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Thread: योग तंत्र की सत्य घटनाएं

  1. #1
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    योग तंत्र की सत्य घटनाएं

    अविकसित मानसिक स्तर की जनता में चमत्कारों के प्रति बड़ा आकर्षण होता है। जो बात साधारणतया नित्य देखने में नहीं आती-उस अनोखी बात या वस्तु को देखकर लोग आश्चर्य करते हैं और उसे देखने दौड़ते हैं। पहाड़ी तराइयों में हाथियों के झुँड वैसे ही घूमते फिरते हैं जैसे यहाँ खेतों और मैदान में हिरन घूमते हैं। इसलिये उन वन्य प्रदेशों के निवासी हाथियों के देखने में कुछ आश्चर्य वहीं मानते। पर जिन स्थानों में हाथी नहीं पहुँचते वहाँ कभी एकाध हाथी का आ जाना तमाशे से कम नहीं समझा जाता। बाजीगर, नटविद्या, अजायबघर, चिड़ियाघर आदि अनेकों आविष्कार मनुष्य की इस कौतुक, कौतुहल अथवा चमत्कार की आकाँक्षा रखने वाली बुद्धि को तृप्त करने के लिए ही हुए हैं।

  2. #2
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    में यहा पर कहे बिना नही रह सकता की मेरे एक सहकर्मचारी हो जो हिन्दीभाषी है, मेरा यह प्रयास देखकर वह मेरे लिखे हुए हिन्दी अनुवाद को सुधारने का कार्य कर रहे है ताकी यहा पर कुच अच्छी हिन्दी लिख सकु। तो जब उन्होने हिन्दी का प्रुफ चेक किया होगा तो हिन्दी अच्छी होगी पर जब मेने खुद ऐसे ही यहा पर रखी होगी तो हिन्दी अच्छी नही होगी और पढने में आप सब के कुच तकलीफ होगी।

  3. #3
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    कोई बात हमको तभी तक चमत्कार लगती है, जब तक वह आमतौर पर प्रचलित नहीं होती। पर जब उसका रहस्य प्रकट हो जाता है या वह बात प्रायः देखने में आने लगती है, तो फिर वह चाहे कितना भी महान चमत्कार ही क्यों न हो, उसका आकर्षण जाता रहता है। वैज्ञानिकों आविष्कारों के आरम्भिक दिनों में, जब रेल, तार, टेलीफोन, हवाई, जहाज, मोटर, आदि का क्या-क्या प्रचलन हुआ था तब लोग इन्हें देखने के लिए सौ-दो सौ मील पैदल चल कर आते थे और इन वस्तुओं को देखकर आश्चर्य के समुद्र में डूब जाते थे। पर धीरे-धीरे जब ये वस्तुएं नित्य के व्यवहार में आने लगीं तो कुछ दिनों में उनका आकर्षण जाता रहा- चमत्कार समाप्त हो गया।

  4. #4
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    यहा पर इस thread मे में एक ही पुस्कतक की कहानियाँ नही रखुगाँ मुजे जो जो अच्छी लगेगी और जीस पर मुजे विश्वास है ऐसी ही कहानियाँ यहा पर रखी जायेगी।

  5. #5
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    असामान्य वस्तुओं और घटनाओं को देख कर मनुष्य उनके पीछे किसी असामान्य अथवा गुप्त शक्ति होने की कल्पना करता है। अनगिनत, देवी, देवताओं का आविर्भाव आदिम युग में इसी मनोवृत्ति से हुआ था। बिजली चमकने जैसी प्राकृतिक बात का ठीक कारण मालूम न होने से उसका कोई ‘तुक’ बिठाने के लिये इन्द्र के हाथ में वज्र चमकने की बात सोच ली गई। बीमारियों अथवा महामारियों के पीछे किसी देवी, देवता का प्रकोप होने की बात, शरीर-शास्त्री और आरोग्य-विज्ञान से अनभिज्ञ लोगों में अभी तक प्रचलित है। तरह-तरह के रोगों का दूर करने के लिए भूतों और जिन्नों को भगाने वाले ओझा लोगों की मान्यता अभी पिछड़े हुए लोगों में मौजूद है। पर ये बातें विचारशील लोगों में मूर्खतापूर्ण समझी जाती हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि बीमारी स्वास्थ्य-संबंधी नियमों के उल्लंघन का परिणाम है किसी देवी-देवता की नाराजी या प्रसन्नता का इससे सम्बन्ध नहीं।

