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Thread: तंत्र की अलौकिक दुनिया , मेरे यात्रा वृतांत

  1. #741
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    Quote Originally Posted by rudraksh View Post
    आप तो छा गए गुरु
    प्रशंशा के लिए धन्यवाद मित्र ! कथा का इसी प्रकार आनंद लेते रहे !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  2. #742
    कर्मठ सदस्य sanjaychatu's Avatar
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    Aug 2015
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    App kaha ho ji ....

  3. #743
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    May 2017
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    Quote Originally Posted by sanjaychatu View Post
    App kaha ho ji ....
    'समन्दर के नगर' में...

    फिलहाल कहते तो यही हैं, मगर कहीं भी प्रकट हो जाते हैं। बहुत बड़े तांत्रिक लगते हैं।

  4. #744
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    Quote Originally Posted by superidiotonline View Post
    'समन्दर के नगर' में...

    फिलहाल कहते तो यही हैं, मगर कहीं भी प्रकट हो जाते हैं। बहुत बड़े तांत्रिक लगते हैं।
    Mitra lagata hai wo mere bare me nahi ..kisee aur ke bare me puch rahe they
    Ab aage ka kissa aap apnee ankh maru vidya se pata lagane ka prayatn kar sakte hai
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  5. #745
    कर्मठ सदस्य superidiotonline's Avatar
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    May 2017
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    Quote Originally Posted by prem_sagar View Post
    Mitra lagata hai wo mere bare me nahi ..kisee aur ke bare me puch rahe they
    Ab aage ka kissa aap apnee ankh maru vidya se pata lagane ka prayatn kar sakte hai
    'ankh maru vidya' बहुत ही प्राचीन तांत्रिक प्रयोग है जिसके जरिए स्त्री प्रतिद्वन्दियों को kill किया जाता है, किन्तु हे तांत्रिकाधिराज, आपसे यह किसने कह दिया कि इस अलौकिक विद्या से भूत, भविष्य, वर्तमान पता चल सकता है?

    इसलिए हमने सही जवाब ही दिया है जी। देखें पोस्टर- கடலோரக் கவிதைகள்-


  6. #746
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    rajputana
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    गुरु जी अपडेट दे दो

  7. #747
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    अत्यंत ही रोमांचक और मनोहारी कथा को पूर्ण करें विप्रवर ।
    कथा का अंत जानने की उत्कंठा तो अब चरम पर है जी ।
    शीघ्र पूर्ण करने की कृपादृष्टि करें जी ।

  8. #748
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    Apr 2016
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    आज के लिए क्षमा करे मित्रो , कल अवश्य ही अपडेट लिखुगा !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

  9. #749
    वेबमास्टर Loka's Avatar
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    जी हम सब आपके अपडेट का इंतजार करेंगे, आपसे गुजारिश है की कल एक से अधिक अपडेट दें
    लोग मुझ पर हँसते है क्यों की मैं सबसे अलग हूँ, मैं उन पर हँसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे है |

  10. #750
    कर्मठ सदस्य prem_sagar's Avatar
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    कुटिल कापालिक का मंत्रोत्चार इंगित कर रहा था की मेरा मंत्र प्रहार असफल सिद्ध हुवा था !

    अब आगे क्या ?? ...
    कोई और युक्ति सोचनी थी ,, वो भी तत्काल ,!

    “हे बाबा विश्वनाथ ,,, रक्षा करे महाकाल ,,, हे गुरु विजयानंद ,,, मदद करे अपने बच्चे की ! कोई तो राह सुझाये “”””””” ,,,, ! असहाय एवं कुछ विचलित सा में अपने आराध्य और अपने गुरु को मदद के लिए याद करने लगा , !

    झीगुर के कथनानुसार केवल कुछ मिनट ही बचे थे ,,, उसके बाद काल तिलस्म पूर्णतया खुल जाना था ,, और उसी के साथ खुलता गर्भ गृह का द्वार !
    पगारु तक के त्रुटिहीन आह्वाहन के अयोग्य वृद्ध कापालिक का यु केवल पाठन के आधार पर परालोकिक शक्तियों से छेड़ छाड़ निसंदेह केवल विध्वंस ही ला सकता था !

    मेरे ह्रदय ने उस गुरु को धिक्कारा जिसने इस छलिये को कामरूप विद्या सिखाई होगी !

    तभी गर्भ गृह के अन्दर से कुछ आवाज़े आने लगी ,,, भयानक गुर्राहट के से शब्द ,, जैसे कोई भयानक जानवर गुरा रहा हो ,,,, फिर कुछ घूर्णन की सी आवाज़ ,,,, और सहसा गर्भ गृह पर लगे ताम्बे के कपाट खडखडा उठे ,,, जैसे की गर्भ गृह में बहुत आधिक दबाव बन गया हो ,,, और अगले ही पल अन्दर से एक धूसर सी प्रकाश किरण ताम्बे के कपाटो को चीर झीरियो से बाहर झाकने लगी !

    उधर निरसा मंत्रोत्चारण रोक विस्मित नेत्रों से ताम्र द्वार को निहारने लगा ! उसे विजयश्री साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी थी ! शायद मृत्यु की आहट उस अनुभवहीन कापालिक को सिधियों का शक्ति श्रोत लग रही थी !

    अब जो करना था ,, तुरंत करना था ,,, मुझे अबतक अपने प्राणों का मोह जाता रहा था ,,,, बस किसी प्रकार ये आह्वाहन रुक जाए ,, अपने को एकाग्र करने के लिए मैंने पल भर के लिए आंखे बंद की ,,अपने प्रभु महाकाल से गिदगिड़ा कर सहायता मांगी ,,, महासिद्ध गुरु विजयानद का सुमिरन किया .. मन को शांति सी मिली ,,,, पल भर में पहुच गया में वाराणसी ,,,, रामनगर घाट,,,, मेरे हाथो में मेरे गुरु के निर्जीव से सूखे पैर ,,, और में दबाने लगा अनके पैर ,,, मेरा डर मस्तिश्क छोड़ कर तत्काल पलायन कर गया , और रह गया एक शिष्य का अपने गुरु पर श्रधा का एक सुखद एहसास ,,,,,,,, !

    सहसा चलने फिरने में लाचार अतिवृध मेरे महासिद्ध गुरु ने अपनी आंखे खोली ,, मुझे देखा और मुस्कुरा उठे !

    तभी घूर्णन की लगातार बढ़ती आवाजो ने मेरा ध्यान तोडा ,,, निरसा अपने आसन पर खड़ा हो चुका था और अपनी पीली मटमैली आँखों से गर्भ गृह के द्वार को घुर रहा था ! ,,,

    और तभी दैव योग से मेरे मस्तिश्क में एक युक्ति आयी ,,, !
    मेने अपनी सारी शारीरिक शक्ति केन्द्रित की .............और सेकंड के सौवे हिस्से में में अपने स्थान पर खड़ा हो कूद पड़ा वहा स्थापित त्रिकोडीय तांत्रिक यन्त्र में !
    ,,,,प्यार बाँटते चलो ,,,,

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