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Thread: लक्ष्मण रेखा

  1. #71
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    वह बङी दक्षता से कार चला रहा था । स्टेयरिंग पर उसके हाथ मजबूती से जमे हुये थे ।

    - प्रसून जी । सङक पर देखती हुयी लिली अचानक उससे चिपक कर बोली - तुम आदमी हो कि पूरे खचेङूमल । मैं यहाँ प्रेत रिसर्च के सिलसिले में प्रेत दर्शन हेतु आयी हूँ । और तुम मुझे भारत दर्शन करवा रहे हो । मुझे पागल समझा है क्या ?

    - लिली ! वह कुछ सोचता हुआ सा बोला - याद है । तुमने जंगल में उस साधु से कहा था । पहचाना मुझे । तुम उसे कैसे जानती हो ?

    बात घुमाना तो कोई तुझसे सीखे ।..ठीक है । मैं एक बार इण्डिया आयी थी । तब उससे नर्मदा माता के मन्दिर में मुलाकात हुयी है । बङा खास बना है ये मन्दिर ।

    मन्दिर के तीन तरफ़ पानी ही पानी है । आने जाने का सिर्फ़ एक ही रास्ता है । तब मैंने उससे प्रेतों के बारे में पूछा था । तब पता नहीं मुझे बैठाकर वह क्या जन्तर मन्तर सा करता रहा ।
    प्रसून के दिमाग में एक विस्फ़ोट सा हुआ । वह अन्दर तक हिल गया ।

  2. #72
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    फ़िर उसने खुद को संभाला । और आगे देखते हुये ड्राइव करने लगा । गाङी जंगल की सीमा में प्रवेश कर गयी । और बमुश्किल ही जोगी के सिद्ध मठ तक पहुँची ।

    दिनकर जोगी अर्द्ध बेहोशी की सी स्थिति में था । उसने घबराकर उन्हें देखा । जैसे मौत आयी हो । फ़िर वह लिली को देखकर चौंका ।

    - याद आया । वह रुँधे कण्ठ से कठिन स्वर में बोला - अब सब याद आया । शायद यही कील अटकी हुयी थी । जो मेरे प्राण न निकल रहे थे ।..तो तू है । वो मौत की देवी ।..मैं व्यर्थ ही उस पगली को सोचे जा रहा था ।

    ..नर्मदा माता के मन्दिर से तू मिली थी । और बङी खास पात्र थी तू । खास । तेरा कौमार्य अक्षुण्ण था । कामवासना का कोई अंश तक न था तेरे अन्दर । ये विलक्षण बात थी ।..और तुझे सिद्धों के ज्ञान में गहरी दिलचस्पी थी । अदृश्य रूहों के प्रति अदभुत लगाव ।

    मेरे अन्दर लोभ जागा । तुझे शिष्या बनाने का लोभ । लेकिन निष्काम भाव से नहीं । कामभाव से । तेरे मनमोहक सौन्दर्य और अछूते यौवन को भोगने का लोभ । मैंने तुझे आँख बन्द कर बैठाया । चुपचाप तेरे कुछ केश लिये । और वशीकरण किया कि एक दिन तू खुद ही खिंची चली आयेगी ।

    यही बात थी । देख मेरा वशीकरण सफ़ल हुआ । देख तू आयी । मगर मृत्यु का उपहार लेकर । देख..उसने बमुश्किल उँगली उठाकर उसमें लिपटा हुआ बाल दिखाया - वही बाल । ये एक बाल । जो मेरी मौत का फ़रमान बना ।

  3. #73
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    लिली भौंचक्का रह गयी । प्रसून ने एक गहरी सांस ली । और ढेर सारा पानी जोगी के सर पर उङेल दिया ।

    - आप । फ़िर वह दुखी स्वर में बोला - बच जाओगे महाराज । आप महान साधु हो । तंत्र के महान ज्ञाता हो ।

