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Thread: छिनाल पर बवाल

  1. #1
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    Cool छिनाल पर बवाल

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    नवम्बर, २०१६ में दो मुद्दे प्रमुखता के साथ गर्माए रहे। पहला मुद्दा था ५०० और १००० के नोटों की 'नोटबन्दी' का और दूसरा मुद्दा था 'सोनम गुप्ता बेवफ़ा है' जिसने सोशल मीडिया में ट्रेंडिंग के मामले में 'नोटबन्दी' को भी पछाड़ दिया था।

    बहुत लोगों को पता नहीं होगा कि आज से छः साल पहले अगस्त, २०१० में 'छिनाल पर बवाल' मचा था। आइए, जानते हैं- छिनाल पर क्यों मचा था भारी बवाल और यह मुद्दा क्या था?

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    टिप्पणी : यह लेख देववाणीमुक्त है, क्योंकि इसमें संस्कृत के गूढ़ और क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया गया है।
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  2. #2
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    आपने अक्सर देखा होगा कि राजनेता विवादास्पद बयान देकर फँस जाते हैं और बाद में सफाई देने लगते हैं। मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे जाने-माने नेता भी विवादास्पद बयान देकर फँसे पाए गए।

    अप्रैल, २०१४ में देश के जाने-माने राजनेता मुलायम सिंह का एक विवादास्पद बयान सामने आया था। इस सन्दर्भ में 'ज़ी न्यूज़' में प्रकाशित समाचार नीचे उद्घृत किया जा रहा है-

    अब मुलायम का विवादित बयान, बोले- "रेप के लिए फांसी देना गलत, लड़कों से हो जाती हैं गलतियां"

    समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव अब विवादित बयान देकर निशाने पर आ गए हैं। मुरादाबाद में आयोजित एक रैली में मुलायम सिंह ने कहा कि बलात्कार (रेप) के मामलों में फांसी की सजा देना गलत है। लड़कों से गलतियां तो हो जाती हैं।

    सपा अध्यक्ष ने कहा कि रेप के मामलों में फांसी नहीं होनी चाहिए। लड़कों से गलती हो जाती है और इसके लिए फांसी नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कभी-कभी फंसाने के लिए भी लड़कों पर आरोप लगा दिया जाता है। अभी मुंबई में तीन लड़कों को फांसी की सजा दे दी गई। लड़कों से गलतियां हो जाती हैं, ऐसे कानूनों को बदलने की जरूरत है।

    उन्होंने कहा कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है। जैसे दहेज उत्पीड़न, दलित एक्ट आदि कानूनों का जो दुरुपयोग करने वाले लोग हैं उनको भी सजा दी जाएगी। हम ऐसा कानून बनाएंगे ताकि दुरुपयोग रूक सके। लड़के लड़कियां पहले दोस्त रहते हैं और जब उनमें मतभेद हो जाता है तो लड़की जाकर बयान दे देती है कि उसका रेप हो गया है। फिर बेचारे लड़कों को फांसी हो जाती है।

    उन्होंने कहा कि ऐसे कानून में बदलाव का प्रयास किया जाएगा ताकि इसका दुरूपयोग करने वालों को सजा मिले। झूठी रिपोर्ट दायर करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। बलात्कार विरोधी कानून में बदलाव की जरूरत पर बल देते हुए यादव ने कहा कि लड़के और लड़कियों में प्रेम हो जाता है लेकिन बाद में मतभेदों के चलते वे अलग हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब उनकी दोस्ती टूटती है, लड़की शिकायत करती है कि उससे बलात्कार हुआ है।

    मुलायम रेप जैसे घिनौने अपराध पर ऐसा विवादास्पद बयान देकर विरोधियों के निशाने पर भी आ गए हैं। बीजेपी, कांग्रेस और अन्य दलों ने मुलायम के इस बयान की तीखी आलोचना की है।
    गौर हो कि समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के विवादित बयान से अभी पीछा भी नहीं छूटा था कि सपा प्रमुख के इस बयान के बाद आलोचनाओं ने जोर पकड़ ली है।

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    साभार : ज़ी न्यूज़
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  3. #3
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    राजनेता ही नहीं, फ़िल्मों में अपने सटीक संवादों द्वारा दर्शकों की तालियों के साथ धुँआधार वाहवाही लूटने वाले अभिनेता भी अक्सर विवादास्पद बयान देकर बाद में पछताते पाए गए हैं। हाल में ही सलमान खान एक विवादास्पद बयान देकर फँस गए थे।

