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Thread: काला पत्थर

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    Aug 2016
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    काला पत्थर

    दिल्ली-नोएडा एक्सप्रेस वे पर गाडिय़ों का काफिला बड़ी ही द्रुत गति से कानपुर की तरफ बढ़ रहा है, काफिले केंद्र में एक सफेद रंग की गाड़ी बड़ी शानदार लग रही है। शायद कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति निकला है आज, गाड़ी के काले शीशे की आड़ में बैठा वह साया... खामोश था। जहाँ गाडिय़ों के शोर में कुछ भी शांत नहीं था वहीं गाड़ी के अंदर बैठा शख्स असाधारण रुप से शांत था। बाहर का कोलाहल उसके मन में उठते कोलाहल के सामने कुछ भी नहीं, वह बैठा था शांत, अटल, उसकी खामोशी उसके मन में उठते तूफ़ान की पहली आहट थी।

    यादों के समंदर में गोते लगाता उसका मन आज उसे उसी प्रेसिडेंसी कालेज में ले आया जहाँ उसे अपमान का जहर पीना पड़ा था।

    १ जुलाई २०१०, प्रेसिडेंसी कालेज का पहला दिन विक्रम के लिए ढेर सारे सवाल लेकर आया था। छोटे से गाँव में पढ़ने वाला लड़का अगर सूबे में प्रथम श्रेणी से पास हो तो समझो पूरा गाँव का नाम रोशन हो गया। दिन-रात पढ़ाई कर विक्रम ने इस कालेज में दाखिला प्राप्त किया था। पढ़ाई में अच्छा होने की वजह से कई दोस्त भी बने, रोशन, सुदेश, राखी, सबका चहेता था विक्रम।

    "कितना पढ़ेगा यार?.... चल एडल्ट मूवी देखने चलते हैं" रोशन चहकते हुए बोला, विक्रम ने एक नजर उसे घूरा फिर बोला "नहीं यार, तुम चले जाओ"। "चल ना यार... पिक्चर में तीन सीन भी हैं" सुदेश ने आँख मारते हुए कहा। "तुम दोनों मुझे डिस्टर्ब मत करो" विक्रम थोड़ा झल्लाते हुए बोला तभी राखी दोनों को खींचते हुए बोली "तुम दोनों लफंगे उसे तंग मत करो"। जाते-जाते अचानक राखी ठिठकी और पलटकर बोली "विक्रम, कल कालेज का फंक्शन है, तुम मेरे साथ आ रहे हो बस!" इतना कह वो चली गई।

    "सर!.. सर!!..." एक आवाज ने उसका ध्यान भंग किया, टोल नाके पर खड़े पुलिस अधिकारी ने सेल्यूट मारते हुए कहा "सर,..... सिग्नेचर"।

    ठीक आधे घंटे में उनकी गाड़ी हाईवे पर भाग रही थी। विक्रम के कानों में राखी की बातें आज तक गूँज रही थी, "पढ़ाई जरूरी है लेकिन और चीजें भी उतनी ही जरूरी होती हैं, ....... बाहर निकल कर देखो , किसी के लिए जीना सीखो, प्यार तुम्हें एक इंसान बनाता है"। अब इन बातों का कोई मतलब नहीं, "प्रेम सिर्फ सुंदर लोगों के लिए होता है...... मुझ जैसे कुरुप इंसान प्रेम के लायक ही नहीं होते"।

    अतीत की परछाईंयाँ उसकी आँखों में तैर रही है। "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई??....….." रितिका के शब्द विक्रांत के दिल पर धाड़-धाड़ कर लग रहे थे। कितना अलग था कालेज का यह फंक्शन?..... विक्रम की आँखों में पिछले साल के फंक्शन की यादें घूम रही थी। पिछले साल कालेज फंक्शन की शुरुआत शानदार थी, नाटक, गायन, संगीत, जैसे कला का इंद्रधनुष उतरा हो रंगमंच पर, लेकिन मुख्य आकर्षण था रितिका का नृत्य। वो नृत्य नहीं कुछ और ही था, लाल रंग के कपड़ों में जैसे स्वर्ग की अप्सरा उतरी हो, जैसे सब साँस लेना ही भूल गए हों। कुछ ऐसा ही हाल था विक्रम का, ऐसा लगा जैसे उसका दिल धड़कना ही भूल गया, जैसे किसी ने उसपर ढेर सारा गुलाबी रंग उड़ेल दिया हो जो धीरे धीरे उसके मन को सराबोर कर रहा हो।

