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Thread: जापान के हर घर में जाने जाते हैं ये ‘बोस’, भारत ने की है भरपूर अनदेखी

  1. #11
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    जब नेताजी बोस भारत छोड़कर जर्मनी पहुंचे तो रास बिहारी बोस को लगा कि सुभाष चंद्र बोस से बेहतर कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं हो सकता। वेटरन बोस ने यंग बोस को आमंत्रित किया। बैंकाक में हुई लीग की दूसरी कॉन्फ्रेंस में रास बिहारी बोस ने नेताजी बोस को आमंत्रित करने का फैसला लिया।
    यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है |

  2. #12
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    जर्मनी से यू बोट में बैठकर 20 जून 1943 को सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंचे। जापान पहुंचे तो रास बिहारी बोस उनसे मिले, रास बिहारी बोस को सुभाष चंद्र बोस से काफी आशाएं थीं, दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे, एक दूसरे के प्रशंसक थे। 5 जुलाई को वो सिंगापुर पहुंचे, नेताजी का जोरदार स्वागत हुआ और उसी दिन रास बिहारी बोस ने लीग और इंडियन नेशनल आर्मी की कमान नेताजी को सौंप दी, और खुद को सलाहकार के रोल तक सीमित कर लिया। यहां से नेताजी बोस की असली लड़ाई शुरू होती है। रास बिहारी बोस उसके बाद उनका ज्यादा साथ नहीं दे पाए क्योंकि फेफड़ों में संक्रमण के चलते उनको हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा था, लेकिन जापान में अपने नाम और रिश्तों के जरिए सुभाष चंद्र बोस की जो मदद हो सकती थी, उन्होंने की। जापान सरकार ने जापान के इस भारतीय दामाद को जापान के दूसरे सबसे बड़े अवॉर्ड ‘ऑर्डर ऑफ दी राइजिंग सन’ से सम्मानित किया।
    यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है |

  3. #13
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    आज हालत ये है कि इतिहास विषय के अध्येताओं को छोड़ दिया जाए तो आजाद हिंद फौज के गठन में नेताजी बोस के अलावा किसी और को कोई जानता तक नहीं है, मोहन सिंह या रास बिहारी बोस के उस योगदान का जिक्र कहीं नहीं होता। किसी ने नहीं सोचा कि सुभाष चंद्र बोस कैसे विदेशी धरती पर जाकर इतनी बड़ी फौज कुछ दिनों में ही तैयार कर लेते हैं। सोचिए कितना मुश्किल हुआ होगा विदेशी धरती पर विदेशी सेनाओं से भारतीय सैनिकों को इकट्ठा करके इतनी बड़ी आजाद हिंद फौज खड़ी करना, उनका खर्चा, हथियार, वर्दी और विदेशी धरती पर राजनीतिक समर्थन जुटाना।
    यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है |

  4. #14
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    रास बिहारी बोस के खून में क्रांति थी, युवावस्था से ही वो क्रांतिकारियों के सानिध्य में आ गए थे। बंकिम चंद्र चटर्जी की किताब आनंद मठ और विवेकानंद से प्रेरणा लेकर वो क्रांतिकारियों से जुड़ तो गए, लेकिन 1908 के अलीपुर बम कांड के बाद क्रांतिकारियों की इतनी तेजी से और बड़े पैमाने पर धरपकड़ हुई कि उनका भी नाम आ गया। वो वहां से शिमला चले गए, कसौली में एक नौकरी की, उसके बाद देहरादून आ गए। उस वक्त बाघा जतिन युगांतर पार्टी को बंगाल से बाहर विस्तार कर रहे थे, पंजाब और बंगाल उन दिनों क्रांतिकारियों के दो गढ़ थे। रास बिहारी दोनों प्रदेशों के बीच लिंक के तौर पर काम करने लगे। यूपी और बिहार में भी क्रांतिकारियों को उन्होंने युगांतर पार्टी से जोड़ा।
    यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है |

  5. #15
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    अंग्रेजों ने भी बंगाल में क्रांतिकारियों की बढ़ती गतिविधियों को देखकर 1912 में राजधानी दिल्ली ले जाने की योजना बना ली और तब बना लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने का मास्टर प्लान, वो भी दिल्ली में प्रवेश के वक्त। जब लॉर्ड हॉर्डिंग वाला केस हुआ तो कुछ ही महीने में ब्रिटिश पुलिस को पता चल गया कि रास बिहारी मास्टर माइंड हैं, लेकिन वो अंडरग्राउंड हो गए। उनके ऊपर 75 हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया गया। सोचिए उसके तिरेसठ साल बाद शोले फिल्म में गब्बर सिंह पर रखा पचास हजार रुपये का इनाम उस वक्त कितना बड़ा माना गया था। इधर ‘गदर क्रांति’ का प्लान बन चुका था, पिंगले ने गदर पार्टी की कमान रास बिहारी के कंधों पर डाल दी। अमेरिका से भारत तक के तमाम क्रांतिकारी 1857 जैसी क्रांति करना चाहते थे। लेकिन एक गद्दार कृपाल सिंह की वजह से गदर फेल हो गया, तमाम क्रांतिकारी पकड़े गए। रास बिहारी बोस रवींद्र नाथ टैगोर के एक रिश्तेदार की मदद से ब्रिटिश पासपोर्ट पर जापान निकल भागे।
    यदि कहने के लिए कुछ अच्छा नहीं हो तो चुप रहना एक बेहतर विकल्प है |

  6. #16
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    हालांकि इतिहास की कुछ किताबों में ये दावा किया गया है कि उनकी अस्थियों को उनकी बेटी तेस्तु हिगुची भारत लेकर आईं, अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए। अगर उस वक्त उनका विसर्जन नहीं हुआ और 2013 में दोबारा उन्हें लाया गया तो देश और मीडिया को इस साइलेंट क्रांतिकारी का सम्मान करना और याद करना तो बनता ही था। बहुत से लोग तो इस लेख को पढ़कर पहली बार रास बिहारी बोस को जानेंगे, इससे बेहतर तो जापानी हैं कम से कम जानते तो हैं, भले ही ‘करी’ की वजह से सही।
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  7. #17
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    हालांकि इतिहास की कुछ किताबों में ये दावा किया गया है कि उनकी अस्थियों को उनकी बेटी तेस्तु हिगुची भारत लेकर आईं, अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए। अगर उस वक्त उनका विसर्जन नहीं हुआ और 2013 में दोबारा उन्हें लाया गया तो देश और मीडिया को इस साइलेंट क्रांतिकारी का सम्मान करना और याद करना तो बनता ही था। बहुत से लोग तो इस लेख को पढ़कर पहली बार रास बिहारी बोस को जानेंगे, इससे बेहतर तो जापानी हैं कम से कम जानते तो हैं, भले ही ‘करी’ की वजह से सही।


    बहुत ही अच्छी जानकारी

    मैंने काफी कुछ पढ़ा है रास बिहारी बोस के बारे में, फिर भी इस सूत्र में कुछ नयी जानकारी मिली है

    धन्यवाद
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  8. #18
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    ये लेख पढकर बहुत दुख हुआ जिस व्यक्ति ने आजादी के लिये महत्वपूर्ण कार्य किया उन्हें भुला दिया गया है

  9. #19
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    क्रांतिकारियों के बारे में जानने की तीव्र जिज्ञासा में क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ते समय रास बिहारी के बारे में कहीं -2 थोडा बहुत पढ़ा तो था
    परन्तु आज आपका लेख पढ़ कर इनके बारे में थोडा ज्यादा ही जान पाया |
    आपको बहुत -2 धन्यबाद |

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