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Thread: तांत्रिक मसाननाथ व कापालिक

  1. #1
    नवागत
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    तांत्रिक मसाननाथ व कापालिक

    आसनसोल स्टेशन से लगभग 15 मील दूर उत्तर पूर्वी
    कोने पर हैं शिवपुर गांव | गांव न बोल इसे एक छोटा ब्लॉक बोलना सही रहेगा क्योंकि स्कूल , कॉलेज , हॉस्पिटल से लेकर शहरी ढांचे तक यहां मौजूद हैं |
    इसके अलावा गांव के बाहर वाले पुलिस चौकी को
    भी अब थाने में बदल दिया गया है |
    शिवपुर के पश्चिम दिशा में अजय नदी बह रही है | इस नदी का एक इतिहास है | आज से लगभग 500 साल पहले 15 वीं व 16 वीं शताब्दी में अजय नदी ने अपना दिशा बदला | जिसके कारण शिवपुर के पश्चिम का एक बड़ा भाग पानी के नीचे खो गया | बड़े - बूढ़े बताते हैं कि वहां पर बाबा महादेव का एक सुंदर बड़ा सा मंदिर था | उस मंदिर का बहरी हिस्सा इतना मजबूत था कि सुल्तान बाबर भी इसका कुछ न बिगाड़ सके |
    और यह भी कहा जाता हैं कि मंदिर के अंदर कई भूलभुलैया को खोजा गया था | उस भूलभुलैया का समाधान केवल एक पुरोहित परिवार के पास ही था |
    वंश परंपरा में यह आज भी चल रहा है | मरने से पहले ब्राह्मण पिता अपने संतान को या अपने उत्तराधिकारी
    पौत्र को मंदिर के सभी भूलभुलैयों का समाधान बताकर जाते हैं | वह ब्राह्मण परिवार अब शिवपुर में नहीं रहता है इसलिए उनके वंश के बारे में विवरण देना बिल्कुल भी सहज नहीं है | लेकिन यह कहानी सौ प्रतिशत सच न होने पर भी , पश्चिम के खोए भाग में एक महादेव का मंदिर था यह बिल्कुल सच है | क्योंकि गर्मी में जब अजय नदी की पानी कम हो जाती हैं तो उस ऐतिहासिक मंदिर के ऊपर
    का भाग थोड़ा सा दिखता हैं | 3 साल पहले गांव के कुछ युवक तैरकर उस मंदिर के पास गए थे | उनका लक्ष्य पानी के अंदर डुबकी लगाकर मंदिर के बाहरी भाग को देखना व उस बारे में तथ्य संग्रह करना था | लेकिन आश्चर्य की बात ये हैं की पानी में जाने के कई घंटों बाद भी कोई भी युवक लौटकर नहीं आया | अजय नदी के दूसरी ओर देवकर गांव है | वहां पर खोजबीन करके पता चला कोई भी युवक व उसका लाश नहीं दिखा | इसके बाद शिवपुर पुलिस चौकी में सूचना पहुंचने पर उन्होंने गोताखोरों को बुलवाया | लेकिन तबतक गांव में बारिश होने लगी थी जिसके कारण नदी का पानी बढ़ गया है | मंदिर का ऊपरी भाग भी पानी के नीचे चला गया है | लगभग 8 दिन तलाशी के बाद भी किसी युवक का लाश नहीं मिला | पुलिस ने अनुमान लगाया था कि कोई बड़ी मछली या मगरमच्छ ने लाशों को खा लिया होगा | लेकिन इस बात पर वो कोई प्रमाण ही नहीं दे पाए और उसका रहस्य अधूरा ही रह गया |
    अब शिवपुर गांव के बारे में बताता हूँ | इस गांव में पांच साल पहले सौ से अधिक लोग रहते थे लेकिन अब ज्यादातर शहर कि ओर चले गए | दिन पर दिन लोग कम ही हो रहें हैं | उनका कहना है कि इस गांव में उनके लड़कों का कोई भविष्य नहीं है |
    नौकरी व पैसों के लिए एक समय शहर तो जाना ही होगा इससे अच्छा पहले ही चला जाए | खेती व स्थानीय व्यवसाय से शिवपुर के लोग जीवन यापन रहे थे | लेकिन इस गांव में मानो अभिशाप लगा है | मिट्ठी सूख रही है , पेड़ों के पत्तें काले होते जा रहें हैं | आसमान में पहले के जैसे चिड़िया नहीं दिखाई देते | प्रकृति देवी मानो इस गांव से रुष्ट हो गई हैं |
    और इससे भी भयानक बात कि पिछले दो रातों में एक के बाद एक दो हत्याएं हुई है | लेकिन यह कोई साधारण हत्या नहीं है | चोरी , डकैती व कोई दूसरा अपराध होता तो कोई बात नहीं थी लेकिन बहुत ही अद्भुत तरीके से हत्याएं हुई है | किसी ने उन लोगों के आँखों को निकालकर , अपने अंदर के पैशाचिक हिंसा को पूरा किया है | केवल इतना ही नहीं धारदार अस्त्र से उनके छोटे - छोटे टुकड़े भी किए | और शरीर के कई अन्य भाग भी नहीं मिले |
    इसी घटना कोलेकर शिवपुर थाने में बात चल रही थी | इस समय यशपाल चौधरी इस इलाके के ऑफिसर इंचार्ज हैं |
    थाने में यशपाल के अलावा नरेंद्र नाम के एक सबइंस्पेक्टर भी हैं | नरेंद्र ने कुछ दिन पहले ही पुलिस डिपार्टमेंट को जॉइन किया था | यशपाल से नरेंद्र का उम्र लगभग 12 साल कम होगा |
    यशपाल ने नरेंद्र से पूछा - " अब क्या किया जाए नरेंद्र ? "
    नरेंद्र ने उत्तर दिया - " सर् , मुझे लगता है थोड़ा पूछताछ करके छोड़ देना ही सही रहेगा | "
    उन दोनों की नजर सामने कुर्सी पर बैठे एक आदमी के तरफ है | आज सुबह ही विनय नाम के इस आदमी को थाने में लाया गया है | पिछले दो रातों में हुए हत्याओं का शक इसी आदमी के गया है |
    यशपाल ने नरेंद्र की ओर देखते हुए बोले - " हाँ तुम सही कह रहे हो | और तुम विनय कल रात को घर कब लौटे थे ? फिर क्या किया सब कुछ बता सकते हो | "
    विनय का गला मानो सूख गया है | कुछ देर सोचने के बाद वह बोला - " सर् , मैं कल रात को साढ़े दस बजे के आसपास घर लौटा था | इसके बाद बहुत गर्मी के कारण बाहर नल पर स्नान करने गया | तभी मुझे लगा कोई मेरे पीछे खड़ा है | पीछे घुमते ही उसने मेरे सिर पर वार किया जिससे मैं बेहोश हो गया | जब होश आया तब मैंने देखा कुछ लोग मुझे घेर कर खड़े हैं | एवं उनके द्वारा ही मैं जान पाया की ऐसी दुर्घटना घटी है | इसके अलावा मैं कुछ भी नहीं जानता | "
    " ठीक है समझ गया | अब तुम जा सकते हो | कभी काम लगा तो तुम्हें फिर हम बुला लेंगे | "
    विनय के जान में जान आई | जल्दी से कुर्सी छोड़ उठकर दरवाजे की ओर जाते हुए वह बोलता रहा -
    " ठीक है सर् , बहुत बहुत धन्यवाद | "
    कुछ देर बाद ही विनय दूर निकल गया |
    यहां बता देता हूँ कि उसे एक विशेष से पकड़कर लाया
    गया था | कई गांव वालों का कहना है कि विनय इन हत्याओं के साथ स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है | इस हत्या
    के जाँच पड़ताल में भी कुछ ऐसे ही संकेत मिले हैं |
    कुछ सोचकर यशपाल बोले - " नरेंद्र , ये जो लगातार दो रात दो मृत्यु हुई | इन दोनों में कुछ समानताएं दिख रही है | पहला दोनों के मौत का समय लगभग एक जैसा था |
    और दोनों के आँख को हत्या के समय निकाल लिया गया | एक और बात आश्चर्य कर देने वाला है कि इन दोनों का घर विनय के घर के पास ही है | लेकिन विनय कुछ भी नहीं बताया | आज रात को विनय के ऊपर नजर रखना होगा | "
    नरेंद्र बोला - " हाँ सर् , मुझे भी विनय के ऊपर ही संदेह हो रहा है | लेकिन उसके खिलाफ हमारे पास कोई सबूत नहीं है | पर शायद आज रात हम कुछ जान पाएंगे | "
    " हाँ ऐसा ही लगता है | " यह बोलकर वो टेबल से गर्म चाय के प्याले को उठा लिए |
    और फिर बोले - " मैं सोच रहा हूँ कि कुछ पहरेदारों को आज गांव में नियुक्त कर दूंगा | जिससे सभी तरफ नजर रखा जाए | "
    नरेंद्र ने थोड़ा सोचकर उत्तर दिया - " हाँ सर् , यह ठीक रहेगा | "

    उस दिन शाम को पैसे देकर पहरेदार बुलाए गए | कुछ आदमियों की टोली इसके लिए मान गए |
    उनसे बताया गया कि शाम होने के बाद गांव के पूर्वी दिशा से अजय नदी के किनारे तक फ़ोर्स के जैसा पहरा लगाया जाएगा | और इसके साथ ही बीच - बीच में ' जागते रहो ' कहकर सोते हुए लोगों को सतर्क करना होगा | इन सभी कामों को नरेंद्र के अंतर्गत किया जाएगा | कुछ ज्यादा ही काम कि वजह से यशपाल आज थाने से बाहर नहीं आएंगे |
    शाम आठ बजे के पहले ही सभी 20 पहरेदार उपस्थित हुए | उनको काम समझाकर लगभग तीन घंटे बाद नरेंद्र थाने में लौट आया | और यशपाल से इशारों में बता दिया कि आज रात को कोई डर नहीं है |.....



    Last edited by Cutie Pie; 31-07-2022 at 11:50 PM.

