

sangita_sharma
03-05-2011, 12:13 PM
मोर सीखते नाच कंहा से
कोयल गाती कैसे
किसने तेज़ छलांग लगाना हिरनों को सिखलाया
मुर्गा कोई घडी देखता रोज़ सवेरे जैसे
कूद फांद करना बन्दर को कूद ही आया कैसे

kamesh
04-05-2011, 08:49 PM
मेरे दादा कुरता पहने
सीदा सादे
छड़ी घुमाते
घुमने जाते
फूल तोड़कर रोज़ वे लाते
मेरी दादी सिदी सादी
बिना दांतों के वो मुस्काती
हमे प्यार से गीत सुनती
मम्मी पापा को डांट पिलाती
दादा दादी दोनों प्यारे
सदा रहे वो साथ हमारे

सुन्दर पस्तुति

बल सुलभ कविता

ह्रदय से कही गयी

SUNIL1107
12-05-2011, 09:22 PM
बूढ़ी माँ ने धोकर दाने
आँगन में रख दिए सुखाने
धूप पड़ी तो हुए सुहाने
आई चिड़ियाँ उनको खाने



आओ बच्चो आओ चलकर
बूढ़ी माँ की मदद करें हम
चलो उड़ा दें दानों पर से
बजा बजा कर ताली हम तुम



वर्ना सोचो क्या खाएगी
वह तो भूखी रह जाएगी
चिड़ियों की यह फौज नहीं तो
सब दानें चट कर जाएगी।



आओ बच्चो आओ चलकर
बूढ़ी माँ का काम करें हम
नहीं हैं बच्चे उनके घर में
चलो न चलकर काम करें हम

(दिविक रमेश)

SUNIL1107
12-05-2011, 09:25 PM
सहयोग हेतु धन्यबाद सीमा जी

harry1
15-05-2011, 02:54 PM
बूढ़ी माँ ने धोकर दाने
आँगन में रख दिए सुखाने
धूप पड़ी तो हुए सुहाने
आई चिड़ियाँ उनको खाने



आओ बच्चो आओ चलकर
बूढ़ी माँ की मदद करें हम
चलो उड़ा दें दानों पर से
बजा बजा कर ताली हम तुम



वर्ना सोचो क्या खाएगी
वह तो भूखी रह जाएगी
चिड़ियों की यह फौज नहीं तो
सब दानें चट कर जाएगी।



आओ बच्चो आओ चलकर
बूढ़ी माँ का काम करें हम
नहीं हैं बच्चे उनके घर में
चलो न चलकर काम करें हम

(दिविक रमेश)
शानदार प्रस्तुति मित्र...

SUNIL1107
15-05-2011, 03:44 PM
शानदार प्रस्तुति मित्र...

धन्यबाद मित्र हैरी जी

SUNIL1107
20-05-2011, 01:51 PM
पुष्प

पुष्प तुम कितन अच्छे हो !
काँटों में भी खिल उठते हो,
सबसे मुस्काकर मिलते हो।
कभी नही करते हो शिकायत,
आए चाहे लाख मुसीबत।
उपवन की हो शान,
सभी को महक लुटाते हो।
पुष्प तुम कितने अच्छे हो।

मंडप हो या कोई उत्सव,
तुम हो, सबकी शोभा बढ़ाते।
देवों के सिर पर चढ़कर भी,
अंहकार का भाव न लाते।
मातृभूमि पर तन अर्पित कर,
जीवन की चाह मिटाते हो।
पुष्प तुम कितने अच्छे हो।

(शिवराज भारतीय)

SUNIL1107
26-05-2011, 07:57 PM
kamesh
Re: बाल मन को लुभाने वाले प्यारे प्यारे गीत और कवितायेँ


सुन्दर पस्तुति

बल सुलभ कविता

ह्रदय से कही गयी


Originally Posted by harry1
शानदार प्रस्तुति मित्र...