  6. #6
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    जब मनुष्य जाति की सभ्यता का विकास होने ही लगा था तब किसी वस्तु, व्यक्ति , शक्ति या घटना की महानता नापने की कोई बुद्धिसंगत कसौटी उसके पास न थी। उस समय चमत्कार ही बड़प्पन का एकमात्र लक्षण मान लिया गया। इसलिये बिजली चमकना, वर्षा होना, भूकम्प, तूफान, अकालमृत्यु, बीमारी, संतान होना या न होना, संपत्ति-विपत्ति आदि सभी घटनाओं से किसी न किसी देवी-देवता का संबंध जोड़ा गया। नवग्रहों की पूजा इसी आधार पर चल पड़ी। किसी व्यक्ति को यदि ऋषि, महर्षि, देवदूत या अवतार सिद्ध करना होता तो उसके द्वारा कुछ चमत्कार होने की बात अवश्य बतानी पड़ती। जो चमत्कार न दिखा सके वह भी महापुरुष हो सकता है, इस बात को मानने के लिए कोई तैयार न होता था। इसलिये जिन स्वर्गीय सत्पुरुषों को उनके अनुयायी ‘महान’ सिद्ध करना चाहते थे उनके साथ कुछ न कुछ चमत्कारी घटनाओं की किंवदंतियां अवश्य जोड़ते। भले ही उन्हें यह कार्य अनिच्छापूर्वक ही करना पड़ता हो।हम देखते हैं कि पौराणिक काल के सभी देवी, देवता ही नहीं, महापुरुष भी ऐसी सिद्धियों या जादूगरी जैसी अलौकि से पूरी तरह सुसज्जित हैं। हर देवता या महापुरुष के अनुयाइयों ने अपने उपास्य की महिमा बढ़ाने और उसे अन्यों से बढ़कर अलौकिक शक्ति सम्पन्न सिद्ध करने के लिये प्रयत्न किया है। इस प्रकार की प्रशंसा के गीत गाने की घुड़दौड़ में पौराणिक काल में एक अत्यन्त विशालकाय साहित्य तैयार हो गया है। यद्यपि उनमें शिक्षा और विचारोत्तेजक सामग्री भी पर्याप्त है, पर मुख्य उद्देश्य अमुख देवता या महापुरुषों को बढ़ा-चढ़ाकर सबसे अधिक चमत्कारी सिद्ध करना ही है। योगेश्वर कृष्ण और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के द्वारा मानव-जाति के लिये किये गये महान कार्यों को पर्याप्त न समझा गया, वरन् अनेक साधारण घटनाओं को अलौकिकताओं के पुट देकर तिल का ताड़ बना दिया गया। उस काल की स्थिति के अनुसार यह सब सिद्ध करना अनिवार्य ही हो गया था।पिछले समय में साधु महात्माओं के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार की मान्यता जन साधारण में रही है कि जो जितना पहुँचा हुआ फकीर-सिद्ध, महात्मा होगा, वह उतना ही चमत्कार दिखला सकेगा। इस गलत कसौटी के कारण अनेक सत्पुरुष, जो अपनी सत्य निष्ठा पर कायम रहे, जनता में सम्मान प्राप्त न कर सके और न किसी पर अपना प्रभाव जमा सके। इस असफलता से खिन्न होकर कई सत्पुरुषों ने मौन स्वीकृति से अपने चमत्कार होने की बात स्वीकार कर ली, और अनेक अपने भक्तों द्वारा गुण गाथा गाये जाने से सिद्ध बन गये, कुछ ने तो जान बूझकर इस प्रकार का आडम्बर स्वयं बना लिया। धूर्तों की इस अज्ञानान्धकार में खूब बन आई। आज भी अनेक साधु और महात्मा नामधारी ऐसे ही अड्डे जगह-जगह लगाये बैठे हैं।