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Thread: अजीब दास्तां

  1. #1
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    Post अजीब दास्तां

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    दोस्त की शादी



    मार्च का महीना बड़ा ही मजेदार होता है, गर्मी उतनी होती नहीं और मौसम एकदम सुहाना रहता है ऐसे में अगर किसी दोस्त की शादी में जाना हो तो तो फिर क्या कहने। रजत इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था कि तभी उसके दोस्त रोहन ने टोका "अरे कहाँ खोए हुए हो भाई, जल्दी करो नहीं तो देर हो जाएगी!" रजत चौंक कर उठा और अपना सामान पैक करने लगा तभी मनोज ने चुटकी लेते हुए कहा "हाँ भाई जल्दी करो नहीं तो चंदन की शादी में नहीं बल्कि सुहागरात में पहुंचेंगे" यह बोलते ही सब हँसने लगे।
    रजत, रोहन, मनोज और दीपक चारों दोस्तों ने साथ ही पढ़ाई की और फिर सिविल सर्विस परीक्षा में पास भी हो गये। फिर क्या था जलवे ही जलवे चारों की चौकड़ी धमाल मचाने में मशगूल हो गई, पास में ही दफ्तर होने से खाना पीना सब साथ होता था। चंदन उनके साथ एक सेमिनार में दिल्ली में मिला था तब से इनकी दोस्ती घनिष्ठ हो गई थी। यूं तो चंदन सभी से बहुत घुलामिला था लेकिन रजत के साथ वह हर बात शेयर किया करता था, दोनों की दोस्ती बहुत ही गहरी थी।
    चंदन के पिता सुंदरगढ़ के जमींदार घराने से थे। जमींदारी तो खत्म हो गई लेकिन सूबे में उनका रुतबा किसी राजा से कम नहीं था, दिल के अच्छे होने से और गरीबों की सहायता में आगे रहने से गाँव के सभी लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते थे। इतना सब कुछ होने के बाद भी उन्हें कोई औलाद नहीं थी, काफी मन्नतें मांगी, कई जगह माथा टेकने के बाद उन्हें चंदन मिला था।
    चंदन जब पैदा हुआ था तो वो अकेला नहीं बल्कि उसका एक जुड़वां भाई भी था जो महज़ चंद घंटों में चल बसा था। चंदन को रजत में उसके जुड़वे भाई की छवि दिखती थी, वो अक्सर कहा करता था कि अगर उसका जुड़वां भाई जिंदा होता तो बिल्कुल रजत जैसा होता।
    चारों जल्दी जल्दी तैयारी में लगे थे लेकिन फिर भी उन्हें मुंबई से निकलते-निकलते ही शाम के 6 बज गए।
    "इतनी जल्दी करते करते भी लेट हो गए यार!" रोहन झुंझलाते हुए बोला।
    "लेट तो इस कमबख्त मनोज की वजह से हुए हैं, जनाब सज-धज तो ऐसे रहे थे जैसे खुद की ही शादी हो!" दीपक ने आँखें मटकाते हुए कहा।
    "हांजी और आपकी शेरवानी जो इस्त्री करवाने के लिए भागे थे आप?" दीपक ने पलटवार करते हुए कहा।
    "तुम लोग चुप भी रहोगे?..." रजत ने सबको चुप करते हुए कहा, कुछ पल की शांति छा गई। सभी ने अपना सामान गाड़ी में डाला और जा बैठे गाड़ी में, थोड़ी देर में ड्राइवर ने एक अगरबत्ती सुलगाई और गाड़ी के चारों ओर घुमाकर गाड़ी में लगा दी।

    "ये क्या कर रहे हो मोहन काका?" मनोज ने कौतूहल से पूछा।
    "साहब! लंबा सफ़र है सुरक्षित कट जाए इसलिए यह देवता की पूजा है!" मोहन काका बोले।
    "काका जल्दी करो नहीं तो हमारी गर्दनें कटने की नौबत आ जाएगी!" रोहन ने बेचैन होते हुए कहा।