सूत्र पर आने का हार्दिक आभार कामेश जी, सीमा जी, और हैरी जी

SUNIL1107
26-05-2011, 08:00 PM
पापा की तनख़्वाह में
घर भर के सपने।

चिंटू का बस्ता,
मिंटी की गुड़िया,
अम्मा की साड़ी,
दादी की पुड़िया,
लाएँगे, लाएँगे
पापा जी अपने।

पिछला महीना तो
मुश्किल में काटा,
आधी कमाई में
सब्जी और आटा,
अगले में घाटे
पड़ेंगे जी भरने।

पापा की तनख़्वाह में
घर भर के सपने।

(रमेश तेलंग)

SUNIL1107
30-05-2011, 03:19 PM
चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
किधर चली ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
कुज-गली ।

चिड़िया रानी,
चिड़िया रानी,
पर निकले ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
नीम के तले ।

चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
टी टुट-टुट ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा
चाय-बिस्कुट ।

चिड़िया रानी
चिड़िया रानी,
टा-टा-टा ।

मुन्ने राजा
मुन्ने राजा,
सैर-सपाटा ।

(कन्हैया लाल मत्त)

SUNIL1107
30-05-2011, 03:21 PM
चिड़िया घर

जमनी ने मगनी से पु़छा,
आज बहिन क्यूं चली शहर को।
मगनी बोली बड़े प्रेम से,
आओं चलें हम चिड़ियाघर को।
चिड़ियाघर में नटखट बन्दर,
भोला भालू भी होता है।
जंगल का सम्राट सिंह भी,
पिंजडे़ में चक्कर खाता है।
खरहा, हिरण, चतुर लोमड़ी,
जम्बो हाथी से मिलने को।
आओं चलें हम चिड़ियाघर को।
रंग बिरंगे प्यारे-प्यारे,
दुनियां भर के पंछी सारे।
कुकडूं कूं और गुटरूं गूं का,
पीहू-पीहू संगीत पुकारे।
मोर, कपोता, हरियल तोता,
मधुर पपीहे से मिलते को।
आओं चलें हम चिड़ियाघर को।
नन्हीं जमनी सुनती जाती,
मगनी की चुटकीली बातें।
भोलेपन से इठलाकर के,
पूछा मगनी से सकुचाती।
छोटी सी चिड़िया के घर में,
कैसे आता जम्बो हाथी ?
मेरे बात समझ ना आती।
(शिवराज भारतीय)

SUNIL1107
30-05-2011, 03:26 PM
चित्र बनाएँ

आओ हम सब चित्र बनाएँ।
इन चित्रों में घुल-मिल जाएँ।।

आजादी का शंखनाद कर,
सोया राष्ट्र जगाने वाले,
दुःखियों को सहलाने वाले,
सबको गले लगाने वाले,
सदा नेह बरसाने वाले,
सत्य अंहिसा के रखवाले,
गाँधी जी का चित्र बनाएँ,
इन चित्रों पर दिए जलाएँ,
आओ हम सब चित्र बनाएँ।

मातृभूमि की आजादी हित,
बंदूकों की फसल उगाते,
गौरों के छक्के छुडवाते,
लाठी, गोली, फांसी खाते,
तनिक न कष्टों से घबराते।
वीर सावरकर, भगतसिंह,
बिस्मिल, ‘‘ आजाद ’’ का चित्र बनाएँ
इन चित्रों को खूब सजाएँ।

आओ हम सब चित्र बनाएँ।
लाल बाल और पाल सरीखे,
अंग्रेजो से टक्कर लेते,
सिर पर कफन बांध कर चलते,
रक्त के बदले में भारत की,
आजादी का सौदा करते।
आजादी हिंद के वीर जवानों,
नेताजी का चित्र बनाएँ
इन चित्रों पर पुष्प चढ़ाएँ।
आओ हम सब चित्र बनाएँ।

आजाद देश की आजादी हित,
निज अस्तित्व मिटाने वाले,
बैरी के भीषण हमलों सें,
भारत माँ को बचाने वाले।
देश पे मर मिटने वाले,
अगणित वीरों को शीश नवाएँ,
अमर शहीदी चित्र बनाएँ
इन चित्रों में घुल-मिल जाएँ।
आओ हम सब चित्र बनाएँ।

(शिवराज भारतीय)

SUNIL1107
30-05-2011, 03:29 PM
बापू तुम्हें कहूँ मैं बाबा, या फिर बोलूँ नाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

छड़ी हाथ में लेकरके क्यों, सदा साथ हो चलते?
दाँत आपके कहां गये, क्यों धोती एक पहनते?