    सलमान खान ने जून, २०१६ में अपनी आगामी फिल्म 'सुल्तान' को लेकर दिए साक्षात्कार में कहा था कि 'शूटिंग के दौरान जब वे रिंग से बाहर निकलते थे तो उन्हें रेप का शिकार हुई महिला की तरह महसूस होता था, क्योंकि वे सीधे नहीं चल पाते थे।'

    आखिर क्यों देते हैं अभिनेता और राजनेता विवादास्पद बयान? ऐसा इसलिए कि अभिनेता हों या राजनेता, ये अच्छे वक्ता या लेखक नहीं होते। सभी जानते हैं कि अभिनेताओं के संवाद कुशल फ़िल्मी लेखकों द्वारा लिखे जाते हैं जिसके कारण ये फ़िल्मों में धुँआधार सटीक संवाद बोलते हैं। यही कारण है कि बॉलीवुड के चर्चित कवि, गीतकार और स्क्रिप्टराइटर जावेद अख़्तर लेखकों का कद अभिनेताओं से बड़ा मानते हैं, किन्तु होता ठीक इसका उल्टा है। अभिनेता का कद लेखक से बड़ा माना जाता है। ठीक इसी प्रकार प्रायः राजनेताओं के लम्बे-चौड़े मनभावन भाषण भी पूर्वलिखित होते हैं, जिसके कारण ये विशाल जनसभाओं को बड़ी आसानी से सम्बोधित करके जनता की तालियों के साथ वाहवाही लूटते हैं। इस सन्दर्भ में 'गजब पोस्ट' में प्रकाशित एक रोचक समाचार का उद्धरण नीचे किया जा रहा है-
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  4. #4
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    क्या आप जानते हैं कि पीएम मोदी के भाषणों में कौन करता है अपने ‘मन की बात’

    'अच्छे दिन आने वाले हैं', इस नारे के साथ लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ जीत हासिल कर प्रधानमंत्री बने नरेंद्र दामोदर दास मोदी अपने भाषणों से सबका दिल जीत लेते हैं. उनके लिए ये कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने अभी तक कभी भी अपनी वाक् पटुता से भारत और भारतीयों को निराश नहीं किया है. जहां एक ओर हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के पास बोलने के लिए शायद शब्द ही नहीं होते थे, वहीं मोदी के अंदर भाषणकला कूट-कूट कर भरी हुई है. अगर कभी रह चुके प्रधान मंत्रियों की बात की जाए तो नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव और वाजपेयी और मोदी कुछ ऐसे प्रधानमंत्रियों की सूची में आते हैं, जिन्हें तीक्ष्णऔर उग्र भाषणों के लिए जाना जाता है. ये लोग अपनी वाक् पटुता से अपने श्रोताओं में देश के लिए कुछ कर गुज़रने की चाह भर देते हैं.

    लेकिन क्या कभी आपने इस बारे में सोचा है कि मोदी की बुलंद आवाज़ के पीछे असलियत में किसकी आवाज़ बोलती है? जी हां, आपने सही समझा, यहां हम बात कर रहे हैं उस व्यक्ति की, जो इनके लिए स्पीच लिखता है. जिसने देश के इन महान और प्रतिष्ठित नेताओं को और प्रभावशाली बनाया.

    एक आम आदमी या औरत के लिए ये सोचना कोई असाधारण बात नहीं है कि देश के बड़े राजनीतिज्ञ अपने भाषण खुद लिखते होंगे. वास्तव में, इनके द्वारा मंच पर दिखाई देने वाले हाव-भाव और बोलने का लहजा उनका खुद का होता है, लेकिन उनके मुंह से निकला हर शब्द किसी और की कलम से निकलता है. आजादी के पहले से हमारे देश में यह परम्परा चली आ रही है, जो समय के साथ धीरे-धीरे काफी बदल चुकी है. और आज के दौर के भाषण उसी बदलाव का नतीजा हैं. तो चलिए एक नज़र डालते हैं कि किस तरह समय के साथ इसमें बदलाव आए.

    आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद जितने भी प्रधानमंत्री हुए, उन सभी को जनता पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए और जनता को संपर्क साधने के लिए एक प्रभावशाली स्पीच की ज़रूरत पड़ने लगी थी. जैसे कि सुभाषित नेहरू ने अपने दम पर किया था. जो लोग ये काम करते हैं, उनको 'Professional Speechwriters' कहा जाता है और ये लोग वास्तव में प्रेस एडवाइज़र या पूर्व पत्रकार होते हैं. ये लोग ही इसके लिए परफेक्ट होते हैं और इसमें सबसे ज्यादा इन्वॉल्व्ड भी होते हैं. कई बार तो ऐसा होता है कि न चाहते हुए भी पीएम या दूसरे नेताओं को इनकी ज़रूरत पड़ ही जाती है, क्योंकि सिर्फ नेताओं को ही नहीं, बल्कि उनके श्रोताओं को भी इन राइटर्स द्वारा लिखी हुई स्पीच की आदत हो जाती है. या यूं कह लीजिए कि इन स्पीकर्स के बिना नेताओं का काम ही नहीं चलता है. Mr. Holenarasipur Yoganarasimham Sharada Prasad एक सरकारी कर्मचारी होने के साथ-साथ एक पत्रकार भी थे. तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के दमदार भाषणों के पीछे इनकी ही कलम बोलती थी. प्रसाद ऐसे भाषण लिखते थे, जो इंदिरा गांधी के मन की बात होती थी, न कि प्रसाद के खुद के मन की बात. यही प्रतिभा भविष्य के पीएम और उनके मीडिया एडवाइज़र में भी दिखाई दी.

    अटल बिहारी वाजपेयी, अपने भाषणों के लिए सुरेंद्र कुलकर्णी से सलाह मशविरा करते थे. या यूं कह लीजिए कि अपनी वाक् पटुता के लिए जाने जाने वाले वाजपेयी कुलकर्णी के लिखे हुए भाषणों को जनता के सामने बोलते थे. हालांकि वो कुलकर्णी द्वारा लिखे भाषणों को ज्यों का त्यों नहीं बोलते थे. बल्कि उसमें कुछ बदलाव कर देते थे. वाजपेयी अपने भाषण को बोलने से पहले सभी फैक्ट्स को क्रॉस चेक ज़रूर करते थे और शब्दों को भी बदल देते थे. ताकि मीडिया उन पर कोई सवाल न उठा पाए. अपने पीएम कार्यकाल के दौरान वाजपेयी के द्वारा कश्मीर में दिया गया उनका भाषण बहुत प्रभावशाली था.
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  5. #5
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    हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों को लिखने के लिए बेस्ट राइटर्स की एक टीम काम करती है. यह टीम मोदी के लिए स्पीचेज़ ही नहीं लिखती, बल्कि उस स्पीच को परफॉर्म भी करके दिखाती है. इसमें किस शब्द को कैसे बोलना है, कब पॉज़ देना है, कहां पर ज़ोर लगाना है और श्रोता आपको किस तरह से सुनेंगे व कैसे रिएक्ट करेंगे आदि शामिल होता है. छोटे-मोटे राइटर्स को पता होता है कि उनको क्या लिखना है, लेकिन बड़े मौकों के लिए पीएम अपने राइटर्स के साथ बैठकर डिस्कस करते हैं कि उनको क्या चाहिए और वो क्या बोलना चाहते हैं. पीएम मोदी की टीम के पास स्पीच लिखने के लिए दो 'मॉडल्स' हैं.

    मोदी की स्पीच की खासियत होती है कि वो दूसरों के द्वारा बोली गई बातों, फैक्ट्स, अलग-अलग सोर्सेज, एक्सपर्ट्स यहां तक कि दूसरी पार्टी की स्पीचेस को ध्यान में रखकर लिखी जाती है.
    मोदी एक ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिनको स्पीच देने का शौक भी है. हालांकि वो जन्म से नेहरू की तरह सुभाषित (silver tongue) नहीं हैं, फिर भी उनके अंदर एक प्रतिभा है, जो भाषण देते वक़्त उनके व्यक्तित्व में साफ झलकती है. नेताओं द्वारा दी गई ये स्पीचेज आगे चल कर एक ऐतिहासिक पल में बदल जाती हैं. इन भाषणों के पीछे होते हैं प्रतिभावान राइटर्स. प्रत्यक्ष रूप से न सही, लेकिन परोक्ष रूप में तो ये राइटर्स इतिहास में अपना नाम दर्ज़ करा ही सकते हैं.