    वह मुश्किल से लङखङाता हुआ उठा - नहीं । अन्त बुरे का बुरा । अब मेरा वक्त आ गया । हे पवित्र आत्मा । तुम मेरे साक्षी बनो । मैं प्रायश्चित बोध से इस देवी से क्षमा माँगता हूँ ।

    वह लिली की तरफ़ बढा । हाथी जैसा उसका विशालकाय शरीर डांवाडोल हो रहा था । वह हवन कुण्ड के पास आ गया । अचानक वह ठोकर लगने के समान गिरा । कुण्ड के पास गङा तीखा त्रिशूल सीधा उसकी गर्दन में समा गया ।

    लिली की चीख निकल गयी । घने बालों से आच्छादित उस स्थूल शरीर की काली भयानक देह हारिणी अंतागदा गण ने क्रूर हँसी हँसते हुये हाथ में थमे मुगदर को देखा । उस मुगदर को । जिसका वज्र प्रहार अभी अभी उसने जोगी के सिर में किया था ।

  4. #74
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    - दिव्य । फ़िर वह बोली - आप थोङा अलग हो जायें । ये कठिनता से शरीर त्यागेगा ।

    प्रसून लिली का हाथ थामे परे हो गया । मृत्युकन्या की भयानक गण सेना जोगी पर बेतहाशा टूट पङी । वे अपने घातक हथियारों का ताबङतोङ प्रहार उस पर करने लगे ।

    उसने लिली की तरफ़ देखा । वह बुरी तरह घबरायी हुयी थी । अपावन रूहों का सैलाब सा उमङ रहा था वहाँ । उसने लिली का हाथ थामा । और वापिस कार में आ गया ।

    गाङी फ़िर से उल्टी जाने लगी । वे वहीं आ पहुँचे । जहाँ रात को ठहरे थे । लिली का जी सा मिचला रहा था । वह बाहर निकल कर टहलने लगी ।

    उसकी निगाह बचाकर उसने बैग से वह गुङिया निकाली । और टहलता हुआ सा नदी के किनारे आ गया ।
    उसने गुङिया को अलग किया । और नदी में उछाल दिया । फ़िर उसने खाली बोतल को देखा ।

  5. #75
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    - मुझे माफ़ कर दो । बोतल से बँधा पिशाच गिङगिङाया - जोगी की शक्ति पाकर मैं मतवाला हो गया था । प्रेतत्व की मर्यादा भूल गया था । मैंने एक पतिवृता स्त्री की लक्ष्मण रेखा में घुसने का भयंकर अपराध किया । पर अब क्षमा ही माँग सकता हूँ ।

    - दस महीने । वह भावहीन स्वर में बोला - और अब दस साल । किसी की हँसती खेलती जिन्दगी को उजाङ देना । यहाँ तक कि उन्हें मौत के मुँह में पहुँचा देना । मैं सोचता हूँ । यह सजा कुछ अधिक नहीं । तुम भाग्यशाली हो पिशाच । जो तुमने उन्हें जल्द छोङ दिया । सोचो । वरना ये सजा कितनी लम्बी हो सकती थी ।

    - पर । वह बिलखता हुआ बोला - सजा कैसी होगी ? क्या होगी ?

    - अपनी सजा के तौर पर । वह रूखे स्वर में बोला - तुम इस बोतल से बँधे रहोगे । ये तंत्र की आन है । तुम इस पवित्र नदी के जल में दस साल तक तैरते हुये बहते रहोगे । तुम इस बोतल के आसपास कुछ ही दूर तक विचरण कर पाओगे । फ़िर दस साल पूरे होने पर तुम स्वयं ही इससे मुक्त हो जाओगे ।

    - कोई रियायत नहीं हो सकती ।

    - ये रियायत ही है । वह गहरी सांस लेकर बोला - प्रभु बहुत दयालु हैं । वह सब पर दया ही करते हैं ।

    फ़िर उसने हाथ को घुमाया । और बोतल को नदी में उछाल दिया । बोतल नदी की तेज धारा में डूबती उतराती सी बहने लगी ।

    ************समाप्त**********

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