हमें बताओ आखिर कैसे, तुम खाते थे खाना?
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

टीचर कहते हैं तुमने भारत आज़ाद कराया।
एक छड़ी से तुमने था दुश्मन मार भगाया।

कैसे ये हो गया अजूबा मुझे जरा समझाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।।

भोला–भाला सा मैं बालक, अक्ल मेरी है थोड़ी।
कह देता हूं बात वही जो, आती याद निगोड़ी।

लग जाए गर बात बुरी तो रूठ नहीं तुम जाना।
सपनों में आ कर के मेरे चुपके से बतलाना।

जाकिर अली "रजनीश"

SUNIL1107
31-05-2011, 09:51 PM
पंख नहीं मेरे अम्मा
पंख नहीं मेरे।
अम्माँ पंख दिला दो ना।

तितली से मँगवा दो ना,
मोरों से दिलवा दो ना,
गुण गाऊँगी
मैं तेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

मिल जाएँ जो मुझको पर
धरती से पहुँचूँ अंबर,
पल में कर लूँ
सौ फेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

उड़कर मिलूँ पतंगों से
इंद्रधनुष के रंगों से
घूमूँ परियों
के डेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

( हरीश निगम )

SUNIL1107
31-05-2011, 09:53 PM
पंडत श्री छदामी लाल
लाल टमाटर वांरा गाल
मोटो ताजो वांरो पेट
खावै पीवै मारै लेट।

सवा सेर पेडां री थाळी
झारो कर राखै निरवाळी।
एक टेम जीमण जुठण री
बरसां सूं वै रीत निभावै
छाबौ रोटी धामो सब्जी
हांडी भर राबड़ गटकावै।

जिण दिन बरत री बारी आवै
अन्न नही वै दिनभर खावै
केळा पेड़ा बरफी अमरस
रसगुल्लां सूं काम चलावै।

( शिवराज भारतीय )

SUNIL1107
31-05-2011, 09:56 PM
मई महीना आता है और,
जब गर्मी बढ़ जाती है ।
नानी जी के घर की मुझको,
बेहद याद सताती है ।।

तब मैं मम्मी से कहती हूँ,
नानी के घर जाना है ।
नानी के प्यारे हाथों से,
आइसक्रीम भी खाना है ।।

कथा-कहानी मम्मी तुम तो,
मुझको नही सुनाती हो ।
नानी जैसे मीठे स्वर में,
गीत कभी नही गाती हो ।।

मेरी नानी मेरे संग में,
दिन भर खेल खेलती है ।
मेरी नादानी-शैतानी,
हँस-हँस रोज़ झेलती हैं ।।

मास-दिवस गिनती हैं नानी,
आस लगाए रहती हैं ।
प्राची-बिटिया को ले आओ,
वो नाना से कहती हैं ।।

( रूपचंद शास्त्री "मयंक" )

SUNIL1107
01-06-2011, 08:55 PM
चंदा मामा, आ जाना, साथ मुझे कल ले जाना।

कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है।

चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में।
लेकिन वे पीते हैं पानी आकर मेरी प्याली में।

चंदा देता हमें चाँदनी, सूरज देता धूप।
मेरी अम्मा मुझे पिलातीं, बना टमाटर सूप।

थपकी दे-दे कर जब अम्मा, मुझे सुलाती रात में।
सो जाता चंदा मामा से, करता-करता बात मैं।

(द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

SUNIL1107
01-06-2011, 08:58 PM
सदा हमें समझाए नानी,
नहीं व्यर्थ बहाओ पानी ।
हुआ समाप्त अगर धरा से,
मिट जायेगी ये ज़िंदगानी ।

नहीं उगेगा दाना-दुनका,
हो जायेंगे खेत वीरान ।
उपजाऊ जो लगती धरती,
बन जायेगी रेगिस्तान ।

हरी-भरी जहाँ होती धरती,
वहीं आते बादल उपकारी ।
खूब गरजते, खूब चमकते,
और करते वर्षा भारी ।

हरा-भरा रखो इस जग को,
वृक्ष तुम खूब लगाओ ।
पानी है अनमोल रत्न,
तुम एक-एक बूँद बचाओ ।

(श्याम सुन्दर अग्रवाल)

SUNIL1107
03-06-2011, 03:36 PM
नन्हें-मुन्ने बच्चे ! तेरी मुट्ठी में क्या है ?


मुट्ठी में है तक़दीर हमारी

हमने किस्मत को वश में किया है !


भोली-भाली मतवाली आँखों में क्या है ?


आँखों में झूमे उम्मीदों की दीवाली

आने वाली दुनिया का सपना सजा है !


भीख में जो मोती मिलें, लोगे या न लोगे ?