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    साभार : गजब पोस्ट
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  6. #6
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    चलिए, यह बात मान लेते हैं कि राजनेताओं और अभिनेताओं को अल्पज्ञ जानकर इनके दिए विवादास्पद बयानों से इन्हें दोषमुक्त करके इन्हें क्षमा कर देना चाहिए, किन्तु राजनेताओं के लिए भाषण और अभिनेताओं के लिए संवाद लिखने वाला सर्वज्ञ, बुद्धिमान, महाज्ञानी तथा 'अक्ल की खदान, बुद्धि की लदान' और 'समझ की भीमकाय तोप' समझा जाने वाला एक वरिष्ठ लेखक ही यदि विवादास्पद और शर्मनाक बयान दे डाले तो उसे क्या कहेंगे? यही था 'छिनाल' शब्द के प्रयोग पर अगस्त, २०१० में मचा भारी बवाल, क्योंकि एक हिन्दी लेखक ने विवादास्पद होने के साथ-साथ बड़ा ही शर्मनाक समझा जाने वाला बयान देते हुए हिन्दी लेखिकाओं को 'छिनाल' कह दिया। इस सन्दर्भ में बीबीसी हिन्दी में प्रकाशित समाचार नीचे उद्घृत किया जा रहा है-
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  7. #7
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    हिंदी लेखिकाओं को 'छिनाल' कहने पर विवाद

    दिव्या आर्य, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

    विभूति राय ने 'बेवफाई' पर अपने साक्षात्कार में कुछ हिन्दी लेखिकाओं को 'छिनाल' कहा था.

    भारत के दो अखबारों में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति और लेखक विभूति नारायण राय की हिंदी लेखिकाओं पर छपी कुछ टिप्पणियों से विवाद पैदा हो गया.

    अखबारों की रिपोर्ट के मुताबिक विभूति राय ने कहा कि, "हिंदी लेखिकाओं में एक वर्ग ऐसा है जो अपने आप को बड़ा छिनाल साबित करने में लगा हुआ है."

    विभूति राय की टिप्पणियों पर हिंदी लेखिकाओं ने आपत्ति जताई है और उनकी सोच को संकीर्ण बताया है.


    (महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय महाविद्यालय के कुलपति और लेखक और पूर्व पुलिस अधिकारी विभूति नारायण राय)

    बीबीसी ने इस बारे में कई साहित्यिक पुरस्कारों से नवाज़ी और ग्रामीण लोगों से जुड़े और महिलावादी मुद्दों को उभारने वाले लेखन के लिए जानी जाने वाली मैत्रेयी पुष्पा से बातचीत की.

    मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, "हम महिलाओं के सम्मान के लिए बड़ी लंबी लड़ाई लड़कर यहां पहुंचे हैं, लेकिन इस तरह के पुरुष हमें गालियां देते हैं, एक पत्थर मारते हैं और सब पर कीचड़ फैला देते हैं."

    वहीं अपनी सफाई में विभूति राय का कहना है कि उनकी बात को संदर्भ बताए बगैर पेश किया गया है.
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    भारतीय ज्ञानपीठ की साहित्यिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' ने 'बेवफाई' विषय के शीर्षक के साथ अपने ख़ास अंक में विभूति राय का साक्षात्कार किया था. इसी के कुछ अंश अखबारों ने छापे.

    बीबीसी से बातचीत में विभूति राय ने इस तरफ ध्यान आकर्षित किया और अपने विचार स्पष्ट किए.

    विभूति राय ने कहा, "पिछले कुछ वर्षों में कुछ महिला लेखिकाएं ये मान के चल रही हैं कि स्त्री मुक्ति का मतलब स्त्री के देह की मुक्ति है. हाल में कुछ आत्मकथाएं भी आई हैं जिनमें होड़ लगी है कि कौन सबसे बड़ा इन्फेडेल है. मैं अपने साक्षात्कार में इसे गलत बताना चाहता था."

    लेकिन विभूति राय के इस तर्क को मैत्रेयी पुष्पा सही नहीं मानती हैं और महिला लेखन में देह के विमर्श के खुलकर सामने आने को स्त्री मुक्ति की संकीर्ण परिभाषा नहीं मानती हैं.

    वो कहती हैं, "इसमें क्या संकीर्ण है कि अगर वो अपनी ज़िंदगी अपने मुताबिक़ जीना चाहती हैं, घर से बाहर निकलना चाहती हैं. आपसे बर्दाश्त नहीं होता तो हम क्या करें, पर आप क्या गाली देंगे?"

    "पिछले कुछ वर्षों में कुछ महिला लेखिकाएं ये मान के चल रही हैं कि स्त्री मुक्ति का मतलब स्त्री के देह की मुक्ति है. हाल में कुछ आत्म कथाएं भी आई हैं जिनमें होड़ लगी है कि कौन सबसे बड़ा इन्फेडेल है. मैं अपने साक्षात्कार में इसे गलत बताना चाहता था."