  2. #2
    नवागत
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    आज सुबह से ही आसमान काला है । कल रात को बारिश भी हुई थी । थाने का काम उस समय शुरू नहीं हुआ था । रूम से थाने तक जाने में पांच मिनट लगता है । आज यशपाल को कुछ ज्यादा ही समय लगा एवं थाने के पास आते ही कई लोगों के आवाज को सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ । और कुछ आगे बढ़ते ही उन्हें नजर आया कुछ आदमी और एक महिला चिल्ला रहे थे ।
    यशपाल को देखते ही वह महिला उनके पास दौड़ती हुई आई और रोते हुए बोली - " साहब कल रात किसी ने मेरी लड़की को मार डाला । "
    यशपाल चौंक गए - " मार डाला मतलब ? "
    " मैं कुछ भी नहीं जनता साहब , कल रात को मेरी लड़की एक बार बाहर निकली थी । कुछ देर बाद उसके चिल्लाने की आवाज़ सुन मैं दौड़कर वहाँ पहुंचा । जाकर देखा तो ऐसा हो गया था । "
    यशपाल समझ गए कि यह हत्या स्वाभाविक नहीं है । उन्होंने महिला से पुछा - " आप थोड़ा सोचकर बताइए
    कि आपने वहाँ आसपास किसी को देखा था ? "
    महिला ने उत्तर दिया - " नहीं साहब किसी को भी नहीं
    देखा । "
    इसके बाद यशपाल कुछ देर सोचने के बाद बोले -
    " ठीक है आप घर जाइये , हम जाँच पड़ताल करके
    बताएंगे । "

    गांव वाला सड़क पूरी तरह कच्ची है । और कल रात बरसात होने के कारण जीप के पहिये मिट्टी में धंस रही है इसीलिए घटना स्थल पर पहुंचने में पुलिस को कुछ ज्यादा ही समय लगा ।
    गाड़ी से उतर नरेंद्र भीड़ को हटाकर लाश की ओर बढ़ा । उत्तेजित जनता के कुछ शांत होने के बाद यशपाल गाड़ी से उतरे । उन्होंने देखा कि उस महिला के घर से कुछ दूर उनके 15 - 16 साल की लड़की की हत्या हुई है ।
    दूर से ही दिखाई दे रहा है कि मृत शरीर के अंग इधर - उधर बिखरे हैं । यशपाल मृत शरीर के पास पहुंचे ।
    उस लड़की का शरीर उल्टा पड़ा हुआ था । कंधे से पकड़ शरीर को सीधा करते ही यशपाल और नरेंद्र चौंक कर पीछे हट गए । क्योंकि यह हत्या भी पहले के दोनों हत्याओं जैसा अमानवीय व रहस्यमय है । लड़की के दोनों आँखों को हत्यारे ने निकाल लिया है , शरीर के कई जगहों से काटा है । यह दृश्य इतना ही विभत्स है कि मृत शरीर की तरफ कोई देख नहीं पा रहा ।
    यशपाल , नरेंद्र से बोलकर शरीर को थाने और फिर पोस्टमार्टम में भेजनें के लिए बोले ।
    घटनास्थल से लौटने के पहले यशपाल ने कई गांव वालों से पुछा - " कल रात को आपने यहाँ पर किसी को देखा था ? "
    पहले किसी ने उत्तर नहीं देना चाहा । सभी चुप थे । यशपाल समझ गए कि इसबार बहुत जाँच पड़ताल करना होगा ।
    उनके जीप की ओर बढ़ते ही भीड़ से एक बुढ़ा आदमी निकला और पास जाकर बोला - " साहब एक बात आपको बोलना था । "
    उस बूढ़े ने एक ओर इशारा करते हुए कहा - " साहब , उस पेड़ के पीछे ही मेरा घर है । कल रात को बारिश शुरू होते ही मैं अपने गाय भैसों को देखने के लिए बाहर निकला । बाहर निकलते ही मुझे ऐसा लगा कोई सामने के रास्ते से भाग गया । मैंने सोचा कोई गाय चुराने वाला होगा इसीलिए धीरे - धीरे छुपकर कच्चे सड़क पर आते ही देखा वहाँ जगदीश मास्टर का लड़का विनय खड़ा था । "
    " वहाँ पर विनय क्या कर रहा था ? "
    " क्या कर रहा था ये तो नहीं जानता । लेकिन उसके हाथ में शायद एक धारदार अस्त्र था जो बिजली चमकते ही दिख रहा था । विनय ने मुझे नहीं देखा । मैं इस पेड़ के पीछे छुपकर देखा वो इधर ही आ रहा था । बारिश बहुत जोरों से हो रही थी इसीलिए मैं घर के अंदर चला गया । विश्वास कीजिए इससे ज्यादा मैं कुछ भी नहीं जानता । "
    यशपाल बोले - " जो बता रहे हो सभी बातें सच हैं या नहीं । "
    " पूरी तरह सच है । झूठ बोलकर मुझे क्या फायदा ? "
    " अच्छा ठीक है तुम मुझे विनय के घर लेकर चलो । "
    बूढा आदमी मान गया । इधर नरेंद्र ने कोतवाली में सूचना देते ही । कुछ पुलिस और दो गाड़ी की व्यवस्था हुई । उस लड़की के शरीर को घटनास्थल से ले जाने में लगभग 3 घंटे लग गए । दूसरी तरफ यशपाल उस बूढ़े आदमी के साथ विनय के घर पहुंचते ही अवाक रह गए । दोपहर बीतने के बाद भी विनय सो रहा था । विनय के घर का दरवाजा अंदर से बंद था । दो - तीन बार बाहर से कुण्डी खटखटाने के बाद अंदर से आवाज सुनाई दिया ।
    विनय घर से बाहर निकला । उसे देखते ही यशपाल ने सीधे प्रश्न पूछा - " विनय कल रात को तुम धारदार हथियार लेकर कहां गए थे ? "
    यह सुनते ही विनय चौंक उठा । फिर उत्तर दिया - " कल रात को सर् मैं अपने खेत की ओर गया था । लेकिन कुछ दिन से ऐसी घटनायें हो रही है इसीलिए अपने बचाव के लिए साथ में कुल्हाड़ी को लेकर निकला था । "
    यशपाल हँसते हुए बोले - " विनय तुम झूठ बोलकर और कितने दिन बचोगे । एक न एक दिन जरूर पकड़े जाओगे ।"
    विनय अब रोने लगा और बोला - " मैं सच बोल रहा हूं सर् , मुझे कुछ भी नहीं पता । मैंने कुछ भी नहीं किया , मैं निर्दोष हूं । "
    यशपाल ने और ज्यादा कुछ नहीं बोले । उनके पास
    विनय के खिलाफ कोई बड़ा सबूत नहीं है । इसीलिए
    घर से बाहर निकल आए । इसके बाद बूढ़े आदमी को उनके घर पहुंचाकर । जीप में बैठ थाने की ओर चल पड़े ।
    उस समय शाम के पांच बज रहे थे । नरेंद्र नगर कोतवाली से काम खत्म करके अभी यहां लौटे थे ।
    यशपाल ने उन्हें अपने केविन में बुलाया ।
    केविन में नरेंद्र के प्रवेश करते ही वो बोले - " समझे नरेंद्र पहरेदारों से कुछ नहीं होगा । कल पहरेदार थे इसके अलावा भी इतनी बड़ी घटना घट गई । ऐसे ही हत्याएं होती रही तो अपने ऊपर बैठे अधिकारी को क्या जवाब दूंगा । "
    नरेंद्र के मन में भी यही प्रश्न है लेकिन इसका उत्तर नहीं है । वह कुछ देर चुप रहने के बाद बोला - " सर् आप ही बताइए अब क्या किया जाए ? "
    यशपाल कुर्सी छोड़ उठ खड़े हुए । उन्होंने सोच लिया है कि क्या करना होगा ।
    " अब ऐसा लग रहा है कि हम दोनों को ऑपरेशन में उतरना होगा । ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है केवल विनय के ऊपर थोड़ा नजर रखना होगा ।लेकिन गांव के किसी को भी इस बारे में पता न चले । "
    " ठीक है सर् आज रात से ही हम शुरू कर देंगे । "

  3. #3
    सदस्य anita's Avatar
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    बहुत बढ़िया

    नया सूत्र शुरू करने के लिए आपको धन्यवाद

    सभी उपस्थित मित्रो से निवेदन है फोरम पे कुछ न कुछ योगदान करे,अपनी रूचि के अनुसार किसी भी सूत्र में अपना योगदान दे सकते है,या फिर आप भी कोई नया सूत्र बना सकते है

