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Thread: हज़ार करोड़ की बॉयोपिक

  1. #21
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    और तो और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चन्दन तस्कर वीरप्पन के भाई की जीवनी पर भी आधारित एक तमिल फ़ीचर फ़िल्म 'एदिरुम पुदिरुम (எதிரும் புதிரும்)' वर्ष 1999 में लोकार्पित हो चुकी है। यद्धपि फ़िल्म निर्माता द्वारा इस फ़िल्म के बॉयोपिक होने की अधिकृत घोषणा नहीं की गई थी, किन्तु दक्षिण के सभी दर्शक इस तथ्य से भली-भाँति अवगत थे कि यह एक बॉयोपिक है जो दक्षिण भारतीय चन्दन तस्कर वीरप्पन और उसके भाई की जीवनी से प्रेरित है-



    वर्ष 2013 में लोकार्पित तमिल फ़िल्म 'वन युद्धम्' (வன யுத்தம்) एक बॉयोपिक है जो दक्षिण भारतीय चन्दन तस्कर वीरप्पन की जीवनी पर ही आधारित है-



    वर्ष 2016 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'अलीगढ़' एक बॉयोपिक है जो श्रीनिवास रामचन्द्र सिरस की जीवनी पर आधारित है-



    इस बॉयोपिक की कहानी का मुख्य बिन्दु यह है कि श्रीनिवास रामचन्द्र सिरस के समलैंगिक होने के कारण उन्हें नौकरी से हटा दिया गया था।

  2. #22
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    वर्ष 2008 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'जोधा अकबर' एक ऐतिहासिक बॉयोपिक है जो मुगल सम्राट अकबर और राजपूत राजकुमारी जोधा बाई की प्रेमकथा पर आधारित है-



    वर्ष 2017 में लोकार्पित होने से पूर्व ही तमाम विवादों को जन्म देकर हलचल मचाने वाली हिन्दी फ़िल्म 'पद्मावती' एक ऐतिहासिक बॉयोपिक है जो रानी पद्मावती की जीवनी पर आधारित है-



    मज़ेदार बात यह है कि ज्यादातर इतिहासकार पद्मावती को सिर्फ़ एक काल्पनिक पात्र मानते हैं और पद्मावती नाम की रानी का इतिहास में साक्ष्य होने से इन्कार करते हैं।

    वर्ष 2007 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'गुरू' एक बॉयोपिक है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह रिलायंस संस्थापक प्रसिद्ध भारतीय उद्योगपति धीरूभाई अम्बानी की जीवनी पर अल्प रूप से आधारित है-


  3. #23
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    Aug 2016
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    अच्छा सुत्र बनाया है सुपरईडियट जी।
    महाठग आप ठगाईए, ओर न ठगिए कोय । आप ठगें सुख ऊपजे, ओर ठगें दुःख होय ॥

  4. #24
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    May 2017
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    वर्ष 2007 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'वून्डिड: द बैंडिट क्वीन' एक बॉयोपिक है जो चम्बल की चर्चित दस्यु सीमा परिहार की जीवनी पर आधारित है-



    वर्ष 1982 में लोकार्पित अँग्रेजी फ़िल्म 'गाँधी' एक बॉयोपिक है जो महात्मा गाँधी (मोहनदास कर्मचन्द गाँधी) की जीवनी पर आधारित है-



    वर्ष 2007 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'गाँधी: माइ फ़ादर' एक बॉयोपिक है जो महात्मा गाँधी (मोहनदास कर्मचन्द गाँधी) के पुत्र हरिलाल गाँधी की जीवनी पर आधारित है-



    इस बॉयोपिक की कहानी का मुख्य बिन्दु यह है कि इसमें हरिलाल गाँधी और महात्मा गाँधी के मध्य उपस्थित कटु सम्बन्धों को चित्रित किया गया है।

  5. #25
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    May 2017
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    वर्ष 2010 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'अन्तर्द्वन्द्व' एक बॉयोपिक तो नहीं है, किन्तु इसकी कहानी बिहार में प्रचलित 'वधू पक्ष द्वारा जबरदस्ती वर-अपहरण करने' जैसे असंवैधानिक मुद्दे पर आधारित है-


  6. #26
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    जनवरी 2015 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'रहस्य' एक बॉयोपिक सदृश ही है, क्योंकि इसकी कहानी वर्ष 2008 में नोएडा में घटित आरुषि-हेमराज जैसे चर्चित दोहरे हत्याकांड पर आधारित है-



    आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर आधारित यह पहली फ़िल्म है।

    अक्तूबर 2015 में लोकार्पित हिन्दी फ़िल्म 'तलवार' एक बॉयोपिक सदृश ही है, क्योंकि इसकी कहानी भी वर्ष 2008 में नोएडा में घटित आरुषि-हेमराज जैसे चर्चित दोहरे हत्याकांड पर आधारित है-



    आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर आधारित यह दूसरी फ़िल्म है। सन्दर्भवश यहाँ पर यह बता दें कि इस हत्याकांड पर तीसरी फ़िल्म बनने की घोषणा भी हुई थी, किन्तु वह बनी नहीं।

  7. #27
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    अब हम आपको बताने जा रहे हैं- उस चर्चित ऐतिहासिक घटना के बारे में जिस पर एक बार नहीं, बार-बार फ़िल्म बनी और लगातार फ़िल्म बनाने की घोषणाएँ विभिन्न फ़िल्म-निर्माताओं द्वारा की गईं।

    जी हाँ, हम बात कर रहे हैं वर्ष 1959 में घटित 'कमाण्डर के० एम० नानावटी बनाम महाराष्ट्र सरकार' के मुकदमे की कहानी की।



    उस दौर में 'कमाण्डर के० एम० नानावटी बनाम महाराष्ट्र सरकार' के मुकदमे की कहानी इतनी चर्चित हुई कि एक आँग्ल-भारतीय उपन्यासकार इंदिरा सिन्हा ने नानावती के मुकदमे को आधार बनाकर 'दि डेथ ऑफ मिस्टर लव' नामक एक अँग्रेज़ी उपन्यास लिखा।



    कहा जाता है कि चर्चित लेखक सलमान रुश्दी का अँग्रेज़ी उपन्यास 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' का एक अध्याय 'कमांडर साबरमती बैटन' नानावती के मुकदमे से ही प्रेरित है।



    नाटककार मधुसूदन कालेलकर द्वारा लिखित एक चर्चित मराठी नाटक 'अपराध मीच केळा' नानावटी के मुकदमे की कहानी पर ही आधारित है।


  8. #28
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    'कमाण्डर के० एम० नानावटी बनाम महाराष्ट्र सरकार' के मुकदमे की कहानी के अनुसार के० एम० नानावटी ने अपनी पत्नी के प्रेमी की हत्या कर दी थी। अति साधारण दिखने वाली इस कहानी में हत्या के पीछे छिपा उद्देश्य इतना भावनात्मक (Emotional) है कि यह कहानी आज भी सभी प्रेम कहानियों के शीर्ष पर विराजमान है। नानावटी के मुकदमे की कहानी की विशिष्टता इसी बात से समझी जा सकती है कि इस कहानी पर आधारित एक-दो नहीं, कुल तीन हिन्दी फ़िल्में बनीं।

    पहली हिन्दी फ़ीचर फिल्म 'ये रास्ते हैं प्यार के' वर्ष 1963 में लोकार्पित हुई। यह फिल्म सस्पेंस थ्रिलर थी और इस फ़िल्म को आर० के० नय्यर ने सुनील दत्त और लीला नायडू को लेकर बनाया था।



    यह फिल्म बॉक्स ऑफ़िस पर औंधे मुँह गिरी। कहा गया कि फिल्म में अस्वीकरण (Disclaimer) दिया गया था कि इसकी कहानी और सभी पात्र काल्पनिक हैं, जिसके कारण इस फ़िल्म को एक बॉयोपिक होने का लाभ नहीं मिला। इस फ़िल्म के फ़्लॉप होने के पीछे यह भी तर्क दिया गया कि फ़िल्म में नानावटी के मुकदमे के वास्तविक निर्वहण को बदल दिया गया था।

    नानावटी के मुकदमे पर आधारित दूसरी हिन्दी फ़ीचर फिल्म 'अचानक' वर्ष 1973 में लोकार्पित हुई।



    इस फ़िल्म को गुलजार ने विनोद खन्ना, लिली चक्रवर्ती और असरानी को लेकर बनाई थी और यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही।

    नानावटी के मुकदमे पर आधारित तीसरी हिन्दी फ़ीचर फिल्म 'रुस्तम' वर्ष 2016 में लोकार्पित हुई।



    इस फ़िल्म में काम किया था अक्षय कुमार ने। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बेहद सफल रही और इसे एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म माना गया।