सौभाग्यवश यह अज्ञानान्धकार का युग अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है और महापुरुषों की महानता का मूल्याँकन दूसरी कसौटी पर किया जाने लगा है। अब यह बात रही कि सूर्य को गाल में बन्द किये बिना हनुमान जी की महत्ता को स्वीकार न किया जाय। उनका अखंड ब्रह्मचर्य, न्याय पक्ष का समर्थन और अन्याय पक्ष से लड़ने में निःस्वार्थ भाव से अपनी जान की बाजी तक लगा देना आदि ऐसी महान बातें हैं कि अगर हम हनुमानजी के सूरज को मुँह में रख लेने वाली कथाओं को छोड़ भी दें तो उनके व्यक्तित्व में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। अमुक टीले पर गाय के थन में से अपने आप दूध की धार निकलती थी, वहाँ खोदने पर अमुक देवता की मूर्ति निकली और उसका यह मन्दिर बना है। अनेकों मन्दिरों के विषय में फैली हुई यह किंवदंती अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती, जितनी कि यह बात कि अमुक देवस्थान द्वारा जन हित के क्या-क्या कार्य सम्पादन होते हैं? यह रुचि परिमार्जन सत्य की प्रतिष्ठ के लिए एक शुभ लक्षण है। चमत्कारों की पुरानी, खोटी कसौटी पर तो केवल अज्ञान और धूर्तता की वृद्धि होना ही संभव है।चमत्कारों की इस युग की कसौटी यह है कि कौन व्यक्ति , वस्तु या घटना किस हद तक सदुद्देश्यपूर्ण, मानवता की सेवा करने वाली एवं धर्म मर्यादा के अनुकूल है। अब किसी को सच्ची सती सिद्ध करने के लिये छः महीने तक सूरज को रोके रखने और ब्रह्मा, विष्णु, महेश को बालक बना देने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। चित्तौड़ की रानियों का आत्मत्याग अब किसी अनुसुइया से कम नहीं समझा जाता। अब अवतार माने जाने के लिये विराह भगवान की तरह दाँत पर या कच्छप भगवान की पीठ पर पृथ्वी उठाने का प्रकरण ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है, वरन् अब कुछ भी चमत्कार न करने वाले परमत्यागी और सच्चे संत बुद्ध भगवान को केवल उनके ज्ञान, सेवा, तपस्या, त्याग के आधार अवतार मान लिया गया। महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द, शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द आदि अनेकों युग-निर्माता महापुरुषों के जीवन-चरित्र में कोई चमत्कार या जादूगरी की बात नहीं है। ये सभी सीधे सादे सत्पुरुष और समाज सेवी थे, फिर भी जनता ने उनको महान और दैवी शक्ति सम्पन्न मान लिया।