  4. #4
    नवागत
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    उस दिन रात आठ बजे से पहले ही यशपाल व नरेंद्र ने खाना समाप्त किया । खाना बनाने वाली मौसी का भोजन मानो दिन पर दिन अस्वादिष्ट होता जा रहा है । दाल , मछली करी के बावजूद यशपाल चार से ज्यादा रोटी नहीं खा सके । लेकिन अच्छा ही हुआ रात जागने के लिए सुविधा ही होगा । 9 बजते ही दोनों रूम से निकल पड़े । नरेंद्र के हाथ में बड़ा वाला टोर्च है ।
    गाड़ी न लेकर पैदल ही दोनों चल पड़े । इसीलिए दो मील दूर गांव में पहुंचने के लिए उन्हें काफी समय लग गया । गांव में लोग कुछ जल्दी ही सो जाते हैं । यशपाल , नरेंद्र के साथ जब विनय के घर पहुंचे उस समय रात बहुत हो गया था । उस समय घड़ी में रात के लगभग 1 बज रहे थे । वो दोनों विनय के घर से दूर एक झाड़ी में बैठ गए ।
    चारों तरफ गहरा अंधेरा ,चांद भी बादल की वजह से गायब हो गया है । नरेंद्र सोच रहा था कि इस समय अगर बारिश होने लगी तो हालत भीगी बिल्ली के जैसा हो जाएगा । झाड़ी के पीछे चार आंखे किसी भी विप्पति की आशंका के लिए सतर्क है । देखते ही देखते रात के तीन बजे गए । अब धीरे - धीरे ठंडी हवा चलने लगी शायद दूर कहीं बारिश हो रही है । अचानक पास ही कहीं एक सियार चिल्ला उठा । गांव में सियार की आवाज सुनाई देना कोई आश्चर्य की बात नही लेकिन यह आवाज थोड़ा अलग व डरावनी था । अचानक इस आवाज से नरेंद्र चौंक उठा था ।
    यशपाल अब और धैर्य नही रख पाए । झाड़ी से निकल नरेंद्र से बोले - " रात बहुत हो गया है और आज कोई दुर्घटना होने की संभावना नही दिख रही । आज रात लौट चलना ही ठीक रहेगा । "
    नरेंद्र भी झाड़ी से निकल आया । अंधेरे में ही बातचीत होती रही अगर टोर्च जलाया गया तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा ।
    नरेंद्र बोला - " सर अगर लौटना ही है तो क्यों ना एक बार विनय के घर के अंदर भी देख लिया जाए । "
    यशपाल ने सोचकर उत्तर दिया - " घर के अंदर जाना
    ठीक रहेगा क्योंकि हमारे पास कोई सबूत भी नहीं है
    और मैंने अपना सर्विस रिवाल्वर भी नहीं लाया ।
    लेकिन उसके पास कोई हथियार होगा इसमें कोई शक
    नहीं । "
    " लेकिन सर इतनी दूर आकर बिना इन्वेस्टिगेशन के घर लौट जाना भी तो सही नहीं होगा । इसके अलावा प्रतिदिन ऐसे बैठे रहना भी सम्भव नहीं । "
    कुछ देर सब कुछ चुपचाप रहा फिर नरेंद्र बोला - " उसके पास कोई धारदार हथियार होगा लेकिन सर हमारा यह बड़ा टॉर्च भी किसी हथियार से कम नहीं । "
    यह बात यशपाल को बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि आज से लगभग 10 साल पहले पुलिस ज्वाइन करके अपने पहले ही महीने उन्होंने एक डाकू को गिरफ्तार किया था । उसका नाम था कालू डकैत , कुछ सालों से हजारीबाग के इलाकों में बहुत डकैती व लूटपाट करता था । हजारीबाग में पोस्टिंग मिलते ही वो कालू डकैत के पीछे लग गए । कहानी के क्लाइमेक्स में उस रात को इसी टॉर्च की वजह से यशपाल की जान बच गई और कालू डकैत घायल भी हो गया ।
    यह घटना याद आती है यशपाल बोले - " हां तुमने सही कहा तो फिर चलो अंदर चला जाए । "
    इतना बोलते ही नरेंद्र धीरे-धीरे विनय के घर की ओर बढ़ा । अंधेरी में कुछ भी नहीं दिख रहा । दरवाजे के पास पहुंचते ही यशपाल ने नरेंद्र को सतर्क किया । इसके बाद नरेंद्र आगे बढ़कर दरवाजे को धक्का दिया । अगर विनय घर के अंदर होगा तो दरवाजा अंदर से बंद होता । नरेंद्र ने सोचा था कि इसके बाद दीवार फांदकर घर के अंदर जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं करना पड़ा । दोनों को चौकातें हुए दरवाजा खुल गया । नरेंद्र अंदर प्रवेश किया । उसने जितना सोचा था इतना अंधेरा घर में नहीं है ।
    सामने के दरवाजे से कुछ ही दूर एक लालटेन जल रहा था । आँगन में 2 कमरे हैं , यह घर कच्चा होने पर भी गांव के कई घरों से बड़ा हैं ।
    आंगन में पहुंचते फिर से वह दोनों चौक गए । क्योंकि सोने वाले कमरे का दरवाजा खुला हुआ है लेकिन विनय वहां पर नहीं है ।
    नरेंद्र बोला - " सर यहां पर तो विनय नहीं है । क्या वह बाहर निकल गया ? लेकिन हम तो सामने दरवाजे पर ही पहरा दे रहे थे । "
    यशपाल घर के अंदर से बाहर की ओर दौड़ पड़े और बोलते रहे - " इसके बारे में बाद में सोचा जाएगा पहले
    चलो उसको जल्दी खोजा जाए । ना जाने आज किस घटना को अंजाम देने वाला है । इतनी रात को घर से निकलने का कोई ना कोई कारण अवश्य है । नरेंद्र उसे
    चारों तरफ खोजो । "
    नरेंद्र भी यशपाल को निर्देश करके एक अँधेरे दिशा की ओर दौड़ पड़ा । घर के दक्षिण तरफ कुछ ज्यादा ही अंधेरा है शायद यहां पर एक बड़ा सा जामुन का पेड़ है इसीलिए । यशपाल और नरेंद्र उधर ही जा रहे थे ।
    दौड़ते हुए अचानक नरेंद्र के पैरों तले कुछ मांसल जैसा महसूस हुआ । सांप समझकर चौक उठा लेकिन जैसे ही टोर्च को जलाया नीचे पड़े वस्तु को देखकर यशपाल जैसे शक्तिशाली आदमी भी डर से कांप उठे । उन्होंने देखा नरेंद्र के पैरों तले दबने वाला वस्तु एक कटा हुआ हाथ है । टॉर्च की रोशनी में इधर उधर देखते ही विनय का छिन्न-भिन्न शरीर दिखाई दिया । धीरे-धीरे नरेंद्र उस ओर आगे बढ़ा । मृत शरीर के पास पहुंचते ही यशपाल चौंक उठे । उसका शरीर एक मांसल विभत्स गोले जैसा हो गया था । पहले के मौतों के साथ इसका भी एक ही चिन्ह है । फिर से वही आंखों को निकालकर हत्या किया गया है । लेकिन यह हत्या और भी आमनवीय है मानो जैसे कई जंगली जानवरों ने उसके शरीर को फाड़कर टुकड़े टुकड़े में बदल दिया है । इसके अलावा उसके पीले शर्ट व पैंट को भी नहीं छोड़ा ।
    यशपाल ने अपने मन में ही प्रश्न किया - " इसका मतलब हम गलत थे । क्या हत्याओं को विनय ने नहीं किया था ? क्या इसके पीछे भी कोई मास्टरमाइंड है ? ऐसी हत्या क्या कोई मनुष्य कर सकता है या कुछ दूसरा ? "
    उस रात की सभी परिकल्पना यहीं समाप्त हो गई । यशपाल समझ गए यह रहस्य और भी जटिल होता जा रहा है । अगले दिन सुबह विनय के शरीर को पोस्टमार्टम में भेजने के बाद पूरे गांव में सतर्कता जारी किया गया । और इसके साथ ही आज दोपहर 12 बजे सभी गांव वालों को पुराने कृष्ण मंदिर के सामने आने के लिए कहा गया ।

  5. #5
    नवागत
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    विनय के मौत का खबर हवा से भी तेज फैल रहा था । इसीलिए दोपहर का यह मीटिंग सभी के लिए संदेह भरा है । उस समय दोपहर के 12:25 हो रहे थे ।
    पुराने कृष्ण मंदिर के पास भीड़ इकट्ठा हो गई है । यशपाल ने सभी को शांत कराया और बोले -
    " गांव में पिछले कुछ दिनों से जो भी हो रहा है यह स्वाभाविक नहीं है । ऐसे विभत्स हत्याएं मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा । मैंने आपके कहे अनुसार विनय के ऊपर शक किया था लेकिन कल रात हमारी सभी धारणाएं खत्म हो गई । मुझे ऐसा लग रहा है इन हत्याओं के पीछे कोई मास्टरमाइंड है । और वह तुम में से ही कोई एक है । "
    यह सुनते ही सभी एक दूसरे को देखने लगे । कोई कुछ भी नहीं बोल रहा ।
    अब नरेंद्र बोला - " कोई भी अगर इस बारे में जानता है तो हमें बता सकता है हम उसका कानून से रक्षा करेंगे । और अगर नहीं बताओगे तो तुम में से कोई एक गांव वाला मारा जाएगा क्योंकि हमें भी अपने ऊपर जवाब देना पड़ता है । "
    इस बार भी किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया ।
    यशपाल को लगा कि सब साले इसी में मिले हुए हैं । लेकिन तुरंत ही उन्होंने अपने क्रोध को शांत कर लिया ।
    यशपाल ने कठोर आवाज में पूछा - " यहां पर सभी गांव वाले उपस्थित हैं या नहीं ? "
    कुछ देर बाद भीड़ में से एक आदमी बोला - " नहीं साहब सर्वेश अभी नहीं आया । "
    " यह सर्वेश कौन है ? "
    इसी वक्त कृष्ण मंदिर से दूर खेत से कोई आता हुआ दिखाई दिया । यशपाल समझ गए कि यही सर्वेश है ।
    वह लगभग 30 साल का एक आदमी है । गालों पर बड़ी-बड़ी दाढ़ी व बाल इधर-उधर बिखरे हुए । वह आकर सीधा यशपाल के सामने आकर खड़ा हुआ ।
    उसके आते ही एक सड़ा गंध चारों तरफ फैल गई । लेकिन यह गंध कहां से आ रहा है कोई नहीं समझ पाया ।
    यशपाल बोले - " तुम्हें ऐसा क्या काम था जो इतनी देर से यहां पर आए ? "
    सर्वेश ने उत्तर दिया - " साहब , काम तो कुछ ऐसा नहीं था लेकिन सुबह उठने में देर हो गई । "
    ये बोलकर वह थोड़ा सा हँसा । ठीक उसी समय यशपाल ने एक ऐसी वस्तु सर्वेश के दांतो में देखा जिससे उनके होश उड़ गए । इसके बाद यशपाल कुछ नहीं बोले ।
    नरेंद्र को इशारे से काम समझा कर अपने जीप की तरफ चले गए । नरेंद्र ने गांव वालों को लौटने का आदेश देकर वो भी यशपाल के पीछे चल पड़ा ।
    यशपाल को उस दिन शाम बहुत तेज बुखार चढ़ा । नरेंद्र समझ गया कि किसी वस्तु से वो बहुत ज्यादा डर गए हैं । लेकिन वह क्या है इसे यशपाल नहीं बता रहे । बहुत अनुरोध करने पर भी कोई लाभ नहीं हुआ ।
    शाम होने से पहले नरेंद्र हाथ में कॉफी लेकर एक बार फिर यशपाल के रूम में पहुंचा ।
    कप को उनके हाथ में देकर बोला - " सर आपने आज दोपहर में क्या देखा मुझे बताइए शायद मैं आपकी मदद कर सकता हूं । "
    कोई उत्तर नहीं आया ।
    " सर ऐसे केस सॉल्व नहीं होगा आप । आपने जो देखा था व इस समय क्या सोच रहे हैं मुझे बताइए । "
    नरेंद्र और भी कुछ बोलने जा रहा था लेकिन यशपाल बोले - " नरेंद्र उस दिन विनय के मरने से पहले उसने क्या पहना था तुम्हें याद है ? "
    थोड़ा सा सोचकर नरेंद्र उत्तर दिया - " सर मृत शरीर में जो देखा था उसके अनुसार उसने पीला शर्ट और एक भूरे रंग का पैंट पहना था । "
    " उसी पीले शर्ट का एक छोटा टुकड़ा सर्वेश के दातों में फंसा हुआ था । "
    नरेंद्र आश्चर्यचकित होते हुए बोला - " नहीं सर ऐसा नहीं हो सकता । "
    " हां मैंने खुद को बहुत बार गलत ठहराने कोशिश की है लेकिन नहीं मैंने कुछ भी गलत नहीं देखा । "
    " इसका मतलब विनय को एक आदमी ने अपना शिकार बनाया है । "
    " इसके अलावा ऐसा कुछ अलौकिक भी हो सकता है जो इस विज्ञान के युग में भी हमें सोचने पर मजबूर कर दे । "
    इसी बीच किसी ने रूम का दरवाजा खटखटाया । बाहर शाम हो गई है दोनों में से किसी को भी नहीं पता । नरेंद्र दरवाजा खोलने के लिए आगे बढ़ा । वो सोच रहा था कि खाना बनाने वाली मौसी आई होंगी । लेकिन दरवाजा खोलते ही उसने देखा एक बूढ़ा आदमी बाहर खड़ा है ।
    " कौन हो तुम ? "
    " मुझे बड़े साहब से जरूरी बात करना है । "
    यशपाल के अंदर से देखते ही वो उस बूढ़े आदमी को पहचान गए । ये वही बूढ़ा आदमी है जिसके साथ वो विनय घर गए थे ।
    बूढ़ा आदमी अंदर आकर फर्श पर बैठ गए और बोले - " साहब इन बातों को मुझे पहले ही आपको बता देना चाहिए था । अगर यह बातें जानते तो आप शायद इन मौतों को रोक सकते थे । "
    नरेंद्र बोला - " अरे पहले आप कुर्सी पर उठकर बैठिए फिर बताइए । "
    " नही साहब मैं यहीं पर ठीक हूं । अब मैं अपने बात को बताता हूं । यह घटना आज से 4 साल पहले की है ।
    गांव में भैरव नाम का एक लड़का रहता था । उसके पिताजी सांप काटने की वजह से मार गए फिर उसकी मां भी स्वर्ग सिधार गई । भैरव को अपने आसपास देखकर गांव की लड़कियां असुरक्षित महसूस करती थी । उसके पौरूष कामना को देखकर उसे स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता था । शिवपुर के कुछ समृद्ध परिवारों में से एक परिवार में रीमा नाम की एक लड़की रहती थी ।
    उस समय उस लड़की की उम्र यहीं लगभग 18 साल होगा । भैरव इसी लड़की को पसंद करता था । लेकिन वह लड़की और उसके घरवाले भी भैरव को शैतान समझते थे । एक दिन बरसात के समय खेत के पास रीमा को अकेले देखकर उससे बत्तमीजी किया व शायद शरीर के गलत स्थानों पर जबरदस्ती हाथ लगाया । लेकिन उस समय जगदीश मास्टर उधर से ही कहीं जा रहे थे । वह रीमा को बचाकर गांव में ले आए और भैरव के गलत काम को सभी गांव वालों से बता दिया । प्रधान के साथ मिल सभी ने भैरव को पकड़ा । इसके बाद उसे लाठी से पीटकर अधमरा कर दिया गया । बात यहीं समाप्त हो जाता लेकिन रीमा के आंसुओं को देखकर जगदीश मास्टर और कुछ लोग अपने गुस्से को संभाल नहीं पाए ।
    पुराने कृष्ण मंदिर के पास जो एक बरगद का पेड़ है उसी में उसे बांधकर पीटते हुए नरहत्या की गई ।
    लेकिन उसके शरीर का क्रिया - कर्म नहीं किया गया । उसके शरीर को अजय नदी में फेंक दिया गया था । साहब मुझे याद है कि मरने से पहले भैरव ने कहा था कि वह लौटकर जरूर आएगा । "
    यह सुन यशपाल हंस पड़े ।
    " इसका मतलब आप कहना चाहते हैं कि भैरव के भूत ने ही यह सब किया है । "
    " सही नहीं हो सकता लेकिन भैरव मर गया है इसका प्रमाण भी तो हमारे पास नहीं है क्योंकि उसके शरीर को फेंक दिया गया था । "
    इस बात पर यशपाल ने ध्यान नहीं दिया था ।
    " इसका मतलब भैरव जिंदा है और ये सब कुछ वही कर रहा है । "
    बूढ़ा आदमी बोला - " नहीं जानता साहब आप लोग तो विज्ञान मानते हैं । इन भूत वाली बातों को आप विश्वास नहीं करेंगे लेकिन लोगों को ऐसे मरते हुए देख मुझे ऐसा लग रहा है कि भैरव लौट आया है । क्योंकि भैरव के गलत काम को सभी के सामने जगदीश मास्टर ने ही बताया था । "
    बूढ़ा आदमी चुप हो गया । नरेंद्र ने इन बातों को मानने से पूरी तरह मना कर दिया ।
    उस बूढ़े आदमी के लौटने से पहले यशपाल ने सर्वेश के घर का पता व जगह ठीक से पूछ लिया क्योंकि आज रात का ऑपरेशन है फॉलो द सस्पेक्ट सर्वेश ।