    गाड़ी स्टार्ट हुई और थोड़ी ही देर में हवा से बातें करने लगी।अंधेरा होने लगा था और हाइवे पर इनकी गाड़ी सरपट दौड़ रही थी, कुछ देर तक तो कोई नहीं बोला फिर अचानक दीपक ने रोहन से सवाल किया "वैसे तुमने गौर किया?.."।
    "क्या??..." रोहन ने चौंकते हुए पूछा।
    "यही! कि...यह मनोज की शादी तो नहीं है ना? ... देख कितना बन-ठन कर आया है!" दीपक ने आँख मारते हुए कहा तो सभी ठठाकर हँस पड़े।
    "वैसे मेरे बारे में तो पता नहीं लेकिन! ....... लगता है किसी और की शादी जरूर होने वाली है!" मनोज ने रजत की तरफ इशारा करते हुए कहा, अगले ही पल सभी रजत को घूर रहे थे। यह देख कर रजत थोड़ा असहज होता हुआ बोला "तुम भी ना यार!..... कुछ भी बोलते हो.……. शादी ऐसे नहीं होती हैं!"
    "हाँ यार! बड़ा तामझाम होता है, लड़की देखो, परिवार देखो, सगाई करो सैकड़ों रस्में पूरी करो तब होती हैं शादी!" रोहन ने बीच में ही टोकते हुए कहा।
    "तुम्हें बड़ा पता है?....." दीपक बीच में ही बोल पड़ा।
    "क़िस्मत का क्या भरोसा?... पता चले कि दूल्हे को भी खबर ना हो कि उसकी शादी होने वाली है!" मनोज हँसते हुए बोला।
    "फिर शुरू हो गए तुम??.." रजत ने सबको चुप करते हुए कहा।
    रात के दस बज रहे थे, उनकी गाड़ी मध्य प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर रही थी। चारों तरफ़ सुनसान रास्ते पर इनकी गाड़ी सरपट दौड़ी जा रही थी। खुला आसमान, ठंड़ी हवाओं ने मौसम को और सुहाना कर दिया था उस पर चाँदनी रात ने तो पूरा माहौल शायराना कर दिया था।

    "वो दिल पर चली छूरी की तरह,
    लेकिन मोटी भी बहुत थी पूरी की तरह!" दीपक ने शेर मारा तो रोहन बोला "वाह! वाह!..... क्या वाहियात शेर मारा है!",
    तो दीपक ने कहा "अरे क्या यार!... अच्छा तो था!"
    तभी मनोज को जोश आया और उसने भी एक शेर दागा "तुम हुस्न परी तुम जाने जहाँ, तुम सबसे हसीं तुम सबसे जवाँ......", "सौंदर्य साबुन निरमा!!.." तभी रोहन तपाक से बोला और सब जोर से ठहाके लगाने लगे।

    थोड़ी देर हँसने के बाद जब सब शांत हुए तब रजत के मुँह से निकले शब्दों ने सबका ध्यान खींचा
    "ये क्या है हम दोनों में, कुछ है भी या कुछ भी नहीं
    ये कैसी डोर है जिसके, कच्चे धागे तोड़े ना टूटे।
    कैसा ये संग है जिसमें तुम पास नहीं पर दूर भी नहीं।
    ............."
    सब जैसे मंत्रमुग्ध से हो गए थे, सब चुप थे "आगे?......" तभी रोहन ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा। "अरे आगे भी तो बोलो!...." दीपक ने भी रोहन की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा।
    "बस इतनी ही है, ...... अधूरी सी!.." रजत ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
    "हाँ! अधूरी तो है!..... लेकिन.... क्या पता इस सफर में यह कविता भी पूरी हो जाए!" मनोज ने संजीदगी से कहा।

    गाड़ी में एक अजीब सी खामोशी छा गई थी तभी ड्राइवर ने कहा "साहब 11 बजने वाले हैं, आगे एक ढाबा आने वाला है वहाँ पर खाना खा लीजिए फिर आगे कुछ नहीं मिलेगा"।
    सभी ढाबे पर पहुंचने का इंतजार करने लगे, ...... या शायद ढाबा उनका इंतजार कर रहा था ......... बड़ी.... बेसब्री से!
    ----------
    ///// कहानी जारी है अगले भाग में /////

    Last edited by anita; 20-07-2022 at 07:42 PM.
    उपदेशोऽहि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये। पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम्॥

  2. #2
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    कहानी में रोचकता प्रतीत हो रही है
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  3. #3
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    Quote Originally Posted by anita View Post
    कहानी में रोचकता प्रतीत हो रही है
    आगे का अपडेट कब आएगा?

