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Thread: तंत्र की अलौकिक दुनिया , मेरे यात्रा वृतांत

  1. #701
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    Quote Originally Posted by Ashish1983 View Post
    आपकी लेखन शैली का कायल हो चुका हूं । आपको मात्र एक अच्छे प्रकाशक की आवश्यकता है बस आपकी प्रसिद्धि में देर नहीं। एक निवेदन है कृपया श्रृंखला को इतना लम्बा न खीचें कि पढ़ने की प्यास में प्यास मर ही जाये॥ एक बार पुनः अपडेट के लिये धन्यवाद।
    Quote Originally Posted by sumitraj View Post
    आदरणीय प्रेम सागर सर्
    मैं इत्तेफ़ाक़न इस पेज से जुड़ा और आपकी कहानी मुझे जोड़ी राकी है।मैं आपके इस कहानी को पूरा पढ़ना चाहता हूँ,आपके कलाम मे जो जादू है उसे हमलोगों को भी जानने का मौका दें।
    धन्यवाद????
    Quote Originally Posted by Balrajg1970 View Post
    अपडेट के लिये धन्यवाद।
    Quote Originally Posted by sumitraj View Post
    Mahasay
    Ye Dil mange more..
    Tnx for update ????
    Quote Originally Posted by Loka View Post
    प्रेम जी हम सब आपके अपडेट की प्रतीक्षा कर रहे है
    सभी मित्रो को सूत्र भ्रमण एवं प्रेममय शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद !
    मित्रो थोडा समयाभाव है , विलम्ब के लिए छमा करे !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  2. #702
    वेबमास्टर Loka's Avatar
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    प्रेम जी अपडेट के लिए धन्यवाद, पर अपडेट तनिक छोटा है, हम सब सलोनी व महानाग के बारे में जानने को उत्सुक है, कृपा समय निकाल कर 4-5 अपडेट साथ में ही दे दीजिये |
    लोग मुझ पर हँसते है क्यों की मैं सबसे अलग हूँ, मैं उन पर हँसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे है |

  3. #703
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    तभी साधू ने अलख में कुछ भोग सामग्री अर्पित की ,,,,,, और अलख एक बार फिर से लपलपा उठी !
    कुछ छण के लिए अलाखालोक तीव्र हुवा , और खोपड के पीछे छाया रूपी हलचल मूर्ति रूप ले उठी !

    वहा दो सर्प इधर उधर टहल रहे थे ! कुछ बेचैन ,, कुछ क्रोधित , परन्तु कुछ सहमे हुवे से ! वो बार बार अपना फन पथरीले फर्श पर रगदते ,, जैसे कुछ विवशता सी हो ! शायद वो उस समय किसी शक्ति के वश में थे ! तभी में चौक पड़ा ! ये तो साधू के रक्क्षक सर्पो की प्रजाती के ही सर्प थे !
    ‘’’’’’’’’“कही ये वही तो नहीं” ? ,,,,,,,,
    ‘’’’’’’’’’’परन्त?? ? साधू ने उन्हें क्यों विवश कर रखा है “””””? ,,,,,,मस्तिश्क में प्रश्न कौधा !
    ‘’’’’’’’’’शायद सात्विक नाग के तामसिक रूप के विरोध का परिणाम ? .....
    ‘’’’’’’’’ या फिर तंत्र किया का विरोध ?
    “ या फिर कोई और कारण ???????????

    तभी मुझे कुछ याद आया ! साधू के तप्त कुंड पर खड़िया वध के उपरांत कहे गए शब्द मेरे कानो में गूंजने लगे ! खड़िया द्वारा , उसी प्रजाति के सर्पो का प्रशिक्क्षण , ! दमन जी द्वारा इनके जैसे सर्पो का निरसा के डेरे के आस पास देखा जाना !

    “कही ये खडिया के पालतू सर्प तो नहीं ? “.... जो खड़िया के मृत्यु दंड का कारण बने ?
    लेकिन फिर किसी साए की तरह हमेशा साधू के साथ रहने वाले वो रक्षक सर्प कहा है ?
    मस्तिश्क में प्रश्न कौधते रही , शंकाए बड़ती रही ,,, लेकिन उत्तर नदारत !


