दीवार-घड़ी शाम के तीन बजा रही है। दिलीप मुँह बनाए घड़ी की ओर देखता हुआ निराश बैठा है। उसी समय वहीदा का फ़ोन आ जाता है। वहीदा पूछती है कि कैसे हो? खाए-पिए मस्त बैठे होगे। अब तो तुम्हारे पास टोकन की कोई कमी नहीं है! दिलीप बताता है कि उसने सुबह से कुछ नहीं खाया। भूखा बैठा है। वहीदा आश्चर्यचकित होकर पूछती है कि अब क्या प्रॉब्लम है? दिलीप बताता है कि उसे आज शाम छः बजे का डिलीवरी स्लॉट मिला है। खाने-पीने के सामान की सप्लाई शाम छः बजे के बाद ही होगी। उसे सुबह का डिलीवरी स्लॉट मिलता ही नहीं। यही सबसे बड़ी दिक्कत है। वहीदा कहती है कि 'अच्छा, तो यह बात है। अब तुम्हें हमेशा सुबह का डिलीवरी स्लॉट ही मिलेगा। प्रॉब्लम सॉल्व्ड!' दिलीप खुश दो जाता है।