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Thread: लक्ष्मण रेखा

  1. #61
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    और फ़िर रात के ग्यारह बजे । जब मंजरी और लिली सो रही थी । तब वह कुछ निश्चिंत हुआ । कम से कम आज की रात उसके लिये चैन से सोने की रात थी ।

    वह मोटे तकिये से टेक लगाये सिगरेट पी रहा था । और तारा की इन खास दिनों की जिन्दगी के ताने बाने को बुनने की कोशिश कर रहा था ।

    तभी अचानक रहस्यमय अन्दाज में तारा उसके पास आकर खङी हो गयी । उसने संकेत से उसे पीछे आने का इशारा किया । वे दोनों घर से बाहर गली में आ गये ।
    - मेरे बेटे का नाम केशव गोस्वामी है । वह गम्भीरता से बोली - वह इस समय यहाँ से दूर एक अस्पताल में कोमा जैसी हालत में जिन्दगी मौत के बीच झूल रहा है ।

    तुम भी मेरे लिये बेटे जैसे ही हो । पर मैंने यह सब कहने के लिये तुम्हें यहाँ नहीं बुलाया । मेरी बहू और तुम्हारी पत्नी सो रही हैं । लेकिन फ़िर भी अक्समात भी उन्हें हमारी बात पता न लगे । इसलिये मैंने आपको यहाँ बुलाया ।

    मेरे मन में बङी बैचेनी सी हो रही है । मैं कुछ जानना चाहती हूँ । लेकिन पहले मेरी कसम खाओ । आप सच बताओगे ।

  2. #62
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    उसने एक गहरी सांस ली । ज्ञान का पँथ कृपाण की धारा ।
    - कसम तो । वह भावहीन स्वर में बोला - खाई ही झूठ बोलने के लिये जाती है । कसम उठाने का साफ़ अर्थ है । धोखा देना । ऐसा ही मेरा अनुभव है । इसलिये आप बेफ़िक्र होकर पूछिये । मैं सच ही बताऊँगा । बिना किसी गाड प्रामिस के ।

    वह थोङा सा कसमसाई । उसने अँधेरे में भी उसकी तरफ़ देखा । और अजीब से ठण्डे स्वर में बोली - मृत्यु दीप बुझ गया ।..और जानते हो । इसका क्या मतलब है । अगले 24 घण्टे में दिनकर जोगी की मृत्यु ।

    मैं पगली इस बात को झूठ मानती थी । मगर मेरे प्रतिशोध को इसके अलावा और कोई उम्मीद भी न थी । कोई सहारा न था । इसलिये मैं बङे भाव से उसकी मौत की कामना करती हुयी दीपक जलाती थी । और रोज ही निराश होती थी ।

    कभी कभी झूठ भी मालूम होता था । पर इस झूठ का ही सहारा सा था । इसलिये नियम से जलाती थी । पर आज तक न बुझा था ।

    कहते कहते वह रुकी । उसने गहरी सांस ली । और फ़िर से बोली - लेकिन..लेकिन..आज दीपक ने ठीक से लौ भी न पकङ पायी थी । अभी ठीक से प्रज्वलित भी न हो सका था कि फ़कफ़काता हुआ बुझ गया ।

    मेरा यकीन करो बेटे । उस फ़कफ़काती हुयी लौ में मैंने स्पष्ट दिनकर जोगी को देखा । मरते हुये । एक बार को मुझे लगा । मेरी आँखों को धोखा हो रहा है ।

    शायद..शायद पुराने दिनों का लौटना मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ । और मैं बाबली हो गयी हूँ । इसलिये मैंने दीपक दुबारा जलाया । बारबार जलाया । पर दीपक न जला । जबकि जबकि उसमें तेल बाती एकदम दुरुस्त थे ।

  3. #63
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    - कमाल है । वह हैरत से आश्चर्य में डूबा हुआ सा बोला - ये तो कमाल ही हो गया । माँ जी ये उपाय आपको जिन महात्मा ने बताया होगा । वह निश्चय ही बङी पहुँच वाले होंगे । मुझे भी उनके दर्शन कराना ।

    हे प्रभु ! फ़िर वह आसमान की ओर हाथ उठाकर बोला - आपने इन दुखी माताजी पर कृपा दृष्टि की । आपको बारबार प्रणाम है ।

    तारा गहरी उलझन में पङ गयी । उसने बेबसी से उसकी ओर देखा । और बोली - बेटा ! अभी अभी तुमने सच बोलने का वादा किया है । तुम्हे अपने उसी वचन का वास्ता । मुझे सच सच बताओ । असल में आप कौन हो ?