  7. #7
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    त्रिकोण के तीन कोण
    सत्र न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठकर अगर कभी हत्या के अपराधी को प्राणदण्ड की सजा सुनाई तो मन में यह विचार उठता था कि शायद मेरे ही हाथों इसे प्राणदअण्ड की सजा मिलनी थी इसीलिए मेरी नियुक्ति इस जनपद में हुई। किसी भी सेशन के मामले में निर्णय की परिणति तक पहुँचने के लिए तीन अनिवार्य कोण होते है – न्यायाधीश, अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष। इनमें से कोई भी कोण अगर बिखर जाये तो निर्णय की यह परिणति नहीं होगी जो त्रिकोण के तीन कोणों के चलते होनी थी। मेरा ही नहीं, अनेक सत्र न्यायाधीशों से बातचीत के सन्दर्भ में मुझे उनका भी यही मत सुनने को मिला कि शायद हम लोग किसी सत्र विचारण के लिए पहले से ही चयनित है।
    वर्ष 1973 में मैं सीतापुर में सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत था। जून के महीने में नीमकरौली बाब के पास उनके कैंची आश्रम गया था। अपराह लगभग चार बजे बाबा के श्री चरणों में नमन करने मैं आश्रम में बाबा के कक्ष पहुँचा। वहाँ एक बलिष्ठ युवक बैठा था। उम्र से वह 27-28 वर्ष का युवक प्रतीत होता था। आश्रम में पूरी शांति थी। कोई और नहीं था। थोडी देर बाद बाबा ने मेरी ओर देखते हुए, उस युवक से पूछा
    “मैने तुमसे क्या कहा था?”
    युवक कुछ सकपकाया और कुछ संकोच-भरी आँखों से मुझे देखते हुए बात टालने की कोशिश की।
    “आपने तो मेरे बारे में कई बातें बतलाई हैं। मुझे सब याद है”
    बाबने फिर प्रश्न दुहराया।
    “नहीं। वह जो खास बात बललाई है उसे कहो”
    युवक ने तब सर झुकाये हुए दबी जबान से कहा।
    “मुझे मृत्युदण्ड की सजा मिलेगी”।
    तब बाबाने स्पष्य किया। “वह मृत्युदण्ड की सजा इन्हीं जज साहब के हाथों तुम्हें मिलेगी”।
    बाबा के श्रीमुख से यह बात सुनकर उस युवक पर क्या गुजरी होगी इसका तो केवल मैं अंदाजा ही लगा सकता था। किन्तु मैं एक बारगी सन्नाटे में आ गया। जिसे मेरी कलम से मृत्युदण्ड मिलने वाला है वही युवक मेरी बगल में बैठा है और उसे मालूम है कि मृत्युझण्ड की सजा मेरे ही हाथों उसे मिलनी है।
    इसके पहले कि मैं या वह युवक सामान्य हो पाते, बाब ने युवक को आदेश दिया – जज साहब को अपनी मोटर पर पहाडी की सैर करा लाओ।
    युवक तत्काल उठा। आश्रम से बाहर की सडक पर खडी अपनी नई फिण्ट मोटर कार की तरफ बढा। उठा तो मैं भी कुछ असमंजस की स्थिति में था। तभी बाबाने मुझसे कहा – जाओ, पहाड घूम आओ।
    बाब के आदेश का अनुपालन न करने का सवाल ही नहीं उठता था। अतः मैं भी उस युवक के पीछे-पीछे उसकी गाडी तक गया। ढलते सूरज की सुनहरी रोशनी में नई गाडी चमचमा रही थी।
    युवक ने आगे का दरवाजा खोला और मैं बैठ गया। युवक ने गाडी में बैठकर गाडी को एकबारगी तेज स्पीड में चला दिया। गाडी रानीखेत जानेवाली सडक पर भागने लगी। युवक के इरादे के प्रति मेरा थोडा शंकित होना स्वाभाविक ही था, किन्तु बाबा ने आज्ञा दी थी इसलिए मैं निस्चिंत था। फिर भी मन में तरह-तरह की काली सायाएँ घुमड रही थी। बातचीत में पता चला कि वह युवक विज्ञान में स्नातक है और तराई क्षेत्र में अपने फार्म की देखभाल करता है।
    मौन तोडते हुए मैने उससे पुछा – क्या आ बाब की बात पर विश्वास करते है? पुरा विश्वास करता हूँ युवकने कहाँ।
    मैं भी बाब की बात में पूरा विश्वास करता हूँ और मैं मानता हूँ कि जब बाबा ने बतला दिया है तो उसी प्रकार घटना का क्रम होगा। किसी क्रोध के क्षण में आप किसी की जान ले लेंगे। मुकदमा मेरे इजलास में चलेगा और मेरी ही कलम से आपको प्राणदण्ड मिलेगा। यह तो होना ही है – मैने कहा।
    मैं भी ऐसा ही विश्वास करता हूँ – युवक ने कहाँ।