ज़िन्दगी के आँसुओं का बोलो क्या करोगे ?


भीख में जो मोती मिलें तो भी हम न लेंगे

ज़िन्दगी के आंसुओं की माला पहिनेंगे

मुश्किलों से लड़ते-भिड़ते जीने में मज़ा है !


हमसे न छिपाओ, बच्चों ! हमें तो बताओ

आने वाली दुनिया कैसी होगी समझाओ ?


आने वाली दुनिया में सबके सर पे ताज होगा

न भूखों की भीड़ होगी, न दुखों का राज होगा

बदलेगा ज़माना, ये सितारों पे लिखा है !


नन्हें-मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?


मुट्ठी में है तकदीर हमारी

हमने किस्मत को वश में किया है !

(शैलेन्द्र)

SUNIL1107
03-06-2011, 03:39 PM
मुन्ना बड़ा प्यारा, अम्मी का दुलारा
कोई कहे चाँद, कोई आँख का तारा
हँसे तो भला लगे, रोये तो भला लगे
अम्मी को उसके बिना कुछ भी अच्छा न लगे
जियो मेरे लाल! जियो मेरे लाल!
तुमको लगे मेरी उमर, जियो मेरे लाल!
मुन्ना बड़ा प्यारा ...



इक दिन वो माँ से बोला- क्यूँ फूँकती है चूल्हा
क्यूँ ना रोटियों का पेड़ हम लगालें
आम तोड़ें रोटी तोड़ें रोटी-आम खा लें
काहे करे रोज़-रोज़ तू ये झमेला
अम्मी को आई हंसी, हँस के वो कहने लगी
लाल मेहनत के बिना रोटी किस घर में पकी
जियो मेरे लाल! जियो मेरे लाल!!
ओ जियो जियो जियो जियो जियो मेरे लाल!
मुन्ना बड़ा प्यारा ...



एक दिन यूँ छुपा मुन्ना, ढूंढे ना मिला मुन्ना
बिस्तर के नीचे, कुर्सियों के पीछे
देखा कोना-कोना, सब थे साँस खींचे
कहाँ गया, कैसे गया, सब थे परेशां
सारा जग ढूंढ थके, कहीं मुन्ना ना मिला
मिला तो प्यार भरी माँ की आँखों में मिला
जियो मेरे लाल! जियो मेरे लाल!!
ओ तुमको लगे मेरी उमर जियो मेरे लाल!!!
मुन्ना बड़ा प्यारा ...



जब साँझ मुस्कुराये, पश्*चिम में रंग उड़ाये
मुन्ने को ले के अम्मी दरवाज़े पे आ जाये
आते होंगे बाबा मुन्ने की मिठाई
लाते होंगे बाबा ...

(शैलेन्द्र)

sanjeetspice
04-06-2011, 10:50 PM
ये सभी तो नही लेकिन कुछ तो मेने भी बचपन में सुनी है

SUNIL1107
05-06-2011, 02:19 PM
ये सभी तो नही लेकिन कुछ तो मेने भी बचपन में सुनी है

सूत्र में पधारने का हार्दिक आभार संजीत जी

SUNIL1107
05-06-2011, 02:46 PM
ये सभी तो नही लेकिन कुछ तो मेने भी बचपन में सुनी है

कृपया इसी तरह उत्साह वर्धन करते रहें, आपका पुनः आभार

SUNIL1107
07-06-2011, 09:02 PM
एक बार की बात, चंद्रमा बोला अपनी माँ से
"कुर्ता एक नाप का मेरी, माँ मुझको सिलवा दे
नंगे तन बारहों मास मैं यूँ ही घूमा करता
गर्मी, वर्षा, जाड़ा हरदम बड़े कष्ट से सहता."
माँ हँसकर बोली, सिर पर रख हाथ,
चूमकर मुखड़ा

"बेटा खूब समझती हूँ मैं तेरा सारा दुखड़ा
लेकिन तू तो एक नाप में कभी नहीं रहता है
पूरा कभी, कभी आधा, बिलकुल न कभी दिखता है"
"आहा माँ ! फिर तो हर दिन की मेरी नाप लिवा दे
एक नहीं पूरे पंद्रह तू कुर्ते मुझे सिला दे."

