तब वृषभ सोमवाही भीअपनी घंटा-ध्वनि करता,बढ चला इडा के पीछेमानव भी था डग भरता।
हाँ इडा आज भूली थी
पर क्षमा न चाह रही थी,वह दृश्य देखने को निजदृग-युगल सराह रही थी

चिर-मिलित प्रकृति से पुलकित
वह चेतन-पुरूष-पुरातन,निज-शक्ति-तरंगायित थाआनंद-अंबु-निधि शोभन।
भर रहा अंक श्रद्धा का
मानव उसको अपना कर,था इडा-शीश चरणों परवह पुलक भरी गदगद स्वर

बोली-"मैं धन्य हुई जो
यहाँ भूलकर आयी,हे देवी तुम्हारी ममताबस मुझे खींचती लायी।
भगवति, समझी मैं सचमुच
कुछ भी न समझ थी मुझको।सब को ही भुला रही थीअभ्यास यही था मुझको।

हम एक कुटुम्ब बनाकर
यात्रा करने हैं आये,सुन कर यह दिव्य-तपोवनजिसमें सब अघ छुट जाये।"
मनु ने कुछ-कुछ मुस्करा कर
कैलास ओर दिखालाया,बोले- "देखो कि यहाँकोई भी नहीं पराया।

हम अन्य न और कुटुंबी
हम केवल एक हमीं हैं,तुम सब मेरे अवयव होजिसमें कुछ नहीं कमीं है।
शापित न यहाँ है कोई
तापित पापी न यहाँ है,जीवन-वसुधा समतल हैसमरस है जो कि जहाँ है।

चेतन समुद्र में जीवन
लहरों सा बिखर पडा है,कुछ छाप व्यक्तिगत,अपना निर्मित आकार खडा है।
इस ज्योत्स्ना के जलनिधि में
बुदबुद सा रूप बनाये,नक्षत्र दिखाई देतेअपनी आभा चमकाये।

वैसे अभेद-सागर में
प्राणों का सृष्टि क्रम है,सब में घुल मिल कर रसमयरहता यह भाव चरम है।
अपने दुख सुख से पुलकित
यह मूर्त-विश्व सचराचरचिति का विराट-वपु मंगलयह सत्य सतत चित सुंदर।

सबकी सेवा न परायी
वह अपनी सुख-संसृति है,अपना ही अणु अणु कण-कणद्वयता ही तो विस्मृति है।
मैं की मेरी चेतनता
सबको ही स्पर्श किये सी,सब भिन्न परिस्थितियों की हैमादक घूँट पिये सी।

जग ले ऊषा के दृग में
सो ले निशी की पलकों में,हाँ स्वप्न देख ले सुदंरउलझन वाली अलकों में
चेतन का साक्षी मानव
हो निर्विकार हंसता सा,मानस के मधुर मिलन मेंगहरे गहरे धँसता सा।

सब भेदभाव भुलवा कर
दुख-सुख को दृश्य बनाता,मानव कह रे यह मैं हूँ,यह विश्व नीड बन जाता"
श्रद्धा के मधु-अधरों की
छोटी-छोटी रेखायें,रागारूण किरण कला सीविकसीं बन स्मिति लेखायें।

वह कामायनी जगत की
मंगल-कामना-अकेली,थी-ज्योतिष्मती प्रफुल्लितमानस तट की वन बेली।
वह विश्व-चेतना पुलकित थी
पूर्ण-काम की प्रतिमा,जैसे गंभीर महाह्नद होभरा विमल जल महिमा।

जिस मुरली के निस्वन से
यह शून्य रागमय होता,वह कामायनी विहँसती अगजग था मुखरित होता।
क्षण-भर में सब परिवर्तित
अणु-अणु थे विश्व-कमल के,पिगल-पराग से मचलेआनंद-सुधा रस छलके।

अति मधुर गंधवह बहता
परिमल बूँदों से सिंचित,सुख-स्पर्श कमल-केसर काकर आया रज से रंजित।
जैसे असंख्य मुकुलों का
मादन-विकास कर आया,उनके अछूत अधरों काकितना चुंबन भर लाया।

रूक-रूक कर कुछ इठलाता
जैसे कुछ हो वह भूला,नव कनक-कुसुम-रज धूसरमकरंद-जलद-सा फूला।
जैसे वनलक्ष्मी ने ही
बिखराया हो केसर-रज,या हेमकूट हिम जल मेंझलकाता परछाई निज।

संसृति के मधुर मिलन के
उच्छवास बना कर निज दल,चल पडे गगन-आँगन मेंकुछ गाते अभिनव मंगल।
वल्लरियाँ नृत्य निरत थीं,
बिखरी सुगंध की लहरें,फिर वेणु रंध्र से उठ करमूर्च्छना कहाँ अब ठहरे।

गूँजते मधुर नूपुर से
मदमाते होकर मधुकर,वाणी की वीणा-धवनि-सीभर उठी शून्य में झिल कर।
उन्मद माधव मलयानिल
दौडे सब गिरते-पडते,परिमल से चली नहा करकाकली, सुमन थे झडते।

सिकुडन कौशेय वसन की थी
विश्व-सुन्दरी तन पर,या मादन मृदुतम कंपनछायी संपूर्ण सृजन पर।
सुख-सहचर दुख-विदुषक
परिहास पूर्ण कर अभिनय,सब की विस्मृति के पट मेंछिप बैठा था अब निर्भय।

थे डाल डाल में मधुमय
मृदु मुकुल बने झालर से,रस भार प्रफुल्ल सुमनसब धीरे-धीरे से बरसे।
हिम खंड रश्मि मंडित हो
मणि-दीप प्रकाश दिखता,जिनसे समीर टकरा करअति मधुर मृदंग बजाता।

संगीत मनोहर उठता
मुरली बजती जीवन की,सकेंत कामना बन करबतलाती दिशा मिलन की।
रस्मियाँ बनीं अप्सरियाँ
अतंरिक्ष में नचती थीं,परिमल का कन-कन लेकरनिज रंगमंच रचती थी।

मांसल-सी आज हुई थी
हिमवती प्रकृति पाषाणी,उस लास-रास में विह्वलथी हँसती सी कल्याणी।
वह चंद्र किरीट रजत-नग
स्पंदित-सा पुरष पुरातन,देखता मानसि गौरीलहरों का कोमल नत्तर्न

प्रतिफलित हुई सब आँखें
उस प्रेम-ज्योति-विमला से,सब पहचाने से लगतेअपनी ही एक कला से।
समरस थे जड*़ या चेतन
सुन्दर साकार बना था,चेतनता एक विलसतीआनंद अखंड घना था।