    “कितना समय शेष है रे झीगुर “ ,,,,,,,,,साधू के गंभीर शब्दों में मेरी तन्द्रा भंग की !
    करीब ३० मिनट महराज ,,, झीगुर अदब से बोला !
    हूऊ,,,,,,,,,,,,, हमें शीघ्रता करती होगी ! साधू ने कहा !


    तभी साधू ने बगल में रखे जल का पात्र उठाया , मुह में कुछ जल लिया और उसी स्थित में मंत्रोत्चारण करने लगे ! मुह से कुछ अस्पस्ट सी ध्वनिया निकलती रही , और फिर उन्होंने वो पानी एक दुसरे पात्र में उगल दिया ! फिर से मंत्र पाठ करते हुवे साधू में उस जल में कुछ काले सरसों के दानो का भोग दिया , उचक कर अलख के कोने से थोड़ी भभूत लेकर अभिमंत्रित की और उसे भी जल पात्र में डाल दिया !
    “झीगुर ,,,,,” कन्या को टेक दे ! साधू में वो जल पात्र निरसा के सहायक की ओर बढ़ा दिया !


    साधू की ये क्रिया मेरी जानी पहचानी थी ! साधू टेक क्रिया के अंतिम चरण का पूजन संपन कर रहे थे ! बाकी क्रियाये संभवतः उन्होंने मेरे आगमन से पूर्व ही कर ली थी !
    टेक क्रिया का प्रयोग बहुधा गुनी गुरुओ द्वारा उनके क्रिया संचालन का भोग शिष्यों को प्रदान करने के लिए किया जाता है ! इस क्रिया में गुरु शिष्य का टेक लेकर क्रिया करता है और वह क्रिया तांत्रिक रूप से शिष्य द्वारा संचालित हुवी मानी जाती है और उसका फल भी शिष्य को ही मिलता है !


    वहाँ सर्पो के उस प्राचीन गुफा मंदिर में साधू महाराज सलोनी की टेक लेकर आगे की क्रिया का सञ्चालन करने वाले थे ! शायद सलोनी के प्रचंड शक्तिशाली ग्रहयोग से की गयी क्रियाये ही अब मंदिर के गर्भ गृह का द्वार खोल सकती थी ! शायद वही वो छण था , जिसके लिए उस फूल सी बच्ची का अपाहरण किया गया था !


    तभी मेरे मष्तिष्क में कुछ शब्द गूंजे !!!!!!!
    ‘’’’’’’’’’’’’’’’?? ?’’’’कुछ अस्पष्ट सा ,,,,
    कर्ण तो सुप्त ही थे ,,,’’’’’’’’’’’’’’’?? ?’’’’’’’’’’’
    परन्तु मष्तिष्क के एकदम अन्धारुनी भाग में मानो कोई फुसफुसा रहा था !
    Last edited by prem_sagar; 13-12-2017 at 03:59 PM.
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  4. #704
    वेबमास्टर Loka's Avatar
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    बहुत ही बढ़िया अपडेट, सर्पों की इस तरह विवशता का क्या कारण हो सकता है ये तो आपके आगे के अपडेट में ही पता चलेगा
    लोग मुझ पर हँसते है क्यों की मैं सबसे अलग हूँ, मैं उन पर हँसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे है |

  5. #705
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    मेने चौक कर फुसफुसाहट पर ध्यान केंत्रित करने का प्रयत्न किया , परन्तु अब एक बार फिर से मष्तिष्क में सबकुछ शांत था !
    ‘’’’’’’’कोई अन्तः शब्द नहीं ,!
    ,,,थे तो सिर्फ कर्णइंद्रियों पर पड़ते साधू के टेक क्रिया के उपसंहार के मंत्रोत्चार !
    ‘’’’’’’’’’’’’’’ क्या था वह ,,,,,, शायद मन का वहम ???
    ‘’’’’’’’’’’’’’’ या केंदीय गार में उपस्थित तंत्र शक्तियों का स्पंदन !!!!!! ,

    मेने अपना सर झटक कर विचारो से निजाद पाई और कक्ष में चलती क्रिया का अवलोकन करने लगा !
    साधू ने टेक क्रिया सम्पन कर ली थी और अभी फिर से ताम्र पत्रों को उलट पुलट रहे थे ! संभवतः आगे की क्रिया भी उन्ही ताम्र पत्रों में वर्णित विधी से ही संपन की जाने वाली थी !