  6. #6
    नवागत
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    उस समय रात के 2 बज रहे थे । नरेंद्र को बैठे - बैठे नींद लग रही है लेकिन मच्छरों की वजह से चुपचाप बैठा नहीं जा रहा । सर्वेश के घर के सामने कोई झाड़ी नहीं है इसीलिए रास्ते पर ही बैठना पड़ा । क्योंकि उन्हें कल जैसा भूल आज नहीं करना है । आज दोनों ही अपने साथ सर्विस रिवाल्वर को भी लेकर आए हैं । यशपाल के प्लान के अनुसार घर के सामने वाले दरवाजे पर बाहर से कुंडी लगा दिया गया है । जिससे सर्वेश बाहर न निकल सके ।दरवाजे पर कुछआवाज होते ही वो तुरंत उसे गिरफ्तार करेंगे । 1 घंटे बीतने के बाद भी जब कोई खतरा नहीं दिखा तब यशपाल धीरे- धीरे सर्वेश के घर की ओर बढ़े । नरेंद्र भी अपने रिवाल्वर को लोड करके उनके पीछे चल पड़ा । बाहर से कुंडी खोलते ही वो चौंक गए क्योंकि अंदर से दरवाजा खुला हुआ था ।इसका मतलब सर्वेश ने बाहर निकलने की कोशिश की थी परंतु बाहर से दरवाजा बंद रहने के कारण वह नहीं निकल पाया । यशपाल दरवाजे को खोलकर घर के अंदर पहुंचे । उस बूढ़े आदमी ने बताया था कि सर्वेश की बूढ़ी मां अभी भी जिंदा है । अगर उनके साथ वही हुआ तो नहीं नहीं ।
    कुछ अंदर जाकर एक कमरे में टॉर्च जलाते ही उन्होंने जो दृश्य देखा उसका वर्णन करना भी बहुत ही कठिन है । बूढ़ी महिला के सीने पर जो बैठा हुआ है वह मानव है या कोई जानवर व कुछ दूसरा नहीं बताया जा सकता । लंबा सा हाथ बूढ़ी महिला की मांस को फाड़कर खा रहा था ।
    पूरे कमरे में चारों तरफ लाल खून फैला हुआ था । आसपास का वातावरण एक दुर्गंध से भर गया था । यह दुर्गंध यशपाल पहचानतें हैं ।
    " सर्वेश "
    आवाज नरेंद्र के मुँह से निकलते ही उस भयानक जानवर ने उनकी तरफ चेहरा घुमाया । भयानक और वीभत्स चेहरा , नाक और आँख कुछ भी नहीं है ।
    उसकी जगह कुछ है तो केवल बड़े बड़े दाँत । यह भयानक दृश्य देखने के बाद उन दोनों में से किसी को भी गोली चलाने की हिम्मत नहीं हुई ।
    उस जानवर के दरवाजे की ओर बढ़ते ही यशपाल नरेंद्र के हाथ को पकड़कर बाहर की ओर भागे ।
    जल्दी से सामने के दरवाजे को पार कर वो दोनों बाहर कच्चे रास्ते पर दौड़ते रहे । पीछे से उस समय भी उस भयानक जीव की आवाज सुनाई दे रही थी । लगभग 20 मिनट तक दौड़ने के बाद दोनों गांव के उत्तर की ओर एक खुली जगह पर पहुंचे । दोनों की हाँफते - हाँफते हालत खराब है ।
    सांस की गति कम होने के बाद नरेंद्र बोला - " सर यह किसी मनुष्य का काम नहीं है । यह केस हमारे द्वारा सॉल्व नहीं होगा । बड़े ऑफिसर को बताने से हमें पागल समझा जाएगा और हमारी नौकरी भी जा सकती है ।
    इससे अच्छा जो इन सब बातों को जानते हैं उन्हें ही
    बुलाना ठीक रहेगा । "
    अब यशपाल बोले - " किसकी बात बोल रहे हो तुम । "
    " तांत्रिक "
    " लेकिन इस समय मैं तांत्रिक कहां से बुलाऊंगा । "
    " नहीं सर आप को खोजने की कोई जरूरत नहीं ।
    जब मैं छोटा था हमारे घर में एक तांत्रिक आए थे । घटना क्या था यह मुझे याद नहीं लेकिन शायद घर पर कोई कालदोष लगा था । पिताजी से सुना था कि उस तांत्रिक ने सब कुछ ठीक कर दिया था । उनका पता मेरे पिताजी के पास होगा । उनको एक बार बुला लिया जाए तो कैसा रहेगा । "
    यशपाल ने कुछ देर इस बारे में सोचा और फिर बोले - " कौन हैं ये तांत्रिक ? "
    " सर् , उनका नाम है तांत्रिक मसाननाथ "……