(रामधारी सिंह दिनकर)

SUNIL1107
07-06-2011, 09:05 PM
हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला
सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला
सन-सन चलती हवा रात भर जाड़े से मरता हूँ
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही को भाड़े का
बच्चे की सुन बात, कहा माता ने 'अरे सलोने`
कुशल करे भगवान, लगे मत तुझको जादू टोने
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा
घटता-बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है
अब तू ही ये बता, नाप तेरी किस रोज लिवायें
सी दे एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आये!

(रामधारी सिंह दिनकर)

SUNIL1107
07-06-2011, 09:07 PM
चन्दा मामा दूर के
छिप-छिप कर खाते हैं हमसे
लड्डू मोती चूर के

लम्बी-मोटी मूँछें ऐंठे
सोने की कुर्सी पर बैठे
धूल-धूसरित लगते उनको
हम बच्चे मज़दूर के
चन्दा मामा दूर के।

बातें करते लम्बी-चौड़ी
कभी न देते फूटी कौड़ी
डाँट पिलाते रहते अक्सर
हमको बिना कसूर के
चन्दा मामा दूर के।

मोटा पेट सेठ का बाना
खा जाते हम सबका खाना
फुटपाथों पर हमें सुलाकर
तकते रहते घूर के
चन्दा मामा दूर के।

(अश्वघोष)

SUNIL1107
16-06-2011, 01:19 PM
गैस सिलेण्डर कितना प्यारा ।
मम्मी की आँखों का तारा ।।

रेगूलेटर अच्छा लाना ।
सही ढंग से इसे लगाना ।।

गैस सिलेण्डर है वरदान ।
यह रसोई-घर की है शान ।।

दूघ पकाओ, चाय बनाओ ।
मनचाहे पकवान बनाओ ।।

बिजली अगर नही है घर में ।
यह प्रकाश देता पल भर में ।।

बाथरूम में इसे लगाओ ।
गर्म-गर्म पानी से नहाओ ।।

बीत गया है वक़्त पुराना ।
अब आया है नया ज़माना ।।

जंगल से लकड़ी मत लाना ।
बड़ा सहज है गैस जलाना ।।

किन्तु सुरक्षा को अपनाना ।
इसे कार में नही लगाना ।

रूपचंद शास्त्री "मयंक"

SUNIL1107
16-06-2011, 01:23 PM
बच्चों को लगते जो प्यारे ।
वो कहलाते हैं गुब्बारे ।।

गलियों, बाज़ारों, ठेलों में ।
गुब्बारे बिकते मेलों में ।।

काले, लाल, बैंगनी, पीले ।
कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले ।।

पापा थैली भर कर लाते ।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते ।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में ।
गुब्बारे बिकते मेलों में ।।

फूँक मार कर इन्हें फुलाओ ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ ।।

सजे हुए हैं कुछ दुकान में ।
कुछ उड़ते हैं आसमान में ।।

मोहक छवि लगती है प्यारी ।
गुब्बारों की महिमा न्यारी !!

रूपचंद शास्त्री "मयंक"

SUNIL1107
16-06-2011, 01:25 PM
सममुच बहुत बुरा है गुस्*सा।
गुस्*से में सब उल्*टा-पुल्*टा।

गुस्*से में है तोड़ा-फोड़ी।
गुस्*से में है नाक-सि*कोड़ी।

गुस्*से में है मारा-मारी।
गुस्*सा है गड़बड़ बीमारी।

जब आए तब चलता कर दो।
हँसकर मुँह में हलुवा भर दो।

रमेश तेलंग

TIGERLOVE
16-06-2011, 01:30 PM
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥♥
| सबसे पहले एक अछे सूत्र की शुरुवात करने के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाये |
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥♥
चन्दा मामा दूर के~~~

छिप-छिप कर खाते हैं हमसे
लड्डू मोती चूर के
लम्बी-मोटी मूँछें ऍंठे
सोने की कुर्सी पर बैठे
धूल-धूसरित लगते उनको
हम बच्चे मज़दूर के
चन्दा मामा दूर के।

बातें करते लम्बी-चौड़ी
कभी न देते फूटी कौड़ी
डाँट पिलाते रहते अक्सर
हमको बिना कसूर के
चन्दा मामा दूर के।

मोटा पेट सेठ का बाना
खा जाते हम सबका खाना
फुटपाथों पर हमें सुलाकर
तकते रहते घूर के
चन्दा मामा दूर के।
-डॉ० अश्वघोष
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥♥

SUNIL1107
16-06-2011, 01:37 PM
सच्चाई

ना तीर न तलवार से मरती है सचाई
जितना दबाओ उतना उभरती है सचाई

ऊँची उड़ान भर भी ले कुछ देर को फ़रेब
आख़िर में उसके पंख कतरती है सचाई

बनता है लोह जिस तरह फ़ौलाद उस तरह
शोलों के बीच में से गुज़रती है सचाई

सर पर उसे बैठाते हैं जन्नत के फ़रिश्ते
ऊपर से जिसके दिल में उतरती है सचाई

जो धूल में मिल जाय, वज़ाहिर, तो इक रोज़
बाग़े-बहार बन के सँवरती है सचाई

रावण की बुद्धि, बल से न जो काम हो सके
वो राम की मुस्कान से करती है सचाई
उदय प्रताप सिंग

SUNIL1107
16-06-2011, 01:52 PM
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥♥
| सबसे पहले एक अछे सूत्र की शुरुवात करने के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाये |
♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥♥ ♥♥♥
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धन्यबाद मित्र सुत्र पर पधारने का एवं उत्साहवर्धन का बहुत बहुत शुक्रिया

SUNIL1107
21-06-2011, 04:41 PM
काश ! कभी परियाँ दे जातीं
हमें घड़े भर पैसे ?
जेब-ख़र्च को दो पाई भी
मिले नहीं मम्मी से ।

सोचो कितना अच्छा होता
जाती मौज मनाई,
खाते बर्फी, पेड़े, लड्डू
चमचम सभी मिठाई ।

जेबें रहतीं गरम हमारी
मुँह में रहती टॉफ़ी,
फ़िर रसगुल्लों की चोरी कर
नहीं माँगते माफ़ी ।

राजा बनते और न रहते
कोई ऐसे-वैसे !
नया-नया फिर बल्ला होता
बॉल सैकड़ों लाते,
कई बॉलें खो जातीं तो भी
आँसू नहीं बहाते ।

जाते पिकनिक, सैर - सपाटा
कुल्लू और मनाली,
नहीं किसी बच्चे की होती
तब तो जेबें ख़ाली ।

सच हो जाते,फिर तो मन के
सपने कैसे-कैसे !

( मोहम्मद साजिद खान )

SUNIL1107
21-06-2011, 04:44 PM
घर है छोटा देश हमारा।

चाची तो गुजरात से आई,
और पंजाब की हैं भरजाई
ताई जी हैं राजस्थानी,
बोलें- ‘म्हारा...थारा.. !

सुबह ढोकले, पूरन-पूरी,
शाम बने रोटी तंदूरी,
उसके ऊपर हरी मिर्च की
चटनी का चटकारा।

मम्मी-पापा, ताया-ताई,
भाई जी उनकी भरजाई,
छोटे-से घर में हिलमिल कर
सारे करें गुज़ारा।

घर है छोटा देश हमारा।

( रमेश तेलंग )

SUNIL1107
21-06-2011, 04:47 PM
मूंगफलियों ने मरहम लगाया हमें
घाव दे कर गए जब बादाम.

कैसे भूलें, कहो, उनके अहसान को
जो हमारे कलेजे से लगके रहे,
जब अँधेरा घना छा गया सामने
बन के दीपक जो आँखों में जलते रहे

तंग गलियों ने रस्ता दिखाया हमें
राजपथ पर लगा जब भी जाम.

शोहरतें हमको भाईं न कंक्रीट की
गीली मिटटी ही मन में महकती रही,
काम आई फटी जेब अपनी बहुत
जब मुखौटे ये दुनिया बदलती रही,

मुश्किलों में इसी ने बचाया हमें,
मुफ्त बँटने लगे जब ईनाम.

( रमेश तेलंग )

SUNIL1107
21-06-2011, 04:50 PM
धूप

बिखरी क्या चटकीली धूप
लगती बड़ी रुपहली धूप

कहो कहाँ पर रहती बाबा
कैसे आती जाती है
इतनी बड़ी धूप का कैसा
घर है, कहाँ समाती है
बिना कहे ही चल देती, है
क्यों इतनी शरमीली धूप?

क्या इसको टहलाने लाते
सूरज बाबा दूर से
देर रात तक ठहर न पाते
दिखते क्यों मजबूर से
जब देखो तब सूखी, होती
कभी नहीं क्या गीली धूप

कभी पेड़ से चुपके-चुपके
आती है दालान में
और कभी खिड़की से दाखिल
होती लगे मकान में
आग लगाती आती, है क्या
यह माचिस की तीली धूप!