    गाडी कुछ और आगे बढी और एकबारगी उस युवक ने दाहिनी ओर चढाई पर जाने वाली एक पतली सडक पर गाडी मोड दी। गाडी फिर आगे बढने लगी। बिल्कुल सन्नाटा था और दूर-दराज तक कोई आहट नहीं थी।
    कुच संयत होकप मैने कहा- आप तो पढे-लिखे है। आपने जाप्ता फौजदारी (कोड आँफ क्रिमिनल प्रोसीजर) का नाम सुना होगा सत्र विचारण की प्रक्रिया निर्धारित करती है? मैने पुछा – युवकने हामी भरी।
    मैने कहा – न्यायसेवा का कोई भी अधिकारी जानबूकर किसी अधिनियम के किसी प्राविधान का उल्लंघन नहीं करेगा। न्याय सेवा में विधि की सीमा में कार्य करने का प्रतिबन्ध प्रत्येक न्याय सेवा के अधिकारी पर लागू है और वह इस प्रतिबन्ध की अवहेलना किसी भी स्थिति में नही कर सकता।
    युवक चुपचाप मेरी बात सुन रहा था। मैने फिर अपनी बात को आगे बढाते हुए कहा – यही जाप्ता फौजदारी धारा 479 में यह स्पष्ट कहती है कि किसी भी ऐसे मामले का विचारण कोई सत्र न्यायाधीश नहीं करेगा जिसकी उसे व्यक्तिगत जानकारी है या जिसमे उसकी व्यक्तिगत रुचि है। आपके मामले में गवाही कुछ भी आए, मुझे पहले से ही जानकारी है कि मेरी कलम से आपको प्राणदण्ड मिलना ही मिलना है। ऐसी सुरत में आपके मुकदमे पर विचारण विधिक निर्देश का स्पष्ट उल्लंघन होगा। गवाही कुच भी आये-यह बात मैं कैसे भूल सकूँगा कि मेरी कलम से आपको केवल मृत्युदणअड मिलना है। उससे कुछ भी नही। अतः मै आपके मुकदमे का विचारण नहीं कर पाऊँगा इससे बढकर व्यक्तिगत रुचि की और क्या बात होगी कि विचारण के पूर्व ही न्यायाधीश को अभियुक्त के प्राणदण्ड की सजा का पूर्व ज्ञान है। वह युवक ध्यान से मेरी बात सुन रहा था और मैने उसके चेहरे के तनाव को कम होते देखा।
    मैने बात आगे बढाई और उससे कहा, अभी मेरी सेवा के अनेक वर्ष शेष हैं। पता नहीं कितने वर्षो बाद आपके मामले का विचारण मेरे सामने आयेगा। मैं तब तक आपकी शक्त-सूरत भूल सकता हुँ पर आप मेरी सूरत नही भूल सकते। मृत्युदण्ड जिसके हाथों मिलना है उसकी सूरत अभियुक्त नहीं भूलेगा। इसलिए आपका मुकदमा जब भी मेरे सामने आये, आप भरी अदालत में मुझसे कहें – आप कानूनन यह मुकदमा नहीं कर सकते। मैं आप पर अवमाननना की कार्यवाही नहीं करुँगा और मुकदमे को किसी अन्य न्यायालय में स्थानान्तरित कर दूँगा। उस पढे लिखे युवक पर मेरी बात का पूरा असर हुआ और उने कहा – चलिए कुछ ही दूरी पर सरकार का एग्रो उद्योग है, वहाँ सेब का ताजा-ताजा रस मिलेगा।
    कुछ दूरी की ड्राईव के बाद एग्रो उद्योग का वह काउणअटर भी आया जहाँ ताजा सेब का रस मिलता था। सेब के रस का पान कर हमलोग फिर कैंची वाप आ गये। रात में मैं निस्चिंत होकर सोया।
    इस घटना के लगभग 10-12 वर्षो बाद मैं किसी काम से सचिवालय, लखनऊ गया था। वहाँ से जब शाम को निकल रहा था तभी एक अजनबी ने पीछे से मेरे कंधे को थपथपाकर पूछा – मुझे पहचाना आपने? वह देखने में एक अधेड उम्रवाला व्यक्ति लगता था। दाढी बढी हुई थी। मैं उसे बिल्कुल ही नही पहचान पाया और तब उसने कहा – हमलोगों ने कार में पहाड की सैर की थी।
    वर्षो पहले की सारी घटना एकबारगी मानस में कौंध कई। मैने उसे प्रश्न किया – क्या आप पर इस बीच कोई आपराधिक मामला चला?
    उसने मुस्कुराते हुए कहा – मेरी सावधानी ने मुझसे कोई अपराध होने ही नहीं दिया, तो फिर आपराधिक मामला कैसे चलता?
    उसका उत्तर सुनकर मुझे परम संतोष हुआ। मुझे ऐसा लगता है जब मैने यह निस्चय कर लिया कि निर्णय की पूर्व जानकारी होने के कारण मुझे इसके मामले को नहीं सुनना है, तभी त्रिकोण का एक महत्वपूर्ण कोण बिखर गया और पूर्व नियोजित परिणति अपने आप टूट गई। फिर न अपराधी ने अपराध किया और न न्यायाधीश द्वारा अपराध को निर्णीत करने का प्रश्न ही उठा। एक तिलस्म था जिसे बाबा ने तोड दिया था।