    _____________________________________

    पिछले 2 दिनों से लगातार बारिश हो रही है । बारिश एक बार भी थमने का नाम नहीं ले रहा कभी छिट - पुट तो कभी मूसलाधार । अगर ऐसे ही चलता रहा तो जयरामपुर गांव में बाढ़ जल्द ही आएगी । लेकिन देवाशीष जी को इस बारे में सोचने का समय नहीं है क्योंकि इससे उन्हें किसी तरह की असुविधा नहीं हो रहा । लेकिन असली समस्या कहीं और है । उस मुख्य घटना पर जाने से पहले कुछ बातों को जानना होगा ।
    लोग बताते हैं कि 18 वीं शताब्दी के अंत में जमींदार जयराम सारंगी को उत्तराधिकार के रूप में किशनगंज के पास बहुत सारा जमीन प्राप्त हुआ था । बाद में उन्होंने वहां पर कुछ गरीब लोगों को रहने के लिए आदेश दे दिया । देखते-देखते कुछ ही वर्षों में वहाँ लोगों की संख्या दोगुनी हो गई । खाने की जरूरत के लिए वहां के लोगों ने खेती करना शुरू कर दिया । जयराम सारंगी के मरने के बाद उनके स्मृति के रूप में इस जगह का नाम जयरामपुर रखा गया । वही जयरामपुर आज एक गांव है जिसका मेरुदंड कृषि है ।
    आज से लगभग 60 वर्ष पहले देवाशीष के पिता अपने परिवार के कुछ सदस्यों को लेकर बांग्लादेश ( उस समय पाकिस्तान ) से इस देश में चले आए थे । अपने पिताजी से देवाशीष ने सुना था कि उस रात भयानक बांग्लादेश के साम्प्रदायिक दंगे में देवाशीष के दो दीदी मारे गए थे । बहुत कोशिश करने के बाद भी अपने दोनों लड़कियों को उन्होंने नहीं बचा पाया था । देवाशीष उस समय बहुत ही छोटे थे । उसकी मां कलावती ने अपना परिचय नूरा बेगम बताकर देवाशीष के जान को बचाया था ।
    इसके बाद भाईजान नजमुल ने अपने जान की परवाह किए बिना उस रात देवशीष के परिवार को इस देश में आने के लिए सहायता किया था । हालांकि बाद में नजमुल मारा गया ।
    इस देश में आने के बाद एक ही रात में वे सभी मध्यमवर्गीय परिवार से भिखारी में परिवर्तित हो गए थे । कुछ महीनों बाद जयराम सारंगी की कृपा से यहां पर देवाशीष के परिवार ने जीवन यापन शुरू किया । जयरामपुर के उत्तरी तरफ एक छोटी सी जगह उन्हें रहने के लिए दिया गया । दिन - रात मेहनत करके देवाशीष व उनके पिता आमदनी बढ़ाते रहे । छोटी झोपड़ी धीरे-धीरे पक्के घर में परिवर्तित हुआ । इस समय जयरामपुर गांव में दो तल्ले का घर केवल देवाशीष के पास ही है ।
    बाकी गांव वाले अभी भी अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं । अब असली घटना बताता हूं ।
    दो-तीन सप्ताह पहले की बात है । एक दिन दोपहर को देवाशीष के घर में एक अद्भुत घटना घटी । देवाशीष की मां कलावती देवी दोपहर को खाने के बाद लेटी हुई थी । अचानक उन्हें ऐसा लगा छत से एक छोटा बच्चा माँ - माँ कहकर बुला रहा है । एक बार उन्होंने सोचा उनका पोता नरेंद्र है लेकिन फिर उन्हें ख्याल आया कि नरेंद्र तो घर पर नहीं है । कुछ दिन पहले ही वह अपनी मां के साथ मामा के घर गया है । जल्दी से उस कमरे के बाहर आते ही उन्होंने देखा देवाशीष के पिता वहां पर खड़े होकर एकटक छत वाले सीढ़ी को देख रहे हैं ।
    कलावती देवी को अब कुछ संदेह हुआ । अपने पति से क्या हुआ पूछते ही जो बातें देवशीष के पिता ने बताया उसे सुनकर वो भी सोचने के लिए मजबूर हो गई ।
    उन्होंने बताया - " मैं यहां बाहर कुर्सी पर बैठा था । अचानक मुझे ऐसा लगा 3 - 4 छोटे बच्चे छत वाले सीढ़ी से ऊपर चले गए । बच्चे दिखने में बहुत ही सुन्दर थे , उनके उम्र यही 4 - 5 साल होगा ।
    आश्चर्यजनक इस घटना को देखकर जल्दी से कुर्सी छोड़ यहाँ पर आते ही देखा कि छत वाले सीढ़ी का दरवाजा बंद है लेकिन वो बच्चे आखिर गए कहां ।
    और तुम्हें बुलाने जा रहा था लेकिन तुम खुद ही बाहर निकल आई । "
    सुनने के बाद कलावती देवी ने भी अपने द्वारा सुने उस आवाज के बारे में बताया ।
    उस दिन के लिए यहीं पर सबकुछ समाप्त हो गया । लेकिन एक सप्ताह बाद और एक घटना ने उन्हें परेशान किया । नरेंद्र उस समय अपने मामा के घर से लौट आया था । सुबह के समय घर में काम करने वाली लड़की रूपा छत पर किसी काम से गई तो उसने वहाँ पर जगह-जगह खून के छींटे देखे । यह देखकर वो जल्दबाजी में सीढ़ी से नीचे उतरने लगी और अचानक पैर फिसलने से नीचे गिर गई ।
    इसके बाद रूपा को होश नहीं आया । डॉक्टर का कहना है कि यह एक सडेन स्ट्रोक है लेकिन देवाशीष के पिता इसे नहीं मानते ।
    कई बातों की तरह यह घटना भी सभी के दिमाग़ से कुछ ही दिनों में निकल गया । लेकिन परसों रात को कुछ हुआ उससे पूरा परिवार सकते में आ गया । इस घर में कुछ तो हुआ है क्योंकि सब कुछ पहले जैसा नहीं है । उस दिन रात को नरेंद्र अपने दादी के पास सो रहा था ।
    रात की उस समय 2 बज रहे होंगे अचानक नरेंद्र को ऐसा लगा कि उसकी मां छत से उसे बुला रही हैं । वह बिस्तर छोड़कर उठते ही उसकी दादी यानि कलावती देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया । उन्होंने कहा कि इस आवाज को उन्होंने पहले भी सुना है । इधर नरेंद्र के मां को भी सुनाई दिया कि उन्हें कोई छत से माँ -माँ कहकर बुला रहा है । नरेंद्र के पिता यानी देवाशीष उस समय गहरी नींद में थे । उन्हें जगाकर इस बारे में बताते ही वो कमरे से बाहर निकले । और तभी उन्हें ऐसा लगा कि कुछ बच्चे सीढ़ी से ऊपर चले गए ।
    जल्दी से सीढ़ी की ओर जाते ही वो चौंक गए क्योंकि सीढ़ी वाला दरवाजा तो बाहर से बंद है । यह घटना क्यों हो रहा है किसी को भी समझ में नहीं आया । अगले दिन सुबह चाय के टेबल पर इस बारे में बातचीत हुई ।
    देवाशीष के बूढ़े पिता का कहना है - " इस घर में कोई भयानक दोष लगा है । उन बच्चों को केवल देव ने ही नहीं मैंने भी देखा था । बहु व बच्चे उस समय अपने घर गए थे । वो सभी डर जाएंगे इसीलिए मैंने कुछ नहीं बताया । अब उपद्रव बढ़ रहा है । मसाननाथ को एक बार बुलाना होगा । "
    उस दिन शाम को देवाशीष के पिताजी ने एक चिट्ठी लिखकर हरिहर से पोस्ट करवाया । इस चिट्ठी के ग्राहक हैं स्वयं तांत्रिक मसाननाथ ।
    तांत्रिक के साथ देवाशीष के पिताजी का क्या संपर्क है यह बताना बहुत ही कठिन है । बातों से एक दूसरे के दोस्त मालूम होतें हैं परंतु दोनों में उम्र का फर्क लगभग 40 साल है । नरेंद्र के दादाजी का उम्र 70 पार है लेकिन उनके दोस्त मसाननाथ अभी प्रौढ़ दिखते हैं । सफेद चेहरा , उज्वल शरीर , सिर के बाल कंधे तक लम्बे एवं बड़ी - बड़ी दाढ़ी में भी वो वृद्ध नहीं दिखते ।
    चिट्ठी भेजने के 3 दिन बाद मसाननाथ गांव में पहुंच गए । इधर घर का छोटा लड़का नरेंद्र बचपन से ही तंत्र - मंत्र की कहानियों में रूचि रखता है ।
    बाद में वह समझ गया था कि सभी तांत्रिक घूमन्तु नहीं होते । कुछ ऐसे भी तांत्रिक हैं जो साधारण मानव की तरह एक निश्चित स्थान पर रहते हैं । जिनके घर पर चिट्ठी भेजने पर उत्तर भी आता है ।
    नरेंद्र ने देखा कि घर में प्रवेश करते ही मसाननाथ ने उसके पिता से 1 किलो पीली सरसों लाने के लिए कहा । इसके बाद मंत्र रूपी सरसों से घर के चारों तरफ एक लकीर बनाकर गृह बंधन किया गया । इसके बाद किस तरह नरेंद्र के घर का दोष दूर हुआ इससे वह अनजान है क्योंकि अगले दिन ही नरेंद्र के दादाजी ने उन्हें अपने नाना के घर भेज दिया । वंश की एकमात्र लड़के को कोई हानि हो यह उन्होंने नहीं चाहा । मसाननाथ भी यही चाहते थे । इस बात से नरेंद्र बहुत ही गुस्सा था लेकिन अपने दादा जी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई ।
    मसाननाथ ने नरेंद्र को अपने पास बुला कर कहा था ।
    - " यज्ञ शुरू होने के बाद दुष्ट शक्ति यही घूमेंगे और उनका आहार क्या है जानते हो तुम्हारे जैसे छोटे लड़के इसीलिए इस वक्त तुम्हारा यहां नहीं रहना ही सही है । लेकिन तुम चिंता मत करो मेरा मन कह रहा है भविष्य में हम फिर मिलेंगे । हम दोनों मिलकर किसी भयानक शक्ति का सामना करेंगे लेकिन तुम डरोगे तो नहीं । "

  7. #7
    नवागत
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    20 साल पहले की इस घटना को सोचते हुए नरेंद्र कहीं खो गया था । उसे होश आया मसाननाथ की आवाज को सुनकर ।
    " नरेंद्र क्या यही तुम्हारा ऑफिस है ? लेकिन इसे देख कर तो किसी थाने जैसा लगता है । "
    नरेंद्र बोला - " हां मैं एक पुलिस वाला हूं यह थाना ही मेरा ऑफिस है । आइए अंदर आइए यशपाल जी हमारे लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं । "
    थाने के हॉल रूम में पहुंचते ही यशपाल नजर आए । उन्हें देखकर ही ऐसा लग रहा था मानो बहुत ही परेशान हैं । अगर कोई मनुष्य अचानक अपने सामने अविश्वसनीय घटना देखता है तो उसका चेहरा ठीक है ऐसा ही होता है । दो कुर्सी लेकर नरेंद्र और मसाननाथ बैठ गए ।
    मसाननाथ को खोजने के लिए नरेंद्र को बहुत परिश्रम करना पड़ा । देवाशीष जी के पास से जो पता मिला था वहां से जानकारी लेने पर पता चला मसाननाथ 5 साल पहले ही गांव से चले गए थे ।
    अब कहां पर रहते हैं किसी को भी नहीं पता । अंत में मिसिंग डायरी करके मसाननाथ को खोजा गया । रांची के किसी गली में अब वो रहते हैं ।
    वहां से उनको ट्रेन द्वारा आसनसोल लाया गया । नरेंद्र स्वयं जाकर मसाननाथ को स्टेशन से शिवपुर तक लेकर आए ।
    अब तक यशपाल पूरी घटना मसाननाथ से बता रहे थे । सब कुछ सुनकर मसाननाथ बोले - " आप जैसा कह रहे हैं अगर यह सच हुआ तो सामने बहुत ही बड़ा खतरा है । कुछ भी इधर उधर हुआ तो कोई भी मारा जा सकता है । "
    नरेंद्र चौंककर बोला - " मारा जाएगा मतलब ? "
    " क्योंकि जिस शैतानी शक्ति के विरुद्ध हम लड़ाई में उतरेंगे । वह इस जगत का नहीं है । उसे शैतानी शक्तियों द्वारा इस जगत में लाया गया है । "