    उस दिन के बाद से विक्रम की आँखें सिर्फ रितिका को देखने को बेताब रहने लगी। पहले पहल तो दोस्तों को विक्रम का बदला व्यवहार समझ नहीं आया लेकिन जब समझ में आया तो दोस्तों ने उसकी मदद करने की जगह उसे ही समझाने लगे "यार तुम समझ नहीं रहे हो!...." सुदेश ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा "रितिका इस कालेज की सबसे सुंदर लड़की है....... एक से एक स्मार्ट, हैंडसम पैसेवाले लड़के उसके पीछे पड़े हैं..... वो तुम्हारी तरफ़ देखेगी भी नहीं"।
    "तुम भी ना सुदेश!...." राखी नाराज़ होते हुए बोली "विक्रम जैसा लड़का उसे कहीं नहीं मिलेगा"।

    "मैं उसका दुश्मन नहीं हूँ, ...... लेकिन रितिका उसे कभी नहीं मिलेगी" सुदेश ने एक पल रेखा की तरफ देखा और फिर विक्रम की तरफ़ मुडा़ "तुम्हारा दिल दुखाने के लिए मुझे माफ़ करना दोस्त लेकिन मैं तुम्हारा दिल टूटते हुए नहीं देख सकता, तुम्हारा दिल सोने का है लेकिन रितिका को सिर्फ़ तुम्हारा काला रंग दिखेगा"। विक्रम जानता था कि सुदेश की कही एक एक बात सच है लेकिन सभी के इतना समझाने के बावजूद वह अपने दिल को रोक नहीं पाया। आखिरकार दोस्तों ने उसे रितिका से मुलाकात करवाई, विक्रम पढ़ाई में अव्वल तो था ही इसलिए रितिका ने भी अपने स्वार्थ के लिए उससे मिलना जारी रखा, वह सारे नोट्स और असाइनमेंट विक्रम से करवाती और विक्रम इसे प्रेम समझने लगा। आखिरकार उसने रितिका को कालेज फंक्शन में अकेले में अपने प्यार का इज़हार कर दिया। रितिका कुछ ना बोली, बस उसके चेहरे पर लाली थोड़ी बढ़ गई थी, शायद वो शर्म की लाली थी, .......... या शायद नहीं।

    फंक्शन के दौरान जब उसके कार्यक्रम का समय आया तो उसने विक्रम का हाथ पकड़कर स्टेज पर ले गई और हाथों से सबको चुप रहने का इशारा किया। चारों तरफ शांति छा गई, माइक हाथ में लेकर वो बोली "मेरे प्यारे मित्रों, ....... आज मैं आपको एक सरप्राइज़ देने वाली हूँ" यह सुनकर सब एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे, "किसी ने मुझसे अपने प्यार का इजहार किया है, ....... कोई है जो मुझसे शादी करना चाहता है, जानते हैं वो कौन है?.." सब बेसब्री से जानना चाहते थे उसके बारे में कि तभी रितिका बोली "वो हैं मिस्टर विक्रम!......" फंक्शन में बैठी भीड़ में अजीब सा सन्नाटा छा गया, हर नज़र विक्रम पर थी पर उनकी नजरों में एक चुभन थी। "विक्रम ने मुझसे जवाब माँगा है और मेरे सपनों के राजकुमार को मेरा जवाब है यह,.......तड़ाक!!!!" एक जोरदार आवाज हुई और वहाँ बैठा हर शख्स सन्न रह गया।

    रितिका की अंगुलियाँ विक्रम के गालों पर गहरा लाल रंग छोड़ गई, ..... "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यह सोंचने की कि मैं तुम जैसे से प्यार करुँगी?", "मेरे बारे में सोंचने से पहले एक बार अपनी सूरत आईने में देख ली होती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता"......रितिका का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था "हो कौन तुम?..... क्या हैसियत है तुम्हारी?....... बड़े-बड़े घरानों से मेरे लिए रिश्ते आते रहते हैं..... बड़े-बड़े पैसे वाले लड़के मेरे लिए अपना सबकुछ लुटाने को बेताब रहते हैं....... और तुम??", रितिका ने विक्रम के पास आकर कहा "ट्यूशन लेकर अपनी फीस जमा करते हो !...... क्या औकात है तुम्हारी???......."।