    साधू ने संभवतः अंतिम चरण का आह्वाहन शुरू किया था ! ताम्र पत्रों से देख कर मंत्रोत्चार चलता रहा और चलती रही आहूतिया ‘’’’’’’ कुछ अनजान शक्तियों को !

    झीगुर साधू के दिशानिर्देशानुसा?? ? सामग्री व्यवस्थित करता रहा ! जिसे साधू मंत्रोत्चारण के साथ अलख में अर्पित करते जा रहे थे !


    तभी मेरे मष्तिष्क में कोई फिर बोल उठा ,,, ध्वनि तो उपस्थित थी परन्तु इतनी क्षीण की शब्द वित्याश पूर्णतया अनुपस्थित !
    इस बार संदेह की संभावना नहीं बची थी ! कोई था जो मुझसे टेलीपेथी के द्वारा संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा था !
    लेकिन कौन ? ....
    या शायद में फिर से भ्रमित हो रहा था ?


    उधर साधू का मंत्र पाठ अब तीव्र हो चला था ! प्रबल शक्ति संचरण से सलोनी की कोमल देह बीच बीच में कांप सी उठती थी , परन्तु इस सब से बेपरवाह साधू अपने प्रयोगों में वयस्त थे !


    तभी गर्भ गृह के ताम्बे के भारी द्वार में तीव्र कम्पन हुवा ! तीव्रता इतनी थी की केन्द्रीय गार का सम्पूर्ण फर्श ही मानो कांप उठा !
    ‘’’’’’और अगले ही पल ताम्र द्वार पर स्थापित सर्प आकृतिया मानो सजीव हो उठी ! एक दुसरे से गुथा सर्प शिल्प सजीव हो चलायमान हो चुका था ! द्वार पर उकेरी गयी सर्प आकृतिया गतिमान हो कक्ष की स्वर्ण जडित दीवारों में समाने लगी !

    """"""""शायद काल तिलस्म खुलने लगा था """"""""


    तभी मेरे मस्तिश्क की गहरइयो में फिर से कोई फुसफुसाया ,,,,,,,

    ‘’’’’ मृत्यु आह्वाहन ‘’’’’ मृत्यु आह्वाहन ‘’’’’’
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  6. #706
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    Quote Originally Posted by Loka View Post
    बहुत ही बढ़िया अपडेट, सर्पों की इस तरह विवशता का क्या कारण हो सकता है ये तो आपके आगे के अपडेट में ही पता चलेगा
    सही कहा लोका जी , !
    अभी आगे के चार पाच अपडेट में घटनाओ की गति अत्यंत तीव्र रहने वाली है ! क्योकि वृतांत अब अपने समापन की और अग्रसर हो चुका है !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  7. #707
    वेबमास्टर Loka's Avatar
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    Quote Originally Posted by prem_sagar View Post
    सही कहा लोका जी , !
    अभी आगे के चार पाच अपडेट में घटनाओ की गति अत्यंत तीव्र रहने वाली है ! क्योकि वृतांत अब अपने समापन की और अग्रसर हो चुका है !
    धन्यवाद प्रेम जी, उम्मीद है की अब अपडेट जल्दी-जल्दी आयेंगे, आज का अपडेट
    पढ़कर मज़ा आ गया, आपका तिलस्मी वर्णन बहुत शानदार है, अब अगले अपडेट में देखते है की ताम्र द्वार के भीतर क्या है |
    लोग मुझ पर हँसते है क्यों की मैं सबसे अलग हूँ, मैं उन पर हँसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे है |

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