    यशपाल बोले - " इस जगत का प्राणी नहीं है मतलब ,
    मैं कुछ समझ नहीं पाया । "
    मसाननाथ जवाब देने जा रहे थे लेकिन उन्हें रोककर
    नरेंद्र बोला - " असल में तांत्रिक बाबा डाइमेंशन की बात कर रहे हैं । हमारे इस डाइमेंशन के अलावा भी और भी बहुत सारे डाइमेंशन होते हैं । जो एक दूसरे के ऊपर जाल की तरह फैले होते हैं । "
    मसाननाथ सहमति देते हुए बोले - " हाँ , जहां तक मैं जानता हूं कुल 27 जगत हैं । जिसमें 11 व 13 नंबर बहुत ही खतरनाक है । जहां समय का अस्तित्व नहीं है । मुझे ऐसा लगता है कि शैतानी शक्ति उसी जगत से आया है । पहले हमें यही जानना होगा । "
    यशपाल बोले - " लेकिन क्या मैं इसे कर पाऊंगा क्योंकि मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है । नरेंद्र तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है । "
    मसाननाथ बोले - " पहले मुझे सर्वेश के घर लेकर
    चलो । वहां जाकर ही मैं इस शैतानी शक्ति के प्रकृति
    को जान पाऊंगा । इससे पहले आप एक घड़ी की
    व्यवस्था कीजिए । "
    " घड़ी से क्या होगा ? "
    मसाननाथ बोले - " मैंने पहले ही बताया कि 11 व
    13 जगत में समय का अस्तित्व नहीं है । लेकिन यह
    बात पूरी तरह सही नहीं है ।
    11 वें जगत में समय रुका रहता है लेकिन 13 वें
    जगत में यह समय उल्टा चलता है । "
    अब कुछ बातें यशपाल को समझ में आने लगी ।
    " लेकिन सर्वेश के घर के साथ इसका क्या संबंध है ? "
    " ये तो वहां पर जाने से ही पता चलेगा । "
    " चलिए फिर अभी चलते हैं । "

    धूल उड़ाते हुए पुलिस का जीप थाने से निकल गया ।
    रास्ते में जाते हुए मसाननाथ ने इस रहस्य के बारे में
    और भी बातें बताई ।
    उनका मानना है कि भैरव ने किसी काले शक्ति के
    द्वारा उस शैतान को इस जगत में लाया है । जिसे
    अंग्रेजी में कहते हैं someone offer demons.
    उन्होंने यह भी बताया कि इन सभी शैतानी शक्ति का अपना कोई आकार नहीं होता । इसके लिए उन्हें एक माध्यम की जरूरत होती है । वर्तमान में वही माध्यम
    सर्वेश का शरीर है ।
    लेकिन सर्वेश को खोजने से पहले और एक बड़ा कार्य करना होगा । लेकिन वो क्या है इस बारे में मसाननाथ विशेष कुछ नहीं बता बता पाए । क्योंकि इसी बीच जीप सर्वेश के घर के सामने पहुंच गया था । पहले नरेंद्र फिर एक-एक करके यशपाल और मसाननाथ जीप से उतरे ।
    चारों तरफ देखने के बाद यशपाल सोचे क्या यह वही जगह है जहां 2 दिन पहले ही वो बैठे हुए थे ।
    सर्विस का असल रूप अगर उन्हें पहले ही पता होता
    तो वो इस केस में कभी नहीं जुड़ते । लेकिन अब एक
    बार जब सब कुछ शुरू हो ही गया है तो अब उन्हें
    इसका अंत देखना है । यशपाल धीरे-धीरे सर्वेश के
    घर में पहुंचे । मसाननाथ व नरेंद्र भी उनके पीछे चल
    पड़े । घर में कोई नहीं है और सर्वेश भी नहीं दिख रहा । सबसे आश्चर्य की बात है कि सर्वेश के माँ की शरीर
    अब वहां पर नहीं है ।
    बीते 2 दिनों में इस बारे में किसी ने शिकायत भी नहीं किया था । यशपाल ने सोचा था कि अभी भी उसके
    मां का सड़ा हुआ मृत शरीर यहाँ होगा लेकिन मृत
    शरीर तो दूर कमरे में एक बूंद खून भी नहीं मिला ।
    मसाननाथ ने पूछा - " क्या ये वही कमरा है जहां पर
    आपने उस शैतान को अंतिम बार देखा था ? "
    नरेंद्र ने हां में जवाब दिया ।
    " ठीक है , घड़ी को तो लेकर आए हैं ?
    यशपाल बोले - " घड़ी मेरे पास है । काम पर निकलने से पहले घड़ी पहनना मेरी आदत है । "
    " ठीक है अब काम शुरू करते हैं । "
    यही बोल मसाननाथ आंख बंद करके मंत्र पढ़ने लगे । इधर एक दुर्गंध धीरे धीरे बढ़ता ही जा रहा है
    । शाम होने में अभी बहुत देर है लेकिन सर्वेश के घर में मानो अंधेरा छा गया है ।
    लगभग 10 मिनट बाद मसाननाथ ने आँख खोला और फिर बोले - " यशपाल अब अपने घड़ी को देखो । "
    यशपाल ने बाएं हाथ की तरफ नजर डाला ।
    घड़ी को देख यशपाल और नरेंद्र दोनों ही चौंक गए
    क्योंकि घड़ी की सुइयां पीछे की ओर चल रही थी ।
    " नरेंद्र यह गाड़ी खराब हो गई है क्या ? "
    इसका उत्तर मसाननाथ ने दिया -
    " नहीं ,आपका घड़ी ठीक है । मैं समय के अंदर
    जाकर देख रहा था कि यह शैतानी शक्ति किस जगह
    से आया है । अब साफ हो गया है कि यह 13 वें जगत
    की शैतानी शक्ति है । अब आगे का काम इसी अनुसार किया जाएगा । अब यहां से भागना ही ठीक रहेगा
    बाकी बातें मैं थाने में जाकर बताऊंगा । "
    तीनों ही घर से बाहर निकल आए । इधर सूर्य पश्चिम
    की ओर ढल रहा है ।
    इधर - उधर देखते हुए थाना पहुंचने में रात हो गया ।
    आज पूरे दिन के भाग दौड़ से नरेंद्र बहुत थक गया था ।
    उसे देखकर ही मसाननाथ बोले - " आज आराम करो
    कल इस बारे में विस्तार से क्रिया शुरू करते हैं । "
    उस रात इस बारे में कोई भी बात नहीं हुआ ।

  8. #8
    नवागत
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    अगले दिन सुबह के 10 बजे इस बारे में बातचीत शुरू
    हुई । चाय के कप को हाथ में लेकर नरेंद्र थाने के हॉल
    रूम में पहुंचा । मसाननाथ व यशपाल वहां पर पहले
    ही पहुंच गए थे ।
    एक कुर्सी लेकर नरेंद्र के बैठते ही मसाननाथ बोले
    - " कल रात इस बारे में बहुत कुछ सोचा । सबसे पहले
    हमें उस जीव को ढूंढना होगा । जिसके माध्यम से वह शैतानी शक्ति इस जगत में आया है । "
    यशपाल बोले - " किस प्रकार का जीव बाबाजी ? "
    " ऐसा एक जीव जो इन दोनों जगत के दीवारों को
    पार कर सकता है । "
    " लेकिन जीव का नाम क्या है ? "
    " व्याध-पतंग , दूसरे जगत का व्याध-पतंग "
    यशपाल हंसते हुए बोले - " आपके कहने का मतलब है एक छोटे से व्याध-पतंग ने शैतानी शक्ति को इस जगत
    में लाया । "
    नरेंद्र बोला - " सर आपको पता होगा कि
    व्याध-पतंग को इंग्लिश में ड्रैगनफ्लाई कहते हैं ।
    क्योंकि व्याध-पतंग डायनासोर के समय से जिंदा है ।
    उस अपोकेलिप्स में सबसे शक्तिशाली जीव डायनासोर
    मारे गए लेकिन ड्रैगनफ्लाई जिंदा थे । "
    यशपाल और कुछ नहीं बोले ।
    नरेंद्र फिर बोला - " तांत्रिक बाबा यह व्याध -पतंग इस समय कहां पर है ? "
    " इसी गांव में कहीं पर छुपा हुआ है । "
    " लेकिन हम उसे कहां पर ढूंढे ? "
    " उसे खोजना नहीं होगा वो खुद ही हमारे पास चला आएगा । तुम केवल थोड़ा सा हल्दी व चावल मुझे
    लाकर दो । "
    यशपाल बोले - " नरेंद्र तुम जाकर खाना बनाने वाली
    मौसी से तांत्रिक बाबा को जो कुछ भी चाहिए लेकर
    चले आओ । "
    कुछ देर बाद दोनों सामानों को हाथ में पाकर मसाननाथ थाने से बाहर निकल आए । नरेंद्र और यशपाल भी उनके पीछे चल पड़े ।
    सामने की ईट वाले रास्ते से चलते हुए वे सभी एक
    जगह पर पहुंचे । क्योंकि मसाननाथ जिस कार्य को
    संपन्न करने जा रहे हैं उसके लिए मिट्टी की जरूरत है । फर्श पर इसे नहीं किया जा सकता ।
    मसाननाथ ने मिट्टी पर बैठकर हल्दी द्वारा एक वृत्त
    बनाया । और फिर उस वृत्त के अंदर एक क्रास का
    चिन्ह बनाकर उसे चार भागों में बाँट दिया ।
    नरेंद्र और यशपाल एकटक उनके उस क्रियाकलाप को देख रहे थे । अब हर एक भाग में थोड़ा सा चावल रखा
    गया । इसके बाद मसाननाथ ने आंख बंद करके मंत्र
    पढ़ना शुरू कर दिया ।
    कुछ ही देर में बाएं तरफ के चावल का रंग काला होने
    लगा ।
    मसाननाथ बोले - " मिल गया , वह गांव के पश्चिम
    तरफ छुपा हुआ है । "
    नरेंद्र बोला - " लेकिन उधर तो जंगल है ।
    और नदी के उस तरफ कोई घर भी नहीं है । "
    यशपाल बोले - " इससे हमें क्या , हम तो
    व्याध-पतंगा पकड़ने जा रहे हैं कोई बाघ शिकार पर
    नहीं । "
    मसाननाथ ने मन ही मन सोचा कि यह
    व्याध-पतंग किसी बाघ से कम नहीं । लेकिन वह दोनों
    डर जाएंगे इसीलिए कुछ नहीं बोला ।
    यशपाल बोले - " ठीक है तो अभी चलते हैं और वरना
    रात हो जाएगा । "
    " नहीं अभी जाकर कोई लाभ नहीं होगा । केवल
    सूर्यास्त के बाद ही इसे पकड़ा जा सकता है । दिन
    में दूसरे व्याध-पतंग के साथ इसको नहीं खोजा जा
    सकता । "
    " इसका मतलब हमें रात को जाना होगा । "
    " हाँ "
    इतना बोल कर मसाननाथ थाने की ओर चल पड़े
    तय हुआ कि शाम 4 बजे जंगल की तरफ सभी
    निकलेंगे । क्योंकि नदी के पास वाले जंगल में पहुंचने
    के लिए लगभग 3 घंटा लगेगा । शाम के अंधेरे में उस ड्रैगनफ्लाई को खोजना आसान होगा ।