    वर्ष 1963 से नानावटी के मुकदमे की कहानी पर आधारित फ़िल्म बनने का सिलसिला अभी रुका नहीं है। सूत्रों के अनुसार पूजा भट्ट की आने वाली फ़िल्म 'लव अफ़ेयर' नानावटी के मुकदमे पर ही आधारित है। यह फ़िल्म वर्ष 2017 में लोकार्पित होने वाली थी, किन्तु अभी तक नहीं हुई। इस फ़िल्म के लोकार्पित होने के बारे में विस्तृत सूचना हमारे पाठकगण मंच के ठगाधिराज से सम्पर्क करके जान सकते हैं। ठगाधिराज के पास फ़िल्म-जगत की सारी सूचना २४×७×३६५ उपलब्ध रहती है।

    वैसे तो हम अपने एक वृहत्त लेख 'कहानी का रूपान्तरण' में निर्विवाद रूप से यह सिद्ध कर चुके हैं कि कहानी में काफी फेरबदल किए जाने के बावजूद भी सिर्फ़ 'रुस्तम' ही एक ऐसी फ़िल्म है जो नानावटी के मुकदमे की मूल कहानी के काफी निकट है, क्योंकि नानावटी के मुकदमे की कहानी में निहित तमाम विषयों को बड़ी ही खूबसूरती के साथ इस फ़िल्म में समायोजित (Adjustment) कर दिया गया है, किन्तु नानावटी के मुकदमे की कहानी से एकदम भिन्न होने के बावजूद भी हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'अचानक' की सफलता इस बात की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करती है कि कहानी और पटकथा में दम होने की दशा में बॉयोपिक के ठप्पे के साथ लोकार्पित हुई फ़िल्में भी सफल हो सकती हैं।

  9. #29
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    कहानी और पटकथा में दम होने की बात यहाँ पर इसलिए की गई है, क्योंकि बॉयोपिक या बॉयोपिक का ठप्पा होने के बावजूद भी कई फ़िल्मों के असफल होने का लम्बा-चौड़ा इतिहास रहा है। इस बॉयोपिक के ठप्पे में वे फ़िल्में भी आती हैं जिनके बारे में अँग्रेज़ी में 'Inspired by' (से प्रेरित) या 'Loosely based on' (अल्प रूप से आधारित) जैसे शब्दों का प्रयोग होता है।

    'से प्रेरित' (Inspired by) फ़िल्मों से तात्पर्य यह है कि इन फ़िल्मों में किसी स्रोत से प्रेरणा लेकर एक नई कहानी लिख ली जाती है, जैसे वर्ष 2006 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई' महात्मा गाँधी के अहिंसा के सिद्धान्त से प्रेरित है। अहिंसा के सिद्धान्त को 'गाँधीगीरी' का नया नाम देकर एक नई कहानी/पटकथा लिख ली गई।



    अपनी दमदार पटकथा की वजह से 'लगे रहो मुन्ना भाई' ब्लॉकबस्टर रही।

    'अल्प रूप से आधारित' फ़िल्मों से तात्पर्य यह है कि इन फ़िल्मों में किसी विख्यात या कुख्यात व्यक्ति का उल्लेख मात्र होता है और पूरी कहानी लगभग काल्पनिक ही होती है। दमदार कहानी/पटकथा के अभाव में अल्प रूप से आधारित (Loosely based on) फ़िल्मों का भी बॉक्स ऑफ़िस पर बुरा हाल हो सकता है। उदाहरण के लिए अल्प रूप से आधारित (Loosely based on) फ़िल्मों की श्रंखला में बनी दो फ़िल्मों में से एक सफल रही और दूसरी असफल, जबकि दोनों फ़िल्मों के बारे में यह प्रचार किया गया था कि वे कुख्यात दाउद इब्राहिम पर अल्प रूप से आधारित हैं।

    पहली फ़िल्म वर्ष 2010 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई' है जिसके बारे में कहा गया कि यह दाउद इब्राहिम और हाजी मस्तान के जीवन पर अल्प रूप से आधारित है।



    'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई' बॉक्स ऑफ़िस पर सफल रही।

    दूसरी फ़िल्म वर्ष 2013 में लोकार्पित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म 'डी-डे' है जो दाउद इब्राहिम पर अल्प रूप से आधारित है।