    विभूति राय को भी अपने शब्दों का चयन गलत नहीं लगता बल्कि उनका मानना है कि महिला विमर्श में बृहत्तर संदर्भ जुड़े हुए हैं तो सिर्फ शरीर की बात करना उन्हें सही नहीं लगता.

    वो बताते हैं कि उनकी भाषा, भोजपुरी में, 'छिनाल' का मतलब ऐसी महिला से होता है जिसका विश्वास ना किया जा सके, ना कि वो जो वेश्यावृति करती हो.
    उनके मुताबिक ये अर्थ निकालना गलत होगा.

    वो हाल में छपी कुछ हिंदी लेखिकाओं की आत्मकथाओं के बारे में कहते हैं कि, "उनका शीर्षक ये भी हो सकता है कि कितने बिस्तरों पर कितनी बार, क्योंकि उनमें इन बातों की चर्चा के अलावा कुछ नहीं है."

    शहर में कर्फ्यू नाम की पुस्तक के लिए विख्यात विभूति नारायण राय भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और सांप्रदायिकता पर अक्सर लिखते हैं.

    हिंदी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के अलावा भी कई हिंदी लेखिकाओं ने विभूति राय की टिप्पणियों पर आपत्ति जताई है.

    हालांकि महिला आंदोलन से जुड़ी कुछ महिलाएं विभूति राय की सोच कि, महिला विमर्श में देह विमर्श को ज़्यादा तरजीह दी जा रही है, से भी इत्तेफ़ाक रखती है.

    -----------------
    साभार : बीबीसी हिन्दी
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  9. #9
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    विभूति नारायण राय की विवादास्पद शर्मनाक टिप्पणी के बाद बुद्धिजीवी वर्ग ही नहीं, सामान्य जन भी स्तम्भित रह गया, किन्तु इस प्रकरण का खुलकर विरोध नहीं किया गया था। अचानक भारत गणराज्य के एक प्रमुख अँग्रेज़ी दैनिक समाचार-पत्र इंडियन एक्सप्रेस ने इस प्रकरण को संज्ञान में लेकर प्रमुखता के साथ प्रकाशित कर दिया और 'छिनाल' शब्द का गलत अँग्रेज़ी अनुवाद 'प्रॉस्टीट्यूट' (Prostitute) कर दिया जिसने आग़ में घी का काम किया और विभूति नारायण राय की शर्मनाक टिप्पणी का जबरदस्त विरोध सर्वत्र होने लगा।

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  10. #10
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    आइए, देखते हैं क्या लिखा था इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादकीय में-

    Textual violence

    The Indian Express : Mon Aug 02 2010, 03:53 hrs

    Girls gone wild" is the Mahatma Gan dhi International Hindi University Vice Chancellor's idea of conversation about the state of contemporary letters. "There is a race among women writers to prove that they are the greatest prostitute... The title of a recently published autobiography of a highly promoted and overrated writer could be 'How Many Times in How Many Beds'."

    Vibhuti Narain Rai, a 1975-batch IPS officer, had been appointed vice chancellor of MGIHU in 2008. The university was specially set up to nurture and promote excellence in Hindi literature. Rai, in an interview with the Bharatiya Jnanpith's Naya Gyanodaya journal, decried the shamelessness of women who wrote about "infidelity" in the name of feminism. This is, of course, textbook misogyny, one that can only understand women in idealised angel/whore terms — it is deeply threatened by any evidence of a woman's humanity.

    But Rai's revulsion, expressed in clear and considered terms, is exactly what generations of women have to contend with. English professor Elaine Showalter signposts the story of women writers into four stages — "feminine," "feminist," "female," and finally, "free", where first they imitate the dominant tradition, protest it, discard it to search themselves, and finally write with real autonomy and abandon, and gender ceases to matter. The anxieties and hostility they evoke from men — what Nathaniel Hawthorne called the "damned mob of scribbling women" — forge them into a constituency, no matter how wide and various their concerns. While his attitudes only reveal that rampant sexualised insecurity, Vibhuti Narain Rai heads an institution dedicated to literature; it is indeed incredible that he thought he could get away with his casual verbal violence. (Lawrence Summers lost his job as Harvard president for a much smaller sin, all things considered: for merely floating the thought-bubble about women's under-representation in the sciences, and the reasons underlying them.) Bigotry and coarseness of this kind must be followed with serious consequences.
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