    शाम के 3 बजते ही यशपाल वहाँ जाने के लिए
    तैयारी शुरू करने लगे । सर्विस रिवाल्वर ,टॉर्च इत्यादि सामानों को भी साथ ले लिया ।
    समय रात के 8 बज रहे थे । जीप से उतर वे सभी
    चल पड़े ।
    मसाननाथ बोले - " यशपाल तो मेरे साथ टॉर्च लेकर
    आओ और नरेंद्र तुम पीछे ध्यान रखना । "
    अजय नदी के इस ओर चारों तरफ जंगली झाड़ियों
    से भरा हुआ है । इसीलिए वे सभी सावधानी से चल
    रहे थे ।
    " तांत्रिक बाबा हम कहां पर जा रहे हैं? और वह व्याध-पतंग कहां पर है ?" यशपाल बोले ।
    मसाननाथ बोले - " आप नकारात्मक शक्ति को अनुभव करना चाहते हैं । "
    " हां लेकिन कोई परेशानी तो नहीं होगी । "
    " अभी ऐसा कुछ भी नहीं होगा "
    बोलकर मसाननाथ ने यशपाल के माथे पर हाथ रखा । तुरंत ही उन्हें ऐसा लगा कि जंगल के अंदर से एक
    ठंडी हवा बाहर निकल रही है ।
    " यही है नकारात्मक शक्ति , शैतान के जितना पास हम जाएंगे उतना ही ठंडी बढ़ती जाएगी । "

    वो सभी फिर से चलने लगे । मसाननाथ जितना आगे बढ़ते रहे यशपाल को उतना ही ठंडी लगती रही ।
    लगभग आधे घंटे चलने के बाद नरेंद्र को ऐसा लगा
    मानो सामने और पीछे के जंगल एक जैसे हैं । तो
    क्या वह सभी रास्ता भटक गए ।
    इधर किसी अनजाने खतरे की अनुभूति से
    मसाननाथ भी रुक गए ।
    " सभी रुक जाओ यहां कुछ तो गड़बड़ है । "
    बात के समाप्त होने से पहले ही पास के झाड़ी से
    कोई एक जीव यशपाल की ओर झपट पड़ा ।
    उस चार पैर वाले जीव के चेहरे पर दांतो के अलावा
    आंख व नाक कुछ भी नहीं है । तुरंत ही नरेंद्र ने गोली
    चला दिया ।
    " सर आप ठीक तो हैं । "
    शरीर के ऊपर से उस भयानक जीव को हटाकर
    यशपाल खड़े हुए ।
    " well done नरेंद्र ,सही समय पर गोली चलाया
    वरना आज तो… "
    “ चलिए व्याध-पतंग मिल गया । "
    पीछे की झाड़ी से निकलते हुए मसाननाथ बोले -
    " ये यहां पर बैठकर पहरा दे रहा था । मुझसे थोड़ा
    भूल हो गया । पहले ही मुझे अंदाजा लगा लेना चाहिए
    था । "
    " अब इसका क्या करें । " यह कहते हुए यशपाल
    नीचे जमीन की ओर इशारा करके उस जीव को
    दिखाना चाहते थे ।
    लेकिन कोई जानवर कहां यह तो सर्वेश है । गोली
    लगने के कारण नीचे पड़ा हुआ है ।
    " नरेंद्र देखो बचा है या नहीं । "
    " सर हार्टबीट चल रहा है । गोली उसके कंधे के पास
    लगी है । "
    यशपाल पास ही कहे मसाननाथ से बोले - " हमने सर्वेश को गोली जान बूझकर नहीं मारा । "
    मसाननाथ बोले - " हां मैं जानता हूं । अब जब तक यह शैतानी शक्ति मेरी कब्जे में है तो इसकी वश में जो भी थे सभी सामान्य हो जाएंगे । "
    नरेंद्र बोला - " लेकिन सर सर्वेश को अगर पता चला
    है कि उसने अपने बूढ़ी मां को मारकर खा लिया तो यह उसके लिए बहुत ही डार्क होगा । "
    " यह बातें अभी उसे नहीं बताना है । चलिए हम सभी
    थाने में चलते हैं । इसके आगे क्या करना है वहीं पर
    सोचा जाएगा । "

    नरेंद्र और यशपाल ने सर्वेश को उठाकर जीप की
    ओर चल पड़े । यशपाल ने एक बार मसाननाथ के
    हाथ में रखे उस भयानक ड्रैगनफ्लाई को देखा ।
    ड्रैगनफ्लाई ना बोलकर इसे एक उड़ने वाली बड़ी सी
    मकड़ी कहा जा सकता है ।
    रात बढ़ता ही जा रहा था । सर्वेश को जीप में बैठाकर
    वे सभी थाने की ओर चल पड़े ।

  9. #9
    नवागत
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    रात 1 बजे थाने के सामने जीप आकर रुकी । सबसे पहले यशपाल फिर मसाननाथ उसके बाद नरेंद्र गाड़ी से उतरे । सर्वेश की स्थिति ठीक नहीं है गोली लगने वाली जगह से खून का बहाव बढ़ता ही जा रहा है ।
    यशपाल ने आदेश दिया - " नरेंद्र तुम सर्वेश को जिला अस्पताल में लेकर जाओ । अभी अगर रवाना होगे तो सुबह तक चले आओगे । क्योंकि अगर उसे हॉस्पिटल में न भर्ती किया गया तो स्थिति गंभीर हो सकती है । "
    नरेंद्र कुछ भी न बोलकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गया । कुछ देर में पुलिस जीप आँखों से ओझल हो गया ।
    मसाननाथ ने यशपाल के कंधे पर हाथ रखकर कहा -
    " चिंता मत कीजिए सब कुछ ठीक हो जाएगा । मैं यहां पर आ गया हूं अब इसका अंत अवश्य होगा । अंदर चलिए आपके साथ कुछ बात करनी है । "
    थाने के हॉल रूम में प्रवेश करते ही मसाननाथ ने अपने थैली से हल्दी पाउडर निकाला । उसके बाद टेबल के ऊपर बिखरे कागजों को एक तरफ करके वहां पर हल्दी द्वारा एक वृत्त बनाया । इसके बाद अपने हाथ में रखें व्याध-पतंग को उस वृत्त के केंद्र में रख अपने आंखों को बंद करके मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया ।
    जब तक मंत्र जाप चलता रहा तब तक यशपाल के मुँह से कोई भी बात नहीं सुनाई दिया ।
    मंत्र पाठ समाप्त होते ही यशपाल बोले - " बाबाजी नरेंद्र मुझसे जूनियर है । उसके सामने ऐसी बातें नहीं कर सकता इसीलिए आपको बता रहा हूं ।
    मुझे बहुत ही डर लग रहा है । क्या मैं यह सब कर पाऊंगा ? आप तंत्र मंत्र जानते हैं लेकिन मैं तो एक साधारण पुलिस ऑफिसर हूं । मेरा मानना है आप अकेले ही यह सब कीजिए । "
    " यशपाल जी आपके अंदर कितनी क्षमता है उसे आप खुद भी नहीं जानते । समय आपको सभी चीजें समझा देगी । और वैसे भी हम जिस प्रक्रिया में शामिल हुए हैं उसके हर एक कदम पर खतरा है ।
    मेरे द्वारा अकेले इसे संपूर्ण करना संभव नहीं है ।"
    " कैसी प्रक्रिया बाबाजी ?"
    " त्रिकाल यज्ञ "
    " यह क्या है ? "
    " शुरू से ही बताता हूं । किस गांव में पैर रखते ही मैं
    समझ गया था कि जिस नकारात्मक शक्ति का अनुभव
    मैंने किया था वो इस जगत का नहीं है । क्योंकि इतनी शक्तिशाली प्रभाव को मैंने पहले कभी नहीं महसूस
    किया है । इसके बाद आप सभी के पास से पूरी घटना
    को सुनने के बाद मैं निश्चिंत हो गया कि मैं सही था । "
    इसके बाद टेबल पर रखे व्याध-पतंग की ओर इशारा
    करते हुए मसाननाथ बोले -" यह कोई साधारण व्याध-पतंग नहीं है । इसके अंदर कितना नकारात्मक शक्ति है उसे आप सोच भी नहीं सकते । लेकिन इस समय वो मेरे मायाजाल में बंद है । जब तक वह इस हल्दी के वृत्त के अंदर रहेगा तब तक हमें कोई डर नहीं । हम आसानी से त्रिकाल यज्ञ संपन्न कर लेंगे । "
    " लेकिन इस यज्ञ का असली उद्देश्य क्या है? "
    " हमारा मूल लक्ष्य है इस शैतानी शक्ति को उसके जगत में वापस पहुंचा देना । लेकिन इसे करने के लिए हम सभी को 13 वें जगत में प्रवेश करना होगा । केवल हम ही नहीं त्रिकाल यज्ञ के माध्यम से पूरा शिवपुर गांव 13 वें जगत में प्रवेश करेगा । और इसी में हमारा कार्य सिद्ध हो जाएगा । क्योंकि विपरीत क्रिया में जब शिवपुर गांव को उस जगह से लौटना होगा तब यह नकारात्मक शक्ति फिर नहीं लौट पाएगा । उसी जगत में अटक जाएगा क्योंकि वह मेरे मंत्र के मायाजाल में बंद है । "
    " परंतु अगर यह वृत्त मिट गया तब तो बहुत ही खतरा हो सकता है । "
    " अंदर से लकीर मिटना संभव नहीं है केवल बाहर से कुछ किया जा सकता है । "
    " नरेंद्र को इस बारे में बताना होगा । वैसे भी वो इस टेबल पर हाथ नहीं लगाएगा । "
    " एक समस्या और है । त्रिकाल यज्ञ को करने के लिए एक ऐसी जगह पर बैठना पड़ता है जहां चारों तरफ पानी हो । और हम जिस जगत में जाएंगे वहां पर पानी नहीं है वहां केवल खून ही खून है । आप किसी ऐसे तालाब व पोखरा को जानते हो जहां पर कोई ऐसा स्थान हो । "
    यशपाल ने बिना सोचे ही उत्तर दिया - " इस गांव के पीछे अजय नदी में एक प्राचीन मंदिर है । बरसात से पहले उसके ऊपर का भाग दिखता है । "
    " ऐसा क्या , यह सब तो मैंने कहानियों में सुना है । "
    " मैंने भी इसे पहली बार देखकर चौंक गया था । यहाँ के लोग बताते हैं कि 500 साल पहले यह नदी के अंदर समा गया था । कल सुबह एक बार वहां जाकर देखना होगा कि मंदिर की चोटी दिखाई दे रहा है या नहीं । अगर दिखाई दिया तो किसी मांझी को बुलाकर वहां पहुंच जाएंगे । "
    " हां ठीक है । पहले नरेंद्र को वापस आने दो फिर आगे के बारे में सोचेंगे । "
    " हां चलिए अभी थोड़ी रात बाकी है नरेंद्र के लौटने तक हम थोड़ा सो लेंगे । "