    अचानक..अचानक सब कुछ ठीक सा कैसे हो गया । घर से मरघट बना । ये घर । किस चमत्कार से फ़िर से घर बन गया ।

  4. #64
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    - माँ जी । वह गम्भीरता से बोला - सच तो यही है कि मैं एक इंसान हूँ । सिर्फ़ एक इंसान । एक सीधा सच्चा । भगवान को मानने वाला इंसान । न मैं हिन्दू । न मैं मुस्लिम । न सिख । न ईसाई । न यहूदी । न पारसी । बस इंसान । हाङ माँस का बना इस ।

    उसने धरती से मिट्टी उठाई - इस माटी से बना पुतला । अन्त पन्त जिसको इसी माटी में मिल जाना है । बस इसके सिवा और कुछ नहीं । और आप..मेरा यकीन करो । ये मैं सच कह रहा हूँ । दिल से कह रहा हूँ । आत्मा से कह रहा हूँ ।

    तारा ने एक सूनी सी उदास दृष्टि से उसे देखा । और बिना कहे घर की ओर चली गयी । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और हौले हौले सीटी बजाने लगा ।

    मृत्यु दीप । महान तांत्रिक दिनकर जोगी । भला किसी का कर न सको । तो बुरा किसी का मत करना । बुरे काम का बुरा फ़ल । आज नहीं तो निश्चय कल । अन्त बुरे का बुरा । दाता ! तेरा अन्त न जाणया कोय ।

  5. #65
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    - मालिक । पिशाच गिङगिङाता हुआ सा बोला - मुझ पर दया करो । इस योग किरण से मुझे बचाओ । ये मुझे जला देगी ।

    जोगी के चौङे माथे पर चिंता की गहरी लकीरें उभर रहीं थी । अपने अब तक के जीवन में उसे ऐसी शिकस्त कभी न मिली थी । वह रह रहकर उस बाल को देख रहा था । और मानों अपने बाल नोच रहा था । एक साधारण सा स्त्री बाल । उसके मारण तंत्र को काट सकता है । और बाल जैसे बारबार उसका उपहास कर रहा हो ।

    आज की रात मानों अमरकंटक के उस जंगल में कहर की रात बनकर आयी थी । उसे कदम दर कदम अपशकुन हो रहे थे । भूत चुङैल प्रेत पिशाच जिन्न वेताल डायन कपाली आदि मुर्दाखोरों का राजा आज गहरी सोच में डूबा हुआ था ।

    आज उसे बारबार वह औरत याद आ रही थी । पगली औरत । उसकी दीन पुकार उसके कानों में गूँज रही थी ।
    - याद रख जोगी ।... भगवान भी कुछ है । वह दूर आसमान पर बैठा हुआ भी । चींटी तक की फ़रियाद सुनता है । उसके न्याय में देर है । पर अंधेर नहीं । तूने साधुता का अपमान किया है । इसलिये अब भी संभल जा । अरे.. फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत ।

    - हे ऊपर वाले । हे सच्चे शहंशाह । मेरी फ़रियाद कबूल कर । इस बाबा की वजह से मेरा घर उजङ गया । तू इसको जिन्दगी से उजाङ दे । अगर तू सच्चा है । निर्बलों का बल है । तो फ़िर आसमान पर मत बैठा रह । मुझ दुखियारी के लिये नीचे आ । तुझे आना ही होगा ।

    फ़िर पछताये होत का । जब चिङिया चुग गयी खेत ।

  6. #66
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    उसने गहरी सांस ली । शायद वाकई चिङिया खेत चुग गयी थी ।

    वह हवाओं का राजा था । किस्म किस्म की प्रेत वायु उसकी चाकरी में रहती थी ।
    पर आज जिन अशरीरी रूह बयारों को वह देख रहा था । उसने जीवन में न देखी थी । दाँत किटकिटाती । भालू जैसे बालों से भरी । काली नग्न डायनें । मृत्युकन्या की भयंकर गण । हाथ में हड्डी का मुगदर थामे । अट्टहास करती नग्न कालिकायें । उस पर झपटने को आतुर । बस मानों किसी आदेश की प्रतीक्षा में थी ।

    वह अन्दर तक कांप गया । उसकी मृत्यु ऐसे होगी । यह तो उसने ख्वाव में भी न सोचा था । उसकी भी मृत्यु होगी । यह तो कभी उसे विचार ही न आता था । डर जैसा भी कुछ होता है । ये उसे आज ही अनुभव हो रहा था । उसका आत्मविश्वास खोता जा रहा था । और किसी जुनून की भांति भय हावी होता जा रहा था ।

    अपने डगमगाते अस्तित्व को भावनात्मक सहारा देने हेतु उसे मदिरा की सख्त जरूरत थी । उसने कलश में से लोटा भरा । और गटागट मदिरा पीने लगा । भयंकर नशे से उसकी आँखे अंगारा होकर जलने लगी ।

  7. #67
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    - मालिक । उसे पिशाच की दयनीय आवाज सुनाई दी - मुझ पर दया करो । इस योग किरण से मुझे बचाओ । ये मुझे जला रही है ।