    'डी-डे' बॉक्स ऑफ़िस पर न ही सफल रही और न ही औंधे मुँह गिरी। बॉक्स ऑफ़िस पर इस फ़िल्म का प्रदर्शन औसत दर्जे का रहा। इस फ़िल्म को देखतेे वक्त फ़िल्म सदृश एक वृत्तचित्र (Documentary) देखने का भ्रम होता है। शायद यही कारण है जो दर्शकों को यह फ़िल्म रास नहीं आई।

    मज़ेदार बात यह है कि 'डी-डे' के लोकार्पित होने के बाद अगले ही महीने में दाउद इब्राहिम पर अल्प रूप से आधारित एक और फ़िल्म लोकार्पित हुई थी जो बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप रही थी। अगस्त, 2015 में लोकार्पित इस फ़िल्म का नाम था- 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई दोबारा!' यह फ़िल्म वर्ष 2010 में लोकार्पित फ़िल्म 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई' की उत्तरकथा (Sequel) थी।



    यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि 'बालाजी' जैसे बड़े बैनर से सम्बद्धता होने और 'अक्षय कुमार' जैसे बड़े कलाकार के होने के बावजूद भी 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई दोबारा!' बॉक्स ऑफ़िस पर कोई चमत्कार न दिखा सकी। यही नहीं, इस फ़िल्म को 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई' का सीक्वेल होने का लाभ भी नहीं मिला, जबकि यह फ़िल्म सही मायने में एक सीक्वेल थी, क्योंकि सीक्वेल का वास्तविक अर्थ 'आगे की कहानी' होता है जिसे संक्षेप में 'उत्तर कथा' कहते हैं। सन्दर्भवश यहाँ पर यह बताते चलें कि 'बाहुबली 2: द कन्क्लूज़न' और 'रागिनी एम०एम०एस 2' जैसी फ़िल्में वास्तविक सीक्वेल की श्रेणी में आती हैं, क्योंकि इन फ़िल्मों में 'आगे की कहानी' का वर्णन किया गया है। 'जिस्म 2' और 'आशिक़ी 2' जैसी तमाम फ़िल्मों को कहा तो सीक्वेल जाता है, किन्तु ये होती नहीं हैं, क्योंकि ये फ़िल्में अपनी पूर्व फ़िल्मों के नाम की सीक्वेल होती हैं, न कि कहानी की। संक्षेप में सफल फ़िल्मों के नाम को सीक्वेल का दर्ज़ा देकर भुनाने की कोशिश की जाती है। वस्तुतः ऐसी फ़िल्मों को सीक्वेल न कहकर श्रंखला (Series) कहना चाहिए।

    एक दमदार कहानी/पटकथा होने के बावजूद भी 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई दोबारा!' दाउद इब्राहिम का बड़ा नाम भुनाने में असफल रही। इसका कारण यह है कि यदि अक्षय कुमार स्क्रिप्ट पढ़ते ही कहानी के हीरो शोएब की तर्ज़ पर यह कह देते कि 'अगर मेरी गर्लफ्रेंड मुझसे नहीं पटी तो बॉक्स ऑफ़िस बुरा मान जाएगी!' तो निर्माता-निर्देशक के कान खड़े हो जाते, क्योंकि काश्मीर से कन्याकुमारी तक भारतीय फ़िल्म जगत का यह शाश्वत सत्य है कि 'एक बहुत बड़े कद वाले अभिनेता (Hero) को जिसके पास प्रशंसकों (Fans) की लम्बी-चौड़ी फौज़ हो, फ़िल्म में नकारात्मक भूमिका (Negative Roll) देना बहुत बड़ा जोखिम भरा काम होता है जिसके कारण फ़िल्म के असफल होने की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं।' इसके पीछे छिपा गूढ़ राज़ यह है कि सामान्यतः दर्शकों की सहानुभूति कहानी के नायक की ओर होती है और दर्शक यदि प्रशंसक भी हों तो यह सहानुभूति अंधभक्ति में बदल जाती है। अंधभक्त प्रशंसक-दर्शक अपने प्रिय अभिनेता के खिलाफ़ कुछ भी देखना-सुनना पसन्द नहीं करते और न ही उन्हें अपने चहेते अभिनेता को पर्दे पर नकारात्मक भूमिका में देखना रास आता है। यही कारण है- कहानी में नायक की नकारात्मक भूमिका होने पर फ़िल्म निर्माण से पहले निर्माता-निर्देशक कई बार चिन्तन करते हैं तथा फ़िल्म में नकारात्मक भूमिका अदा करने से कई बड़े अभिनेता भी बचते हैं जिससे प्रशंसकों के मध्य उनकी छवि खराब न हो।

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