    विक्रम के हलक में जैसे काँटे उग आए हों रितिका ने विक्रम की आँखों में आँखें डालकर कहा "जानते हो क्या कीमत है तुम्हारी??......" इतना कह उसने. एक काला पत्थर विक्रम के हाथ में रखकर कहा "यह!.....राह में पड़ा पत्थर हो तुम जो सिर्फ ठोकर खाने के लिए बना हो!!.......रंग देखा है तुम्हारा????........ पत्थर हो तुम!..... एक ....काला पत्थर!!!..."। विक्रम का तो जैसे मस्तिष्क ही सुन्न हो गया ...... यह कहना मुश्किल था कि दर्द दिल टूटने का ज्यादा हुआ था या गाल पर पड़े उस तमाचे का।

    वो बारिश का मौसम नहीं था फिर भी घने बादल आए, घनघोर बारिश के साथ बौखलाईं तूफानी हवाएँ अपने साथ सबकुछ उड़ा ले जाने को आतुर थी, सब लोग भागे अपनी जान बचाने को सिर्फ एक को छोड़कर, तूफ़ानी हवाओं के थपेड़ों से अटल, बर्फ जैसा पानी धीरे धीरे विक्रम के सिर से नीचे आ रहा था, चारों तरफ़ मचे कोलाहल में उसकी आँखें बंद हो गई।

    “सर!!........ हम पहुँच गए” ड्राइवर की आवाज़ से विक्रम का ध्यान भंग हुआ तभी एक सीनियर इंस्पेक्टर ने कार का दरवाजा खोलकर सेल्यूट मारा।

    प्रेसिडेंसी कालेज में आज बड़ी नीलामी शुरू हो चुकी थी, …….. घर, गाड़ी, टीवी, फ्रिज, एक-एक की बोली लग रही थी, महिला पुलिस के साथ हाथों में हथकड़ियों को ताकती हुई रितिका सचदेव ने सपनें में भी नहीं सोंचा था कि कभी ऐसा दिन भी आएगा। घर के एक-एक सामान के साथ रितिका की इज्ज़त का एक भाग भी नीलाम हो रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे भरे बाज़ार रितिका खुद नीलाम हो रही हो।

    स्टेज पर चढ़कर कमिशनर के सामने जैसे ही विक्रम ने सैल्यूट किया, कमिशनर साहब उठ खड़े हुए और बोले “सुदर्शनजी,.....” विक्रम की तरफ़ मुँह कर बोले “ये हैं सीनियर इंस्पेक्टर विक्रमादित्य रावल फ्राम C.B.I., पूरे ब्यूरो में इसके जैसा काबिल और ईमानदार अफसर नहीं है”।

    कमिशनर साहब ने माइक लेकर लोगों को संबोधित करते हुए कहा “वैसे तो यह केस एकदम साफ़ है,....” कमिशनर ने एक नजर रितिका की तरफ़ नफ़रत से देखा और बोले “इस खूबसूरत से दिखने वाले चेहरे के पीछे एक चालाक और धोखेबाज़ चेहरा छुपा है……..... मिस रितिका सचदेव ने अपने कालेज के डीन पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपयों का हेर-फेर किया है…………. सारे सबूत इनके खिलाफ हैं फिर भी हमनें केंद्र सरकार से C.B.I.जाँच का आग्रह किया”।
    उपदेशोऽहि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये। पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम्॥