    - सब खत्म हो गया । वह नशे में लङखङाती हुयी आवाज में बोला - मेरी सोने की लंका जल गयी । अब .तुम लोग जाओ । कोई ओर आसरा खोजो । ये गाँव उजङने वाला है ।

    कमाल का खेल था । हर बात उल्टी हो रही थी । शक्ति के मद से मदमदाता जोगी दीन हीन हो रहा था । पाशविक अट्टाहास गुंजाने वाली प्रेतक वृतियाँ भयभीत थी । सुरक्षा की तलाश में थी ।

    अमरकंटक का वह शान्त वन रात की निस्तब्धता में आश्चर्य से यह तमाशा देख रहा था । झुण्ड के झुण्ड प्रेत इस मृत्युदूत को खुद मृत्यु की खन्दक में गिरता देख रहे थे ।

    - भाग जाओ । वह अजीब सी नफ़रत से विकृत स्वर में बोला - अब यहाँ मौत की देवी नृत्य करेगी । अगला दिन मेरी मृत्यु का सन्देश लेकर ही आयेगा ।

  8. #68
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    अगला दिन ।

    शायद इसी को कहते हैं - मालिक से सब होत हैं । बन्दे से कुछ नाहिं । राई को पर्वत करे । पर्वत राई माँहि । अगला दिन । जहाँ जोगी के लिये मृत्यु सन्देश ला रहा था । तारा के घर में नवजीवन की सुनहली किरणें फ़ैलने वाली थी ।

    दूर क्षितिज में सूरज का उजाला फ़ैलने लगा था । मंजरी चाय बना लायी थी । वे गर्म चाय की चुस्कियाँ भर रहे थे ।

    तभी पङोस की लङकी हाथ में मोबायल थामें तेज तेज सांसे लेती हुयी आयी । और बोली - आण्टी ! अस्पताल से

    आपका फ़ोन । रात को भी आया था ।
    तारा ने एकदम चौंककर देखा । मंजरी हङबङा गयी । अशुभ की आशंका उनके चेहरों पर लहराने लगी ।

  9. #69
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    एकाएक उन्हें कुछ न सूझा । तब उसी ने फ़ोन लिया । और बोला - हल्लो !

    - देखिये । उस तरफ़ से आवाज आयी । तो उसने लाउड मोड सैट किया - खुशखबरी है । आपके पेशेंट को कल रात होश आ गया है । एक चमत्कार सा हुआ है । वह अपनी माँ पत्नी को बहुत याद कर रहा है । आप शीघ्र आने की कोशिश करें ।

    तारा अपने आपको रोक न सकी । उसकी जबरदस्त रुलाई फ़ूट पङी । वह दौङकर रोती हुयी प्रसून के पैरों से लिपट गयी । और बिलखते स्वर में बोली - हे देवता ! मुझे माफ़ कर देना । मैं आपको पहचान न सकी । आप मेरे लिये भगवान हो ।

    वह एकदम सिटपिटा कर रह गया । और मुश्किल से उसने तारा को अलग किया । दोनों सास बहू आपस में लिपट कर रोने लगी । भौंचक्क सी लिली की आँखें भी भीगने लगी ।

    आँसू । खुशी के आँसू । गम के आँसू । दिल का बोझ हल्का कर देने वाले आँसू ।

  10. #70
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    आँसू आज दिनकर जोगी की आँखों से भी बह रहे थे । पश्चाताप के आँसू ।
    जीवन की सभी अच्छी बुरी घटनायें उसे रह रहकर याद आ रही थीं । अपने अखण्ड साम्राज्य के बीच वह खुद को नितांत अकेला महसूस कर रहा था ।

    जिस विशाल प्रेत समुदाय पर कभी उसे गर्व था । वही आज उसे भयंकर यमदूत नजर आ रहे थे । वह रात भर तङपता रहा था । और पीता रहा था । ये कौन सा तूफ़ान आया था । जो उसका समस्त आशियाना ही उजाङ गया था ।

    प्रसून की गाङी तूफ़ानी रफ़्तार से उङ रही थी । यकायक अस्पताल से आये फ़ोन ने पूरा खेल उलट पलट कर दिया था । उसकी समस्त योजना ही बदल गयी थी ।

    वह आज तारा और मंजरी को अमरकंटक लाने वाला था । पर केशव की खबर आने के बाद ये असंभव ही था । और स्थिति दोनों तरफ़ से बेहद विकट हो चुकी थी । एक ही समय निर्धारित था । जब उस परिवार का कोमा से उबरे केशव से मिलन होना था । और जब दिनकर जोगी का इस संसार से वियोग हो जाना था ।

    सबसे बङी मुश्किल थी । वह लिली को भी उनके साथ नहीं भेज सकता था । खुद भी नहीं जा सकता था । तब उसने तारा के परिचितों के साथ उन दोनों को रवाना कर दिया । और स्वयं अमरकंटक के लिये गाङी दौङा दी ।

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