( कृष्ण शलभ )

SUNIL1107
21-06-2011, 04:52 PM
धूप

लि*ए हाथ में फूल छड़ी।
आंगन में है धूप खड़ी।

झरने जैसी झरती है।
आंख-मि*चौली करती है।

पर्वत पर चढ़ जाती है।
सागर पर इठलाती है।

दि*न भर शोर मचाती है।
शाम ढले सो जाती है।

( रमेश तेलंग )

SUNIL1107
21-06-2011, 04:54 PM
धूप

गरमी में तन झुलसाती है
जाड़े में मन भाती धूप
कभी गुनगुनी कभी सुनहली
धूप बदलती रहती रूप।

( शिवराज भारतीय )

honymoon
25-06-2011, 10:22 PM
वाह वाह क्या बात हे और पोस्ट करते चलो

SUNIL1107
28-06-2011, 09:40 PM
वाह वाह क्या बात हे और पोस्ट करते चलो

धन्यबाद मित्र मधुचंद्र जी

SUNIL1107
10-07-2011, 02:48 PM
दस शिशु कवितायेँ

बन्दर
खों-खों करके
उछला बन्दर ।
जो जीते
कहलाए सिंकन्दर ।।

तोता
टिउ - टिउ जब
तोता बोला ।
पिंकी ने
पिंजरे को खोला ।।

चूहा
चूँ - चूँ करके
चूहा बोला ।
सूरज गरम
आग का गोला ।।

बिल्ली
बिल्ली बोली
म्याऊँ-म्याऊँ ।
दूध मलाई
डट के खाऊँ ।।

घोड़ा
घोड़ा जोर से
हिनहिनाया ।
हमने
अनुशासन अपनाया ।।

बकरी
में- में कर
बकरी मिमियाई ।
हमको भाती
खूब मिठाई ।।

मेंढक
टर्र - टर्र
मेंढक टर्राया ।
मेहनत से
ना मैं घबराया ।।

गधा
ढेचूँ-ढेचूँ
गधा जो रेंका ।
कचरा
कूड़ेदान में फेंका ।।

कुत्ता
भौं - भौं करके
कुत्ता भौंका ।
आया इक
आंधी का झोंका ।।

शेर
हूँ-हूँ करके
शेर दहाड़ा ।
मंदिर में
बज उठा नगाड़ा ।।

(दीनदयाल शर्मा )

BHARAT KUMAR
12-07-2011, 02:26 AM
हा हा बंधू सुनील कहा से निकाल लाये ये खजाना! बढ़िया सूत्र है और कवितायेँ भी वास्तव में बच्चों के लिए ही हैं! सूत्र को जारी रखने के लिए धन्यवाद!

SUNIL1107
12-07-2011, 03:17 PM
हा हा बंधू सुनील कहा से निकाल लाये ये खजाना! बढ़िया सूत्र है और कवितायेँ भी वास्तव में बच्चों के लिए ही हैं! सूत्र को जारी रखने के लिए धन्यवाद!


बहुत बहुत धन्यबाद BHARAT जी !

KHIL@DI_720
12-07-2011, 03:36 PM
एक हमारी तरफ से ...

एक छींक आई नंदू को
एक रोज़ वह इतना छींका
इतना छींका , इतना छींका

इतना छींका , इतना छींका
पत्ते सभी उड़ गए पेड़ के
धोखा उसे हुआ आंधी का |

SUNIL1107
12-07-2011, 09:25 PM
सहयोग का धन्यबाद दोस्त

SUNIL1107
18-07-2011, 07:25 PM
तिल्ली सिंग

पहने धोती कुरता झिल्ली
गमछे से लटकाये किल्ली
कस कर अपनी घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह जा पहुँचे दिल्ली

पहले मिले शेख जी चिल्ली
उनकी बहुत उड़ाई खिल्ली
चिल्ली ने पाली थी बिल्ली
तिल्ली ने थी पाली पिल्ली

पिल्ली थी दुमकटी चिबिल्ली
उसने धर दबोच दी बिल्ली
मरी देख कर अपनी बिल्ली
गुस्से से झुँझलाया चिल्ली

लेकर लाठी एक गठिल्ली
उसे मारने दौड़ा चिल्ली
लाठी देख डर गया तिल्ली
तुरंत हो गई धोती ढिल्ली

कस कर झटपट घोड़ी लिल्ली
तिल्ली सिंह ने छोड़ी दिल्ली
हल्ला हुआ गली दर गल्ली
तिल्ली सिंह ने जीती दिल्ली !


