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Thread: ज्योतिष

  1. #1
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    ज्योतिष

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    ज्योतिष का नाम आते ही प्राणी का मन अपने भविष्य के रहस्यों की जानकारी प्राप्त कर लेने को आतुर हो उठता है, वह ज्योतिषी के पास यह आशा लेकर जाता है कि उसे वह जो कुछ भी बतलाएगा वह अक्षरश: उसी रूप में घटित होगा. लेकिन यह सब कुछ उस ज्योतिषी पर निर्भर करता है, वह उसकी जन्मकुंडली देखकर अपनी बुद्धि के अनुसार पूर्वानुमान लगाकर उसको भविष्य के बारे में बतलाता है. हालाँकि आज अधिकतर ज्योतिषी इस विद्या को विज्ञान की संज्ञा देने लगे हैं, यदि विज्ञान से तात्पर्य "विशेष ज्ञान" से है तो फिर इसे विज्ञान मानने में कोई दुविधा नहीं.
    प्राचीन शास्त्रकारों द्वारा प्राणमात्र से संबंधित प्रत्येक पहलू और तथ्य का अध्ययन करने के आधार एवं माध्यम खोजकर हमारे सम्मुख रख दिए गए हैं, इतने पर भी सबका अध्ययन-मनन करना और व्यवहार में स्वयं की समझ-बूझ या तर्कशक्ति से परिणाम तक पहुँचना व्यक्ति की अपनी पात्रता पर निर्भर करता है.
    ज्योतिष की उपयोगिता प्राणी के गर्भाधान के समय से ही आरम्भ हो जाती है. जब प्राणी गर्भमुक्त होता है अर्थात जन्म ले लेता है, वही क्षण उसके भाग्य का आधार बनता है. गर्भाधान से लेकर गर्भमुक्ति तक वह जो समय व्यतीत करता है, उसके पीछे प्रकृ्ति की एक सप्रयोजन क्रिया रहती है. स्त्री-पुरूष के मिलन से गर्भाधान की जो स्थिति बनती है, उस समय नभोमंडल में ग्रहों की स्थिति ही व्यक्ति की देह, चरित्र एवं जीवन की स्थिति का आधार बनती है.
    संसार में जो भी घटनाएं घटित होती हैं, उनके अनेक कारण बताए जाते हैं, जैसे प्राणी का कर्म किंवां प्रारब्ध, समष्टिकर्ता(ईश्वर) की इच्छा किंवाँ प्रकृ्ति का नियमित प्रवाह. इन घटनाओं का ग्रहों के आकर्षण-विकर्षण से क्या सम्बंध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते संसार के कार्यों में ग्रहस्थिति क्या परिवर्तन ला सकती है? यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है. इस प्रश्न का उत्तर सबके एकत्व का विचार कर लेने पर ही मिलेगा. इस सृ्ष्टि के रचनाकार(ईश्वर/भगवान/अल्लाह या जो कोई भी वो है) की इच्छा ही प्रकृ्ति का प्रवाह है, प्रकृ्ति के तीन गुणों सात्विक-राजस-तामस के प्रवाह के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और प्राणियों का प्रारब्ध है और प्रारब्ध के अनुसार ही उसे फल की प्राप्ति होती है. शरीर की उत्पति भी प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जैसा जिसका कर्म होता है, वैसी ही उसकी देह होती है. जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्म वासनाएं होती हैं, उसके जीवन में जिस प्रकार की घटनाएं घटने वाली होती हैं, उसी के अनुरूप उस शरीर की उत्पति के समय वैसी ही ग्रह स्थिति नभोमंडल में होती है. ग्रहों की स्थिति समान होने पर देश-काल और देह-भेद के कारण उनका भिन्न भिन्न प्रभाव पडता है, इसलिए वैदिक ज्योतिष में ग्रहों को किसी नूतन फल का विधान करने वाला न बतलाकर स्वयं के प्रारब्ध के अनुसार घटने वाली घटना का संकेत देने वाला कहा गया है------"ग्रहा: वै कर्म सूचका".

  2. #2
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    !! लापता !!
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    Re: ज्योतिष

    Quote Originally Posted by guruji View Post
    ज्योतिष का नाम आते ही प्राणी का मन अपने भविष्य के रहस्यों की जानकारी प्राप्त कर लेने को आतुर हो उठता है, वह ज्योतिषी के पास यह आशा लेकर जाता है कि उसे वह जो कुछ भी बतलाएगा वह अक्षरश: उसी रूप में घटित होगा. लेकिन यह सब कुछ उस ज्योतिषी पर निर्भर करता है, वह उसकी जन्मकुंडली देखकर अपनी बुद्धि के अनुसार पूर्वानुमान लगाकर उसको भविष्य के बारे में बतलाता है.

    आजकल पाखंडी ज्योतिष की फ़ौज तैयार हो चुकी है...

    कोई पांच तो कोई पांच सौ रूपए में हस्तरेखा देखकर भविष्य बताता है तो कोई तोते की सहायता लेता है...

    और इनके चक्कर में बेचारे गुणी पंडित भी गालियों के पात्र बन जाते है...
    वो कहा गया है न..

    -- धान के साथ गेहूं भी पिसता है --
    Last edited by Rated R; 03-04-2011 at 08:27 PM.
    !! JAI KAALI MAA !!