    अगली कहानी परकाया प्रवेश.......

    "आदमी सुनता है मन भर ,,
    सुनने के बाद प्रवचन देता है टन भर,,"
    और खुद ग्रहण नही करता कण भर

  8. #8
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    Bahut hi badhiya please aage likhiye

  9. #9
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    मिस्र का तांत्रिक
    महमुद एक क्षण तक अपनी स्मृति को बटोरते हुए सोचने लगे और में शान्ति से उनकी आगे की बातो की प्रतीक्षा करने लगा।
    हा, मैं समजता हुं आप मुझे एक प्रकार का जिन्नी अर्थात प्रेत-विद्या विशारद कह सकते है क्योकि मैं सचमुच प्रेतो से काम लिया करता हुं। लेकिन, मैं वास्तविक अर्थ में वह भी हू जिसे आप लोग जादूगर कहते है। इन्द्रजालिक नही, और दूसरो के गुप्त भावो को पढने वाला भी हु। बर, इससे और ऊँचा होने का मै दावा नही करता।

    वह जो कुछ होने का दावा करते है वही मुझे आश्चर्य-चकित कर देने के लिए पर्याप्त है।
    मैने उनसे पुछा – कृपा करके अपने उन गैबी-ताबेदारों की बाबत कुच समजा दिजिए।

    भूतों के बारे में?

    अच्छा, जितना अधिकार आज मैं उन पर कर रहा हूँ वह मुझे तीन वर्ष की कठोर साधना के बाद प्राप्त हो सका है। इस स्थूल संसार से परे जो दूसरी दुनिया है उसमें अच्छे तथा बुरे सभी प्रकार के भूत-प्रेत निवास करते है। में सदा अच्छे प्रेतों से ही काम लेने का यत्न करता हुं। उनमें से कुछ वे है जो इस संसार से मर कर वहाँ पहुँचते है। परन्तु मेरे अधिकतर ताबेदार तो जिन्न है जो प्रेत लोक के आदि निवासी है और जिन्हे कभी मनुष्य का शरीर नहीं मिला है। उनमें से कुछ तो जानवरों के समान बुद्धिहीन है और कुछ मनुष्यों के समान बुद्धिमान। कुछ जिन्न दुष्ट स्वभाव के भी होते है - जिन्न शब्द मिस्र देश का है इसका अंग्रेजी भाषा का पर्यायवाची शब्द मुझे नहीं मालूम है। इस दुष्ट जिन्नों से निम्न कोटि के इन्द्रजालिक, खास कर अफ्रीका के टोना करनेवाले ओझा लोग, काम लिया करते है। मैं उन से भूल कर भी सरोकार नहीं रखता। वे बडे खतरनाक सेवक है और कभी कभी अपने ही मालिक से दगा करके उसकी जान ले लेते है।

    वे मानवीप्रेत कौन है जिनसे आप काम लेते है?