    उस समय सुबह के 8 बज रहे थे । नरेंद्र के बुलाने से यशपाल जाग गए । हॉल रूम के एक कुर्सी पर ही वो सो गए थे ।
    नरेंद्र बोला - " सर सर्वेश को हॉस्पिटल में भर्ती कर
    दिया हूं । वह होश में आया हैं लेकिन पिछले दिनों की
    कोई भी बात उसे याद नहीं । इसीलिए मैंने भी गोली
    लगने के बारे में कुछ नहीं बताया । शायद डॉक्टरों ने
    कुछ अंदाजा लगाया था लेकिन मुझसे पूछने की हिम्मत उन्होंने नहीं किया । अब आप बताइए यहां क्या हुआ? "
    " सब कुछ बताऊंगा लेकिन पहले तुम जाकर आराम
    करो । तुमने पूरी रात जागा है । "
    " नहीं सर जी मैं ठीक हूं । वैसे तांत्रिक बाबा कहां पर हैं? "
    " वो अभी अंदर के कमरे में सो रहें है । तुम अंदर
    जाओ मैं फ्रेश होकर आता हूं । "

    मसाननाथ से नरेंद्र को सभी बातें पता चली । अचानक एक कौतूहल से उसका शरीर ऊर्जावान हो गया । अजय नदी के अंदर जो प्राचीन मंदिर है उसके रहस्य को जानने की इच्छा नरेंद्र के मन में बहुत पहले से ही है । लेकिन सबसे विशेष बात जो उसने बताई वो यह था कि सर्वेश को हॉस्पिटल भर्ती करने बाद ज़ब वो लौट रहा था । उस समय नदी के पास वाले रास्ते पर आते ही उसने देखा अजय नदी के बीचो-बीच एक समतल स्तूप निकला हुआ है । वही प्राचीन मंदिर है इसमें कोई शक नहीं । इसीलिए इस समय नदी के किनारे न जाकर शाम को किसी नाव वाले के साथ जाने के लिए सभी का विचार हुआ ।

  10. #10
    नवागत
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    दोपहर को यशपाल स्वयं ही गांव में जाकर लालू नाम मल्लाह को लेकर आए । नदी में करना क्या है यह सुनने के बाद लालू आश्चर्यचकित है । उस प्राचीन पवित्र मंदिर के ऊपर जाना है यह उसके सोच के बाहर था ।
    लालू ने यह भी बताया कि अजय नदी में कभी कभी मीठे पानी के मगरमच्छ भी देखे जाते हैं । अंत में कुछ पैसे देकर उसे राजी कराया गया । दोपहर तक सबकुछ सेट हो गया लेकिन लालू मल्लाह के अलावा गांव के किसी भी आदमी को इस बारे में भनक भी ना लगे इसका विशेष ध्यान रखा गया । सर्वेश के हालत को जिस तरह छुपा कर रखा गया है ठीक उसी तरह इस अभियान को भी छुपकर किया करना होगा ऐसा ही यशपाल का कहना है । इस पर मसाननाथ व नरेंद्र का भी एक ही मत है ।
    अगर कोई जान गया तो इस क्रिया में बाधा भी हो सकता है । शाम होने से पहले वे सभी नदी की ओर चल पड़े । लालू मांझी जब तक नाव को लेकर नदी में उतरा तबतक चारों तरफ काले बादल घिर चुके थे ।
    दूर कहीं बिजली भी गिर रही थी । ऐसे समय नदी में नाव को लेकर जाना आत्महत्या करने जैसा है । लेकिन लालू क्या कहे क्योंकि इस काम के लिए उसने तीन गुना ज्यादा पैसा लिया है । यह काम उसे करना ही होगा । पहले मांझी फिर नरेंद्र व यशपाल इसके बाद सबसे अंत में मसाननाथ नाव पर बैठे ।
    लालू मांझी नाव चलाने वाला था कि सभी ने देखा एक आदमी नदी के पास वाले पगडंडी से दौड़ते हुए इधर ही आ रहा है ।
    " सर कहीं गांव वाली जान तो नहीं गए । "
    यशपाल के जवाब देने से पहले ही वह बूढ़ा आदमी नाव के पास आकर खड़ा हो गया ।
    वह बूढ़ा आदमी बोला - " आप सभी रुक जाइए । उस मंदिर में कुछ भी मत कीजिएगा । कई सालों से वे सभी वहां पर सो रहे हैं । आप सभी के कामों से अगर वो जाग गए तो कोई नहीं बचेगा सभी मारे जाएंगे । "
    यह सुन यशपाल गुस्से से उठ खड़े हुए । नरेंद्र और मसाननाथ किसी तरह उन्हें संभाला ।
    " ठीक है जाइए तब , आप सभी जवान हैं इसीलिए इतनी क्षमता नहीं है कि मैं आप को रोक सकूं । लेकिन याद रखना अगर वह सभी जाग गए तो आप सभी के लिए खतरे का द्वार खुल जाएगा । "
    इतना बोल कर वह बूढ़ा आदमी जिस रास्ते से आया
    था उधर ही लौट गया । लालू माझी ने भी कुछ ज्यादा
    न सोच नाव चलाना शुरु कर दिया ।
    अजय नदी के काले पानी व आसमान के काले बादल
    ने एक भयानक वातावरण को उत्पन्न किया है।
    मसाननाथ बोले - " चिंता की कोई बात नहीं । सभी सामान मेरे पास है । और वह शैतान भी मेरे मायाजाल में बंद है । अब जल्दी से उस जगह पर पहुंचकर त्रिकाल यज्ञ को पूर्ण करना ही हमारा लक्ष्य है । और वैसे भी इसमें रूकावट डालने वाला कोई भी नहीं है । "
    यह सुनने के बाद भी नरेंद्र मन में खतरे की आशंका बढ़ने लगी है । बार-बार उसे ऐसा लग रहा है कि वह कुछ भूल रहा है लेकिन वह क्या है ये याद नहीं आ रहा ।
    इधर लालू की नाव धीरे-धीरे मंदिर की ओर बढ़ रहा है । देखने से ऐसा लग रहा है कि एक बड़ा सा स्तूप उनकी ओर धीरे-धीरे चला आ रहा है ।

    शाम होने के बाद खाना बनाने वाली मौसी यशपाल को कमरे में न पाकर उन्हें थाने में खोजने के लिए आई । थाने के हॉल रूम में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा टेबल के ऊपर हल्दी द्वारा एक गोला बना हुआ है ।
    " यहां पर हल्दी किसने फैलाया । शायद यशपाल बाबू ने इसे नहीं देखा वरना साफ करने के लिए जरूर कहते । अब आ ही गई हूं तो इसे साफ कर देता हूं । "
    यही बोलकर वो रूम के कोने से झाडू लाकर साफ करने लगी । साफ करते हुए उन्होंने उस व्याध पतंग को देखा लेकिन उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया । उन्हें लगा वह मरा हुआ है । टेबल से हल्दी साफ करने के बाद खाना बनाने वाली मौसी ने देखा वह मरा हुआ व्याध-पतंग फिर से जिंदा होकर उड़ गया । यह देख उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ कि कुछ देर पहले ही वह मरा हुआ था लेकिन अचानक जिंदा कैसे हो गया ?

    अब नरेंद्र को याद कि यशपाल ने उसे आज के बारे में खाने बनाने वाली मौसी को बताने के लिए कहा था । और यह भी कि आज हम सभी नहीं रहेंगे ।
    अचानक मसाननाथ बोले - " मांझी जल्दी से नाव चलाओ । वह मुक्त हो गया अब हमारे लिए खतरा ही खतरा है । "
    " मुक्त हो गया है लेकिन कैसे ? आपने तो कहा था कि आप के मायाजाल से वह कभी नहीं निकल सकता । "
    " इस बारे मैं नहीं जानता लेकिन वह आ रहा है । मैं उसे अनुभव कर सकता हूं वह गुस्से में हमारी ओर ही बढ़ रहा है । मांझी तुम और तेजी से नाव को मंदिर की ओर आगे बढ़ाओ । "
    लालू मांझी की तरफ इशारा करते हुए बोला - " चला तो रहा हूं लेकिन पानी में देखिए वह क्या है? "
    " कहां " बोलकर नरेंद्र ने पानी में टोर्च जलाया ।
    नरेंद्र ने देखा एक बड़ा सा मगरमच्छ उनके तरफ ही बढ़ रहा था । यह मगरमच्छ कुछ अलग ही था उसकी आंखें अँधेरे में लाल चमक रही थी । सभी संभल पाते इससे पहले एक धक्के में नाव पलट गई ।
    " सभी जल्दी से तैरों सामने ही मंदिर का पत्थर दिख रहा है । "
    नरेंद्र के आवाज को सुन सभी सामने के पत्थर की ओर तैरने लगे । लेकिन अचानक से उस पानी के दानव ने यशपाल के बायां हाथ को काट उन्हें पानी के अंदर खींच कर ले गया ।
    नरेंद्र ने यशपाल के दर्द से कराहने की आवाज सुनी ।
    वह यशपाल को बचाने के लिए पीछे मुड़ने ही वाला था कि मसाननाथ ने उसे रोकते हुए कहा ।
    " सामने मंदिर की ओर तैरते रहो । हमें चारों तरफ से इन शैतान रुपी मगरमच्छों ने घेर रखा है । जल्दी से हाथ चलाओ वरना हम भी मारे जाएंगे । "
    पीछे ना देखते हुए तीनों अपनी पूरी क्षमता से सामने दिखाई देने वाले पत्थर की ओर तैरते रहे ।

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