  3. #3
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    Re: ज्योतिष

    सवपर्थम, कल से प्रारभ होने वाले विक्रम संवत २०६८ के लिए आप सभी को बहुत सारी सुभकामनाये.
    ज्योतिष का मतलब ही ऐसी ज्योति से है जो इश्वर दुआरा दिखाई गयी हो (ज्योति + इश्वर ).
    जिस परकार विज्ञानं झूठा नहीं हो सकता है भले ही एक वैज्ञानिक झूठा हो सकता है उसी ही परकार ज्योतिष कभी झूठा नहीं हो सकता है भले ही एक ज्योतिषी ढोंगी हो या पाखंडी हो.

  4. #4
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    Re: ज्योतिष

    Quote Originally Posted by Rated R View Post
    -- धान के साथ गेहूं भी पिसता है --
    गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है/

    Disclamier:- All the stuff which are posted by me not my own property, these are collecting from another site or forum!!!

  5. #5
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    Re: ज्योतिष

    गुडी पडवा, नव विक्रम संवत की समस्त सदस्यों को हार्दिक बधाई ! बहुत समय से प्रतीक्षित अति उत्तम सूत्र का आगाज वो भी गुरूजी के कर कमलों से हम तो धन्य हो गए ! आशा है कि इस विषय में सभी सदस्य गहराई से एवं नित नूतन जानकारी प्राप्त कर सकेंगे !
    रफ्ता रफ्ता यूँ जमाने का सितम होता है !
    मेरी जिंदगी से रोज़ एक दिन कम होता है !!


  6. #6
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    Re: ज्योतिष

    ज्योतिष के इस सूत्र पर भी कुछ और लिखा जाये.

  7. #7
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    Re: ज्योतिष

    गर कोई इस सूत्र को आगे नहीं बढ़ा रहा है तो काया मुझे आज्ञा है की इस सूत्र मैं कुछ ज्ञान बाट सकू.

  8. #8
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    Re: ज्योतिष

    Quote Originally Posted by anita View Post
    गर कोई इस सूत्र को आगे नहीं बढ़ा रहा है तो काया मुझे आज्ञा है की इस सूत्र मैं कुछ ज्ञान बाट सकू.
    आपका स्वागत है अनीता जी
    आपका का योगदान हमारे फोरम के लिए उपयोगी होगा/
    आप मदद जरुर कर सकती हैं/
    मुझे आपके दिए जाने वाली जानकारी का इंतजार है/
    धन्यवाद

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  9. #9
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    Re: ज्योतिष

    अनिता जी,
    कोई भी फ़ोरम या मंच होता ही इस लिए है कि सदस्य अपनी बात रखें !

  10. #10
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    Re: ज्योतिष

    आप सभी का बहुत ही धन्यवाद.
    ज्योतिष भारतीय ज्ञान परम्परा का एक हिस्सा है. जिस तरह से अलग अलग शास्त्र माने गए है उन्ही में से एक ज्योतिष शास्त्र भी एक है. ज्योतिष कब से शुरू हुआ ये कहना भुत मुश्किल है पर इस विषय पर एक कथा है.
    एक बार सब ही ऋषि मुनियों में इस विषय पर बहस हुई की तीनो देवताओ(विष्णु, बरह्मा, महेश) में कौन से देवता सब से बड़े है. तीनो की परीक्षा लेने के लिए भ्रगु ऋषि को मनोनीत किया गया. सवपर्थम, वो ब्रह्म लोक गए तो उन्होंने वह देखा की ब्रह्मा जी सरस्वती जी के साथ वीणा वादन में व्यस्त है और उन्होंने ऋषि की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, उसके बाद वो केलाश पे गए जहा, शिव जी माता पारवती के साथ रति किर्या में व्यस्त थे, वहा से फिर वो विष्णु लोक पहुचे जहा पे उन्होंने देखा की विष्णु जी शेषनाग पर आँखे बंद करके आराम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उन्हें हवा कर रही थी, ये देख कर ऋषि बहुत ही करोधित हो गए और उन्होंने विष्णु जी की छाती पे अपने पैर से प्रहार कर दिया, जिस से विष्णु जी की नीद खुल गयी और उन्होंने देखि की सामने भ्रगु ऋषि क्रोध में खड़े है, तो उन्होंने उन्हें प्रणाम करते हुई कहा की हे ऋषिवर मेरी वज्र जैसी छाती पे प्रहार करके आपके पैरो को बहुत कष्ट हुआ होगा उसके लिए मैं बहुत क्षमा मांगता हु, इस से ऋषि बहुत ही प्रसन हुई और कहा की आप त्रिदेवो में सब से बड़े है, पर लक्ष्मी जी बहुत क्रोधित हो गयी और उन्होंने भरगु ऋषि को शाप देते हुई कहा की तुम्हारे वंशजो के पास मैं कभी भी नहीं जाउंगी, इस पर भरगु ऋषि ने कहा की मैं ऐसे गरंथ की रचना करूँगा जिस से की मेरे वंशज अपनी जीविका निर्वाह कर सके और वही से ज्योतिष के आदि गरंथ भरगु सहिंता की रचना हुई और ज्योतिष शास्त्र की भी.

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