    मैं आप से बता सकता हुं, उनमें से एक मेरा ही भाई है। वह कुछ साल पहले मर चुका है। मगर यह बात याद रखिए, मैं प्रेतों का माध्यम करनेवाला नही हुं। मेरे शरीर में न कोई भूत प्रवेश कर सकता है और न मैं उन्हे अपने ऊपर की प्रकार का प्रभाव ही डालने देता हुं। मेरा भाई मेरे मन पर अपनी इच्छा अंकित कर देता है अथवा मेरे मनोनेत्र के आगे अपने विचारो का चित्र सा खीच देता है, इस प्रकार वह मुझसे वार्तालाप कर सकता है। इसी रिति से कल मैने आप के लिखे प्रश्नों को जान लिया था।

  10. #10
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    कुछ समय पहेले......
    यह एक अनोखी और शायद कुछ सार्थक सी बात है कि इस विचित्र अन्वेषण में अपना भाग्य परखने की मेरी कोशिश अभी शुरु भी नही हुई कि भाग्य स्वयं ही मुझे खोजते हुए आ गया। अभी तक बम्बई के दर्शनीय स्थानो को देख भी नही पाया हुं। इस नगर के विषय मे मेरी अब तक की समस्त जानकारी एक पोस्ट कार्ड पर लिखी जा सकती है। मेरा समस्त असबाब, केवल एक सन्दुक को छोड कर अभी तक जैसे का तैसा बन्द पडा है। ट्रेन के एक साथी ने मुझे मैजिस्टिक होटल का परिचय दे कर कहा कि यह बम्बई के ऊँचे दर्जे का निवास स्थान है। यहा जब से आया हुं मेरी तमाम कोशिश यही रही है कि इस होटल के पास पडोस वालो से अच्छी तरह परिचित हो जाऊ। इसी यत्न मे मैने एक अदभुत खोज की है कि होटल के साथियो मे एक व्यक्ति ऐसा है जो जादूगर, असाधारण तांत्रिक अथवा अपूर्व मायावी है।
    स्मरण रहे कि यह व्यक्ति उन ऐन्द्रजालिकों की कोटि का नही है जो भ्रमित दर्शको की आँखो मे धूल झोक कर, उन्हे चकमा दे कर अपना और अपने प्रदर्शन का प्रबन्ध करने वाले थियेटर के स्वामियो का उल्लू सीधा कर लेते है। वह कोई ऐसा चालबाज नही था जो बाजारो मे गुठली बो कर तुरन्त ही पेड का उगना और उसमे आम का फलना दिखाते फिरते है। नही, वह तो मध्यकालीन तांत्रिको की श्रेणी का था। वह नित्य ही उन मायावी जीवों से काम लेता रहता है जो साधारण मनुष्यों के लिए अदश्य, पर उसकी नजरों के सामने उसका हुक्म तामील करने के लिए दौडते रहेतै है। कम से कम लोगो मे ऐसी ही प्रतीति उसने अपने विषय में पैदा कर रक्खी है। होटल के कर्मचारी सहमी हुई आँखों से उसकी ओर देखते और साँस रोककर उसके विषय में चर्चा करते है। जब कभी वह पास से गुजरता तो होटल के और मेहमान भी आप ही आप बातचीत का ताँता तोड कर घबराई हुई प्रश्न-सूचक दष्टि से उसकी ओर ताका करते है। वह उनसे बात भी नही करता और प्रापः अकेले में ही भोजन करना पसन्द करता है।
    जब हम देखते है कि पहिनाव से वह न तो यूरोपीय जान पडता है और न हिन्दुस्तानी, तब हमारा कुतूहल और आश्चर्य और भी बढ जाता है। वह नील नदी वाले मिस्र देश से आया हुआ एक यात्री है, जो वास्तव में तांत्रिक है।

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