  4. #4
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    Update karo bhai Ji
    हकलाते हैं तो संस्कृत सीखें,जो व्यक्ति धाराप्रवाह बोल नहीं पाते, अटकते हैं या फिर हकलाते हैं उन्हें संस्कृत सीखना चाहिए।संस्कृत से हकलाना भी खत्म हो जाता है।

  5. #5
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    नरेंद्र जी सूत्र आगे बढ़ाइये
    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  6. #6
    नवागत
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    ये कहानी पिछले दो सालो से आगे नहीं बढ़ी है यहाँ भी उम्मीद कम ही है

  7. #7
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    लगभग आधे घंटे में वे चारों ढाबे पर पहुँचे और पहुंचते ही उन्होंने चिकन, राजमा, छोले और ना जाने क्या क्या आर्डर कर दिया। ढाबे वाले की तो बांछें खिल गई थी, आज बड़े लोग आए है और बड़ा आर्डर मतलब खूब कमाई। वो खुद दौड़ा दौड़ा आया और टेबल कुर्सी लगाने लगा। "आइए साहब, पूरे इलाके में हमारे जैसा खाना नहीं मिलेगा!..." ढाबे का मालिक खुशी से बोला।
    "हाँ भाई समझ गया लेकिन,....." मनोज दीपक की तरफ़ देखते हुए बोला "सिर्फ खाना मिलेगा या ........ और कुछ भी है?"
    ढाबे वाला तुरंत मतलब समझ गया और बोला "हाँ साहब, सब कुछ मिलेगा, ...... आप खाना खाइए तब तक मैं बाकी इंतजाम करके आता हूं!"

  8. #8
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    "तुम भी ना यार!.... हद करते हो!!" रजत नाराज़ होते हुए बोला।
    "क्या हद?...... हम छुट्टियां मनाने आए हैं,......... दोस्त की शादी की खुशी में सुहागरात तो हम मना ही सकते हैं?" मनोज बोला।
    "और नहीं तो क्या? ....... वरना चंदन को क्या बताएंगे कि कब घूंघट उठाना है और कब उसकी गोरी टांगें!" दीपक आँख मारते हुए बोला।

  9. #9
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    "तुम लोग बड़े ही गंदे हो, जो करना है जल्दी करो और निकलो नहीं तो शादी में लेट हो जाएंगे!" रोहन झुंझलाते हुए बोला।



    मनोज और दीपक पास ही बनी दो कमरे में चले गए, थोड़ी देर में दो लड़कियां उनके कमरों की तरफ़ जाती दिखाई दीं।
    उनकी तरफ़ देखते हुए रोहन बोला "ये दोनों मरदूद तो लग गए अपने काम में, ...... तुम सुनाओ!....... आज बड़े चुप चुप से लग रहे हो!"

  10. #10
    नवागत
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    यह सुनकर रजत थोड़ा मुस्कुराया फिर बोला "पता नहीं यार!..... ये सफ़र कुछ अलग लग रहा है"।
    "कैसा अलग? ....... मैं समझा नहीं!" रोहन ने गंभीर होते हुए पूछा।
    "समझा तो मैं भी नहीं, ..... लेकिन?.......बार-बार यह रह-रह कर महसूस हो रहा है कि जैसे कुछ होने वाला है, ...….. जैसे कोई हमें देख रहा हो!" रजत की बातें रोहन को थोड़ी अजीब लगीं लेकिन उसने यह जाहिर नहीं होने दिया।
    थोड़ी देर बाद रोहन बोला "तुम काफ़ी थक गए हो शायद इसीलिए ऐसा लग रहा हो?"
    "हो सकता है!......." रजत ने हामी भरते हुए कहा "लेकिन ऐसा लगता है कि हमारा यह सफ़र ब सबहुत लंबा होगा..!"

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