(राम नरेश त्रिपाठी)

SUNIL1107
18-07-2011, 07:33 PM
दही-बड़े हम
दही-बड़े ।
दौड़े आओ
मत शरमाओ ,
खाओ भाई खड़े-खड़े ।


स्वाद मिलगा
कहीं न ऐसा
चखकर देखो,
फेंको पैसा
बड़ी चटपटी
हँसी हमारी ,
खट्टे-मीठे हैं नखरे ।


डंका हमने
ख़ूब बजाया,
अजब अनोखा
रंग जमाया
ठेले पर हैं
खड़े हुए
लाला, बाबू बड़े-बड़े ।

दही-बड़े हम
दही-बड़े ।

( प्रकाश मनु )

SUNIL1107
18-07-2011, 07:42 PM
भेद-भाव निज-परता की,
बातों से है अनजान।
भोली सी, प्यारी सी,
इक नन्हीं मुस्कान।

सबके मन में स्नेह जगाती,
कोमल कली सी खिल जाती।
हंसी-ख़ुशी और प्रेम है जिसके,
जीवन का वरदान।
भोली सी, प्यारी सी,
इक नन्हीं मुस्कान।

सब है अपने, नहीं पराया,
ऊँच-नीच का भेद न पाया।
इस माटी में हम जन्में है,
सब है एक समान।
भोली सी, प्यारी सी,
इक नन्हीं मुस्कान।

( शिवराज भारतीय )

SUNIL1107
24-07-2011, 07:08 PM
पेड़

टिंकू से यह बोला पेड़
टिंकू मुझको अधिक न छेड़
शायद तुझ पर काम नहीं
पर मुझको आराम नहीं
देख अभी नभ में जाना है
बादल से पानी लाना है
जीवों को वायु देनी है
मिट्टी को आयु देनी है
ईंधन देना है बुढ़िया को
मीठे फल देना गुड़िया को
अभी बनाना ऐसा डेरा
पक्षी जिसमें करें बसेरा
इंसानों के रोग हरूँगा
और बहुत से काम करूँगा
टिंकू कर मत पीछा मेरा
मैं धरती का पूत कमेरा


(अश्वघोष):group-dance::group-dance::group-dance:

SUNIL1107
24-07-2011, 07:14 PM
पेड़

जीवन के श्रृंगार पेड़ हैं,
जीवन के आधार पेड़ हैं ।

ठिगने लम्बे मोटे पतले,
भाँत-भँतीले डार पेड़ हैं ।

आसमान में बादल लाते,
बरखा के हथियार पेड़ हैं ।

बीमारों को दवा ये देते,
प्राणवायु औज़ार पेड़ हैं ।

रबड़ काग़ज़़ लकड़ी देते,
पक्षियों के घरबार पेड़ हैं ।

शीतल छाया फल देते हैं,
कितने ये दातार पेड़ हैं ।

खुद को समर्पित करने वाले,
ईश्वर के अवतार पेड़ हैं ।।


(दीनदयाल शर्मा) :group-dance::group-dance::group-dance:

Teach Guru
26-07-2011, 12:57 AM
मित्र सुनील आपके सामान्य मंच के सभी सूत्र अच्छे है ............

SUNIL1107
26-07-2011, 02:23 PM
मित्र सुनील आपके सामान्य मंच के सभी सूत्र अच्छे है ............

:salut::salut::salut:

SUNIL1107
20-04-2012, 02:16 PM
चूहा-बिल्ली

बिल्ली-चूहा, चूहा-बिल्ली,
साथ-साथ जब पहुँचे दिल्ली ।
घूमे लालकिले तक पहले,
फिर इंडिया गेट तक टहले ।
घूमा करते बने-ठने से,
इसी तरह वे दोस्त बने से ।

(शेरजंग गर्ग )

SUNIL1107
20-04-2012, 02:20 PM
खिलौनेवाला
सुभद्राकुमारी चौहान

वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।

सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।

गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

मुन्*नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी

कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्*या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्*मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्*ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्*चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।

तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।

यही रहूँगा कौशल्*या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।

पर माँ, बिना तुम्*हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।

किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्*यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे़ देगा।