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    कमिशनर साहब ने विक्रम की तरफ़ रुख करते हुए कहा “पिछले कुछ दिनों से मिस्टर विक्रम इस केस की जाँच कर रहें हैं और आज वो हमें उनकी जाँच का नतीजा सुनाएँगे……… मिस्टर विक्रम प्लीज़” इतना कह कमिशनर साहब अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
    विक्रम ने माइक अपने हाथ में लिया, और सामने भीड़ को देखा, आज मौसम साफ़ है फिर भी ना जाने क्यों यह दिन विक्रम को उस दिन की याद दिला रहा था, उसकी नज़र रितिका पर पड़ी जो आँखें बंद कर अपने भाग्य के होने वाले फैसले के बारे में सोंच रही थी, ...शायद उसे अपनी निश्चित बर्बादी का अहसास था, और हो भी क्यों ना? जिस पल उसे पता चला कि उसके केस की जाँच कौन कर रहा है, रितिका ने बचने की कोई उम्मीद ही छोड़ दी। जिस विक्रम को उसने सबके सामने अपमानित किया, आठ साल बाद उसका वक्त आया है तो वो बदला ना लेगा?

    रितिका को आज उस भूल का अहसास हो रहा था जो हजारों वर्षों पहले द्रौपदी ने की थी ……. स्वयंबर में किए कर्ण के अपमान की वजह से उसका मान भरी सभा में बेंचा गया “मैं सूत पुत्र से विवाह नहीं करुँगी….” फिर वही भेदभाव…… फिर वही हैसियत वाली बात। रितिका ने कोई झूठी उम्मीद नहीं की, उसे पता था कि उसके द्वारा किये गये अपमान ने एक नये कर्ण को जन्म दिया है जो किसी के रोके ना रुकेगा।

    सब लोगों की नजरें विक्रम पर टिकी हुई थी, जिस दिन का वो पिछले आठ सालों से इंतजार कर रहा था आज वो दिन आ गया है, …….. जिस आग में जलते-जलते वो एक धधकता ज्वालामुखी बन गया आज वो उसके सीने से निकलकर रितिका को जलाने को बेचैन था। लेकिन मन के किसी कोने से किसी ने आवाज़ दी “लेकिन कर्तव्य का क्या??......”, “कोई कर्तव्य नहीं……. अब सिर्फ बदला!” विक्रम ने खुद के मन को झिड़ककर जवाब दिया।

    उसके हाथों में दो लिफाफे थे एक में थी उसकी रिपोर्ट जो रितिका की बर्बादी का सुकून देने वाली थी और दूसरे में था रितिका की बेगुनाही का सबूत, असली अपराधी का इकबाल ए जुर्म।

    “बदला!.....या फर्ज??”


    आज मौसम बड़ा साफ़ है…… लेकिन…...लेकिन? …..आसमान में वो बादल क्यों हैं? ……. थोड़ी ही देर में कालेज के उस स्टेडियम में हवाँए तेज होती गई, ……. आसमान में तूफ़ानी बादलों को देख जमीनीं हवाँए भी उग्र होने लगी, एक के बाद एक सामान, तंबू और ना जाने क्या क्या इन बौराई हवाओं की भेंट चढ गया। उस दिन की तरह आज भी लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे तभी विक्रम ने माइक से कहा “साथियों!........” उसकी आवाज़ में गरज थी जिसे सुनकर जो जहाँ था वहीँ रुक गया।

    “जमीन में पड़ा छोटा सा कंकर भी अगर इस तूफान से लडकर वहीँ खड़ा है तो क्या आप कंकर से भी ज्यादा कमजोर हैं?” विक्रम की आवाज़ में कुछ तो बात थी जो लोग उसे एक घंटे तक सुनते रहे।

    ……...आज मौसम फिर साफ था और शाम के सूरज की किरणों में सबको सच दिखाई दिया।
    रितिका की बेगुनाही खुद रितिका के लिए आश्चर्यजनक थी। नीलामी रद्द हो गई, रितिका का खोया सम्मान मिल गया। बस नहीं मिला तो एक मौका, माफी माँगने का विक्रम से, ……..वो जैसे आया वैसे ही चला गया, बिना किसी से कुछ बोले। बस छोड़ गया तो वो काला पत्थर जो कभी रितिका ने उसके काले रंग का मजाक उड़ाते हुए दिया था।

    वो काला पत्थर ….. आठ साल बाद उसने सूत समेत रितिका को वापस कर दिया,........ शायद रितिका को उसकी ज्यादा जरुरत थी।
    उपदेशोऽहि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये। पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम्॥

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